देश की रीढ़ अरावली : दर्द न जाने कोय

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अरावली की जिस पर्वतमाला को बचाने के लिए नब्बे के दशक में समाज के साथ साक्षात सुप्रीम कोर्ट तक आगे आया था, आज उसके हाल बेहाल हैं। तरह-तरह की कोशिशों के बावजूद भारत की इस ‘रीढ़’ को बर्बाद किया जा रहा है। क्या है, इस पर्वतमाला की अहमियत?


अरावली आड़ी पर्वतमाला है। भारत की ज्यादातर पर्वत मालाएं मानसून के अनुकूल उत्तर से पूर्व होती हैं। अरावली इनके विपरीत पश्चिम से उत्तर-मध्य की तरफ खड़ा है। यह पश्चिम से आने वाली वायु के साथ रेतीली हवाओं को अपने जंगलों में समा लेता है। इसीलिए इसे भारत की रीढ़ कहते हैं। यह अकेली पर्वतमाला है, जिसमें पुरानी पर्वत चोटियां के बीचों-बीच नए रेत के टीले दिखाई देते हैं। ‘बिरला साइंस इंस्टीट्यूट,  जयपुर’ के निदेशक प्रो. एसएस डावरिया ने ‘रिमोट सेंसिंग’ द्वारा अध्ययन करके, उच्चतम न्यायालय में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। उच्चतम न्यायालय के तत्कालीन न्यायमूर्ति एमएन वेंकटचेलैया ने भारत सरकार को इन रेतीली हवाओं से दिल्ली को बचाने का निर्देश दिया था। तभी 7 मई 1992 ‘अरावली संरक्षण नोटिफिकेशन’ भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने प्रकाशित किया था।

इससे पूर्व उच्चतम न्यायालय ने अरावली को एक समग्र पर्वतमाला मानकर बचाना तय कर दिया था। तब लगता था कि अरावली के आंसू न्यायालय ने पोंछ दिए हैं और अरावली के दर्द को न्यायपालिका ने समझ लिया है, लेकिन अब 20 नवंबर 2025 को उच्चतम न्यायालय के निर्णय, रिपोर्ट और शपथपत्र को पढ़कर लगता है कि ऊंच – नीच में पहाड़ को भी बांट दिया गया है। 100 मीटर से अधिक ऊंची पहाड़ियां ही अरावली है, इससे नीचे अरावली नहीं है। उन पहाड़ियों को खोजकर निकालो जिनको हमने 1980 के दशक से बचाने की मुहिम खड़ी की थी।

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अरावली के पुनर्जीवन हेतु वर्ष 1986 में गोपालपुर गांव में मेवालो का बांध बनाकर, पहाड़ियों पर पशुओं की चराई के दबाव को कम करने का काम शुरू किया था। इस बांध के तैयार होने से गोपालपुरा गांव में पानी आ गया था। गांव से लाचार, बेकार, बीमार होकर उजड़े युवक शहर चले गए थे, लेकिन कुओं में पानी आते ही शहर से वापस गांव आने लगे थे। तभी उनके रिश्तेदार पालपुर के जंसी मीणा ने गोपालपुरा आकर कहा था कि हमारे सभी कुएं खदानों के कारण सूख गए हैं, वहां जल-संरक्षण हेतु जोहड़ की जरूरत है। तभी पालपुर में जांसी मीणा, तिलवाड़ी के छोटेलाल मीणा के यहां जोहड़ बनाने का काम किया था। छोटेलाल मीणा कहते थे कि खनन से पहाड़ तो उजाड़ ही रहा है; इससे हम भी उजड़ रहे हैं। हमारे लिए जो जोहड़ बना है, उससे हम तभी बसे रह सकते हैं, जब खनन बंद होगा।

‘तरुण भारत संघ’ ने दोनों गांव में जोहड़ बनाए, लेकिन इनका सारा पानी खदानों में चला गया क्योंकि कुओं से ज्यादा गहरी खदानें थीं। तभी से पानी के लिए ही खदानों के विरुद्ध लड़ाई शुरू हुई। उच्चतम न्यायालय के आदेश से जैसे ही खदानें बंद कराई गईं तो उनके दोनों कुओं में पानी आ गया। फिर तो जेंसी का बेटा ख्याली मीणा, महेश शर्मा, गोपी कुम्हार मलाना ने मिलकर पूरी ‘अरावली बचाओ यात्रा’ की। ऐसे पालपुर,  तिलवाड़ी, तिलवाड़, बैरवा डूंगरी, बल्देवगढ़, गोवर्धनपुरा, मल्लाना के पांचू सरपंच ने प्रत्यक्ष सत्याग्रह करके खनन रुकवाया था। मल्लाना में पाटनी, आरके मार्बल जैसे बड़े – बड़े खान मालिक पहुंच गए थे। वे भी लोक सत्याग्रह के कारण वहां खान नहीं चला सके थे। तब उच्चतम न्यायालय ने पर्वतमाला और उसमें रहने वाले लोगों से अरावली का दर्द सुनकर उसे न्याय दिया था।

