बहु आयामी पेड़ : पेड़ों पर ओपी जोशी की पुस्तक

 डॉ. किशोर पंवार

मध्यप्रदेश के जाने-माने पर्यावरणविद्, लेखक और सामाजसेवी डॉ.ओ.पी. जोशी की पेडों पर हाल में आई किताब ‘बहु आयामी पेड़’ अपने अनूठे अंदाज में पेडों से जुड़ी विविध जानकारी देती है। पेड़ों से जुड़ा कोई प्रसंग इससे अछूता नहीं है, चाहे वह पेड़ों की परिभाषा ही क्यों ना हो। वास्तु-शास्त्र हो या आयुर्वेद, प्राचीन भारतीय साहित्य में पेड़ों का दर्शन हो या पेड़ों से जुड़े हुए प्रेम-प्रसंग, पेड़ों ने जन-सामान्य को कितना प्रभावित किया है इसकी झलकियां पुस्तक में आपको मिलेंगी।

इन दिनों डॉ. ओमप्रकाश जोशी की पुस्तक ‘बहु आयामी पेड़’ की खासी चर्चा है। उनका बायोडाटा देखें तो पता चलता है कि वे अपने अध्ययन और अध्यापन काल से ही पेड़ों और पर्यावरण के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित रहे हैं और आज भी उतनी ऊर्जा से पर्यावरण संरक्षण के कार्य में लगे हैं। उनकी अब तक 8 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जो सभी पर्यावरण और पेड़-पौधों पर हैं। इंदौर ही नहीं, पूरे मध्यप्रदेश के लिए वे पर्यावरण के पर्याय और एक जाने-माने लेखक हैं।श्‍

डॉ. जोशी की पुस्तक का यह शीर्षक ‘बहु आयामी पेड़’ बड़ा ही सार्थक है। मुझे लगता है कि इससे बेहतर शीर्षक इस किताब का हो ही नहीं सकता था। पेड़ों से जुड़ा कोई प्रसंग इससे अछूता नहीं है, चाहे वह पेड़ों की परिभाषा ही क्यों ना हो। वास्तु-शास्त्र हो या आयुर्वेद, प्राचीन भारतीय साहित्य में पेड़ों का दर्शन हो या पेड़ों से जुड़े हुए प्रेम-प्रसंग, पेड़ों ने जन-सामान्य को कितना प्रभावित किया है इसकी झलकियां पुस्तक में आपको मिलेंगी।

पेड़-पौधे दुनिया की सबसे विलक्षण वस्तुएं हैं, चाहे जीवित हों या मृत। इस संसार के अद्भुत, विशालकाय, अपने सहारे खुद जीने वाले और सारी दुनिया को शुद्ध वायु, भोजन, सहारा, आरामदायक सोफे, कुर्सियां, टेबल, पलंग देने वाले। बीमार हो जाएं तो दवाई और मरने के बाद भी शव का श्रंगार करने के लिए तरह-तरह के सुंदर सुगंधित हार-फूल और अंतिम संस्कार के लिए क्विंटलों सूखी लड़कियां देने वाले परोपकारी जीव हैं, पेड़।

पेड़ों के उपकारों, उपयोगों और आकार की कोई सीमा नहीं है। बरगद, चीड़ हो या देवदार, 200 से 250  फीट ऊंचाई तो आम बात है। वे सभी आयामों से परे हैं। जल, थल और नभ सभी दिशाओं में व्याप्त हैं। कई बार समझ में नहीं आता कि उन्हें जलचर कहें या थलचर। जड़ें गहरी मिट्टी में गड़ी हुई, तना आधा जमीन में आधा जमीन के ऊपर और शाखाएं तथा फूल हवा में झूलते हुए। मात्र हवा पानी और धूप से अपना सब कुछ बनाने वाले और अपना सब कुछ अन्य जीव-जंतुओं को सौंप देने वाले पेड़ सचमुच बहु-आयामी हैं। 

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आयाम की बात के तहत किताब में समाहित एक अध्याय ‘उम्रदराज पेड़’ का जिक्र करना मैं जरूरी समझता हूं। उम्रदराज पेड़ों में 4800 वर्ष पुराने ‘व्हाइट माउंटेन’ (कैलिफोर्निया, अमेरिका)  स्थित पेड़ ‘ब्रिसल कोन पाइन’ का वर्णन इसमें आया है। इसी तरह अमेरिका के ‘कैलिफोर्निया  नेशनल पार्क’ में पाए जाने वाले ‘सिकोया’ पेड़ की उम्र भी लगभग 4000 वर्ष आंकी गई है। 600 टन वजनी और 83 मीटर ऊंचे इस पेड़ के तने का विकास 102 मीटर है।  

ऐसा नहीं है कि हमारे देश में उम्रदराज और विशालकाय पेड़ नहीं पाए जाते। देश का संभवत: सबसे पुराना पेड़ मुजफ्फरनगर के पास स्थित ‘शुक्रताल’ में लगा हुआ वटवृक्ष है जिसकी उम्र वहां के लोग लगभग 5000 वर्ष के आसपास बताते हैं। प्रसिद्ध तीर्थस्थल ‘बद्रीनाथ धाम’ के पास जोशीमठ से लगे एक शहतूत के पेड़ की उम्र 1200 वर्ष बताई गई है। इसी पेड़ के नीचे आदि शंकराचार्य ने समाधि ली थी। किताब के अंतिम पृष्ठ पर दी गई जानकारी कि पेड़ों के नीचे ऐसा क्या है कि कोई बुद्ध बन जाता है तो कोई न्यूटन, कम महत्वपूर्ण नहीं है।

