अरावली केवल पर्वत नहीं, जीवनदायिनी पारिस्थितिक व्यवस्था है: राजेंद्र सिंह

उदयपुर में चतुर्थ विश्व जल सम्मेलन में अरावली क्षेत्र की पारिस्थितिकी, पर्यावरण एवं कृषि पर विमर्श

रिपोर्ट पुनीत कुमार

उदयपुर, 7 फरवरी। जनार्दन राय नगर राजस्थान विद्यापीठ, उदयपुर में आयोजित चतुर्थ विश्व जल सम्मेलन के प्रथम दिवस पर देश विदेश के प्रतिष्ठित विद्वानों, नीति निर्माताओं, पर्यावरणविदों और प्रायोगिक क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों ने भाग लिया। सम्मेलन का उद्देश्य अरावली पर्वतमाला के पारिस्थितिक महत्व, पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में उसकी भूमिका, कृषि को समर्थन देने तथा मानव बस्तियों को स्थायित्व प्रदान करने की उसकी क्षमता पर गंभीर विमर्श करना रहा।

चतुर्थ विश्व जल सम्मेलन का शुभारंभ दो महत्वपूर्ण पुस्तकों के विमोचन के साथ हुआ। पहली पुस्तक “आओ अरावली को जाने” का संपादन डॉ. राजेंद्र सिंह, डॉ. मंझल सारंगदेवोत और प्रो. युवराज सिंह द्वारा किया गया है, जबकि दूसरी पुस्तक “स्वराज आदिज्ञान विरासत यात्रा” का संपादन प्रो. कर्नल एस. एस. सारंगदेवोत द्वारा किया गया है। इन पुस्तकों के माध्यम से अरावली की पारिस्थितिकी, सांस्कृतिक विरासत और स्थानीय ज्ञान परंपराओं को व्यापक समाज तक पहुँचाने का प्रयास किया गया है।

कार्यक्रम का उद्घाटन पर्यावरण विद डॉ. राजेंद्र सिंह ने किया। उन्होंने अरावली पर्वतमाला की सुरक्षा की तत्काल आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि पर्वतों को केवल भूगर्भीय संरचनाओं के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे जीवंत पारिस्थितिक तंत्र के रूप में समझना चाहिए जो मानव जीवन और प्रकृति दोनों को पोषित करते हैं। उन्होंने बताया कि अरावली जल, जैव विविधता, संस्कृति और आजीविका का आधार बनकर जीवनदायी प्रणाली के रूप में कार्य करती है और इसके महत्व को पारिस्थितिक एवं सभ्यतागत दृष्टि से गहराई से समझने की आवश्यकता है।

प्रो. सारंगदेवोत ने अरावली को संतुलित परिदृश्य के व्यापक दृष्टिकोण में रखते हुए भारत के विकासात्मक लक्ष्यों और सततता के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने भूजल क्षरण, जैव विविधता ह्रास, भूमि क्षति और अनियंत्रित खनन जैसी चुनौतियों की ओर ध्यान आकर्षित किया तथा वैज्ञानिक विनियमन, ढाल स्थिरता और उन्नत खनिज प्रसंस्करण के साथ एक परिपत्र पारिस्थितिक आर्थिक मॉडल की आवश्यकता बताई। उन्होंने अरावली को पारिस्थितिक स्थायित्व की जीवनरेखा कहा।

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अनुपम सराफ ने विधिक पारिस्थितिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए उपग्रह चित्रों, स्थलाकृतिक मानचित्रण और संवैधानिक सिद्धांतों के माध्यम से यह प्रश्न उठाया कि पर्वतों को कैसे परिभाषित और शासित किया जाना चाहिए। उन्होंने इंटरएक्टिव टेरेन ग्रिड्स जैसे उपकरणों का उल्लेख करते हुए अरावली को एक कार्यात्मक पारिस्थितिक गलियारे के रूप में देखने का प्रस्ताव रखा, जो संयुक्त राष्ट्र की कॉम्पोज़िट माउंटेन सिस्टम अवधारणा से मेल खाता है। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण को अनुच्छेद 21 जीवन का अधिकार, अनुच्छेद 48A, सार्वजनिक न्यास सिद्धांत और अंतरपीढ़ी समानता से जोड़ा।

बैस्टियन मोहरमान ने अरावली की विकसित होती पहचान पर चर्चा करते हुए कहा कि इसकी मूल शक्ति समुदायों और उनके दीर्घकालिक पारिस्थितिक संबंधों में निहित है। उन्होंने यह प्रश्न उठाया कि ऐसे परिदृश्यों की पहचान कौन निर्धारित करता है, सरकार, न्यायपालिका या समुदाय, और बहु स्तरीय निर्णय निर्माण की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने सतत खनन और वैश्विक अनुभवों के संदर्भ में अरावली की विशिष्टता पर भी विचार रखा।

हेल्मुट किन्ज़ेलमैन ने दार्शनिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए पर्वतों को पवित्र पारिस्थितिक इकाइयों के रूप में देखा और मानव केंद्रित सोच से आगे बढ़कर प्रकृति के साथ संबंधों को पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता पर बल दिया।