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उच्चतम न्यायालय के उस आदेश ने अरावली पर्वतमाला की जान और इज्जत बचाई थी। मेरे विरुद्ध भयानक मुकदमे खान मालिकों ने दर्ज किए थे। पुलिस भी अपनी कार्रवाई करने लगी थी। पर्यावरण कार्यकर्ता को बचाने हेतु सरकार ने उसी काल में कानून में बना दिया था और उस कानून का पालन भी होता था। तब पहाड़ का दर्द सुना जाता था। पहाड़ और पहाड़ बचाने वालों को न्यायालय बचाता था। अब क्या नया हुआ मालूम नहीं? अरावली पर्वत की पीड़ा तो कोई सुनने को तैयार नहीं है। जो अरावली की पीडा जानते हैं, वो अरावली को बचाना चाहते हैं, लेकिन अरावली को बचाने से, बचाने वालों की पीड़ा बढ़ने लगी है।

अरावली तो लोगों तथा अपने जंगलों की पीड़ा कम करने के लिए आडा पर्वत बनकर खड़ा है। इसलिए राजस्थान के रेगिस्तान से अधिक अच्छी वर्षा अरावली क्षेत्र में होती है। अरावली पर्वतमाला में ‘सीधी साल्ल’ (सीधी दरार) हैं, इनके द्वारा वर्षा जल अरावली के भूजल भंडारों में जमा होता रहता है। इसी से चारों राज्यों में जहां अरावली पर्वतमाला है, वहां मीठा जल, सुरक्षित पेयजल आज भी उपलब्ध होता रहता है। यह पर्वतमाला ‘भूजल बैंक’ को समृद्ध बनाकर रखती है। इसलिए दिल्ली के खंडावप्रस्थ, हरियाणा के काला पहाड़, गुड़गांव, फरीदाबाद, नूह को भू-जल संरक्षित घोषित करने की बात चली थी। हरियाणा में जहां पहाड़ियां हैं, वहां मीठा पेयजल, स्वस्थ जल उपलब्ध है। शेष क्षेत्रों में खारा जल है।

ऐसा ही अरावली क्षेत्र के चारों राज्यों में आज भी देखने को मिल रहा है। यदि अरावली पहाड़ियों में खनन कर दिया तो बादलों का संतुलन बिगड़ जाएगा। बेमौसम वर्षा चक्र चलेगा, उसके कारण बाढ़ – सुखाड़ की मार पड़ेगी, खेती का उत्पादन घटेगा, खाद्य व पेयजल सुरक्षा पर संकट बढ़ेगा। इस कारण लोगों में बेचैनी बढ़ रही है। अब अरावली में सतत विकास के नाम पर खनन विनाश करेगा। यदि हम अरावली की पीडा को समझें तो इस संकट को मिटाने की कोशिश आरंभ हो सकती है। यह सब स्वयं ही दर्द मिटाने का काम करेगी और स्वस्थ जलवायु, खाद्य, जल-सुरक्षा प्रदान करेगी। हमारे गांवों को लाचारी, बेकारी, बीमारी से मुक्ति दिलाती रहेगी। यही अरावली क्षेत्र के प्रदूषण, पर्यावरण शोषण, अतिक्रमण मुक्त रखने के रास्ते पर आगे बढ़ाएगी। खनन खुलते ही जंगल पर अतिक्रमण, जल-संसाधनों के प्रदूषण और युवाओं का शोषण शुरू होगा।

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जंगल कटने से मिट्टी कटेगी और खेतों में गाद जमा होगी। मिट्टी के कटाव से खेतों की जमीन कम होगी। पशुओं के लिए चारा, महिलाओं के लिए पेयजल संकट बढ़ेगा। जब खदान चलती थी, तब लोग मालिक से मजदूर बन गए थे। गांव छोड़कर लोग उजड़ने लगे थे। जब खदानें बंद हुईं तो वे अपनी जमीन ठीक करके,  उसमें खेती करने लगे थे। अब फिर खदानें चालू होंगी तो पहले जैसी ही बदहाली शुरू होगी। अरावली के लोगों और अरावली का दर्द एक ही है। अरावली पर्वत की प्राकृतिक पीड़ा और मानवीय संस्कृति पर संकट एक साथ ही आ गया है। इसे रोकने के लिए हम संकट को समझें और अरावली के लोग संगठित होकर, खनन से अरावली को बचाए। खनन मुक्त अरावली का पर्यावरण सुरक्षा के साथ-साथ सतत रूप में पूरे भारत और दुनिया के लिए शुभ होगा। (सप्रेस)

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