पेड़ों पर आधारित देश, शहर और मोहल्लों के नाम भी इस पुस्तक में शामिल हैं जो बताता है कि पेड़ों ने हमारे जन-जीवन को ही नहीं, हमारे रहवास को भी पहचान दी है। खजुराहो, छिंदवाड़ा, बड़वानी, अमरोहा का नाम जुबां पर आते ही इनसे जुड़े पेड़ों की छवियां आंखों के सामने नाचने लगती हैं। इसी के अंतर्गत बद्रीनाथ के बारे में कहा गया है कि बद्रीनाथ का मंदिर जिस स्थान पर बना है वहां प्राचीन काल में भगवान नारायण को प्रिय बद्री अर्थात बेर का एक विशाल पेड़ था इसलिए यह ‘बद्रीनाथ धाम’ कहलाया।

इस संदर्भ में मुझे लगता है कि लेखक को यहां थोड़ा और ध्यान देने की जरूरत थी। बेर का पेड़ एक छोटा ‘पर्णपाती’ किस्म का है जो शुष्क ट्रॉपिकल क्षेत्र का वासी है। हिमालय में ‘बद्रीनाथ धाम’ 9200 फीट की ऊंचाई पर है और हमेशा ठंडा बना रहता है। वहां बेर के पेड़ के मिलने की संभावना बहुत कम है। शुष्क ट्रॉपिकल क्षेत्र का मूल निवासी हिमालय की ठंडी बर्फीली पहाड़ियों पर कैसे पहुंच सकता है? मैंने स्वयं ‘बद्रीनाथ धाम’ की दो-तीन बार यात्राएं की हैं, पर कभी भी बेर का पेड़ वहां नहीं दिखा। 

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यह भी हो सकता है कि बद्रीनाथ का बद्री वृक्ष हमारे बेर के अलावा कुछ और हो। एक संभावित सदस्य लद्दाख का ‘सी बकथार्न’ फल हो सकता है जो हिमालय के मध्यम तापमान और अलग-अलग मौसम वाले ‘शीतोष्ण बायोम’ का हिस्सा है और ‘सिल्वर बेरी’ के नाम से जाना जाता है। यह फल खाने योग्य है, विटामिन से भरपूर है और इससे जैम भी बनाया जाता है। कुल मिलाकर ‘बद्रीनाथ धाम’ का रिश्ता हमारे चिर-परिचित कांटेदार बेर के पेड़ से जोड़ना कुछ ठीक नहीं लगता।

पेड़ों ने हमारी भाषा को भी समृद्ध किया है इसका उदाहरण भी इस पुस्तक में शानदार तरीके से आया है। पेड़ों से जुड़ी कहावतें तो शानदार हैं। कुछ उदाहरण देखिए – ‘आम के आम, गुठलियों के दाम,’ ‘एक अनार सौ बीमार,’ ‘तिल का ताड़ बनाना,’ ‘ढाक के तीन पात’ और ‘बोया पेड़ बबूल का, आम कहां ते होय।’ एक अन्य अध्याय में पेड़ की पर्यावरणीय सेवाएं एवं प्रदूषण नियंत्रण में उनकी भूमिका का शानदार वर्णन किया गया है।

एक पेड़ प्रतिवर्ष लगभग 20 किलोग्राम धूल सोखता है और प्रतिवर्ष 30 लाख रुपए की प्राणवायु देता है। इसमें अन्य पर्यावरणीय फायदों को जोड़ दिया जाए तो यह राशि लगभग 5 करोड रुपए की होती है। कभी हमने इस दृष्टिकोण से पेड़ों के महत्व को नहीं आंका होगा। पेड़ न सिर्फ हमें ऑक्सीजन देते हैं, परंतु एक सघन पेड़ 24 घंटे में 300 से 400 लीटर पानी वाष्प के रूप में उड़ाकर 8 से 10 एयर कंडीशनर के बराबर ठंडक उपलब्ध कराता है। इस तरह से पेड़ बिजली की ऊर्जा की आवश्यकताओं को भी कम कर देते हैं।

इस छोटी सी पुस्तक में लेखक का पेड़-पौधों से लगाव स्पष्ट रूप से झलकता है। जानकारी एकत्रित करने की लगन और पिछले 40-50 वर्षों की मेहनत स्पष्ट रूप से इसमें परिलक्षित होती है। पुस्तक में पेड़-पौधों के विभिन्न 24 आयामों को बहुत ही सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया है, यही इसकी एक खासियत है। इस पुस्तक की एक और विशेषता का जिक्र करना जरूरी है जो अन्य पुस्तकों से इसे बिल्कुल अलग बनाती है, वह है – इसके अंत में पुस्तक के विभिन्न शीर्षकों में आने वाले वानस्पतिक नाम की सूची। इससे यह पुस्तक और अधिक उपयोगी हो गई है। वनस्पति शास्त्र में रुचि रखने वाले जन-सामान्य के साथ ही विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए भी अत्यंत उपयोगी होगी। (सप्रेस)

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