डॉ. राजेंद्र सिंह ने आगे भारत की भू सांस्कृतिक विविधता के संदर्भ में अरावली को समझाते हुए बताया कि देश में 86 भू सांस्कृतिक और 50 भौगोलिक इकाइयाँ हैं। उन्होंने अरावली को एक पोषण देने वाली माँ बताते हुए इसके अंतर्गत आने वाले 12 भू सांस्कृतिक क्षेत्रों ब्रज, दिल्ली गेट, मेवात, मत्स्य, हाड़ौती, डूंगर, मगरा, मेवाड़, डांग, बागड़, मारवाड़ और शेखावाटी का उल्लेख किया।

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अशोक खुराना ने वैज्ञानिक मानचित्रण और जैव विविधता प्रलेखन के महत्व पर जोर देते हुए संस्थागत अनुभवों, विशेषकर सीपीडब्ल्यूडी, का संदर्भ दिया और संरक्षण प्रयासों में टकराव की बजाय सहमति आधारित दृष्टिकोण अपनाने की बात कही।

जनार्दन राय नगर विश्व विद्यालय से प्रो. युवराज सिंह ने कहा कि प्रो. सारंगदेवोत ने उन्हें जनार्दन राय नगर राजस्थान विद्यापीठ के नेतृत्व में सम्पूर्ण अरावली क्षेत्र के 20 विश्वविद्यालयों, 40 महाविद्यालयों और 100 विद्यालयों में जागरूकता अभियान एवं जनचेतना कार्यक्रमों के लिए एक विस्तृत रोडमैप तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी है।

टेक्निकल यूनिवर्सिटी ऑफ म्यूनिख के प्रतिनिधि मैक्स ने जैविक खेती, मृदा संरक्षण और सतत कृषि पद्धतियों को अरावली क्षेत्र की पहचान में शामिल करने की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि पारिस्थितिक पुनर्स्थापन और आजीविका रणनीतियों के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके।

अनंत नेशनल यूनिवर्सिटी से प्रो. पुनीत कुमार ने कहा कि लिवेबिलिटी और रिलेटिव आइडेंटिटी जैसे ढाँचों को क्षेत्रों की भू सांस्कृतिक विविधता के संदर्भ में विस्तार देना आवश्यक है। उन्होंने बताया कि अनंत नेशनल यूनिवर्सिटी की पहलें पारिस्थितिक चिंतन, भू सांस्कृतिक मानचित्रण और ज्ञान प्रणालियों के समेकन के माध्यम से इसी दिशा में कार्य कर रही हैं।

सत्र के समापन पर डॉ. इंदिरा खुराना ने दुर्लभ खनिज तत्वों के बढ़ते वैश्विक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला और इनके दोहन से जुड़े पारिस्थितिक, सामाजिक और राजनीतिक आयामों को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि ऊर्जा संक्रमण, उन्नत प्रौद्योगिकी और राष्ट्रीय अवसंरचना के विकास में रेयर अर्थ एलिमेंट्स की भूमिका तेजी से बढ़ रही है, जिसके कारण पर्वतीय और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों पर दबाव भी बढ़ रहा है।

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डॉ. खुराना ने यह भी रेखांकित किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में खनिज संसाधनों का महत्व निर्विवाद है, किंतु यह सुरक्षा तभी सार्थक होगी जब विकास की प्रक्रिया पर्यावरणीय न्याय, पारदर्शिता और दीर्घकालिक स्थिरता के सिद्धांतों पर आधारित हो। उन्होंने नीति निर्माण में वैज्ञानिक अनुसंधान, स्थानीय ज्ञान प्रणालियों और सामुदायिक सहभागिता को एकीकृत करने की आवश्यकता पर जोर देते हुए अरावली जैसे क्षेत्रों के लिए जिम्मेदार और संवेदनशील संसाधन प्रबंधन की दिशा में सामूहिक प्रयासों का आह्वान किया।

समग्र रूप से, प्रथम दिवस की कार्यवाही ने यह स्पष्ट किया कि अरावली का भविष्य उसे एक पारिस्थितिक गलियारे, सांस्कृतिक परिदृश्य और जीवंत तंत्र के रूप में स्वीकार करने में निहित है। चर्चाओं में समेकित शासन, सामुदायिक सहभागिता, वैज्ञानिक मानचित्रण, सतत कृषि और नैतिक संसाधन प्रबंधन की आवश्यकता पर बल दिया गया, ताकि अरावली आने वाली पीढ़ियों के लिए भी पर्यावरणीय संतुलन और मानव जीवन को सहारा देती रहे।

प्रो. पुनीत कुमार अनंत नेशनल यूनिवर्सिटी में संकाय सदस्य हैं और सततता, स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों तथा डिज़ाइन के अंतर्संबंधित क्षेत्रों में कार्यरत हैं। वे अनंत सेंटर फॉर इंडिजिनस नॉलेज सिस्टम्स एंड प्रैक्टिसेज से जुड़े हैं और अनुसंधान, क्षेत्रीय पहलों तथा शैक्षणिक कार्यक्रमों में सक्रिय योगदान दे रहे हैं।

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