हमारे चारों तरफ फैले, फैलाए गए हिन्दू-मुसलमानों के साम्प्रदायिक तनावों में आम नागरिक क्या करे? ऐसा आम नागरिक जो इस फूहड़ता, हिंसा और घमंड़ में शामिल नहीं होना चाहता? एक तरीका है, आशनाई यानि मित्रता, प्यार का जिससे एक-दूसरे को समझा जा सके। मुम्बई के एक मोहल्ले में नागरिकों ने ऐसी ही एक पहल की है।
भारती दीवान

पिछले कुछ सालों से हम अपने आसपास कुछ ऐसी भाषा, शब्द या घटना सुनते/देखते हैं जिसमें नफरत की बू आती है। तथाकथित हिंदुत्ववादियों ने आम लोगों के मन में मुस्लिमों के प्रति नफ़रत और द्वेष की भावना पैदा कर दी है। ऐसे ही कुछ उदाहरण हैं, जैसे मेरी पड़ोसन जो कहती हैं कि “मैं अपने बेटे को सेंट जेवियर्स स्कूल से निकालूंगी, वहां मुस्लिम बच्चों की संख्या बढ़ रही है।” मेरी पहचान की महिला का कहना है कि “मैं ऊपर के रास्ते पर नहीं जाती, वहां काले कपड़े वाली (बुर्का) रहती हैं, मुझे उनसे डर लगता है।” बिल्डिंग की एक रहवासी के मुताबिक “दूध की दुकान में मुस्लिम लड़का बहुत ही गंदा है, उससे कुछ बोलने में डर लगता है, रात में कुछ कर दिया तो?!”
हाल ही का एक भयानक प्रसंग है। दिसम्बर की छुट्टियों में कई साल से हम बच्चों की पार्टी करते आ रहे हैं। इस साल सोसायटी के एक हिन्दू सदस्य ने आरोप लगाया कि ‘’हिंदू होकर भी आप ईसाई धर्म का प्रचार कर रहे हैं, ईद आयेगी तो क्या नमाज़ पढ़ना भी सिखाओगे?’’ हमारी एक मुस्लिम दोस्त की मां ने कहा था कि देश में हिन्दू-मुस्लिम दंगे तो पहले भी होते रहे हैं, लेकिन इतनी नफरत का माहौल कभी नहीं देखा। अब तो हर मुस्लिम को शंका की नज़र से देखा जाता है, यह बहुत ही चिंताजनक है।
घर किराये पर देना है तो पहली शर्त मुस्लिम को नहीं देना होती है। लव-जिहाद, गौमांस, बुर्का, हिजाब किसी भी नाम से देश भर में मुस्लिम द्वेष स्पष्ट दिखाई दे रहा है। हम सभी को, जो थोड़े भी संवेदनशील हैं, इन घटनाओं से पीड़ा होती है, मन विचलित होता है। हम तर्क सहित कोई भी बात इन कट्टरपंथियों से नहीं कर सकते, क्योंकि इतना धैर्य और तर्क इनके पास नहीं है। सवाल उठता है कि ऐसे माहौल में हम क्या कर सकते हैं?
नफ़रत के इस दौर में हमारी एक मित्र मेधा कुलकर्णी ने पास की एक मुस्लिम बहुल बस्ती ‘पठानवाड़ी’ में जाना शुरू किया है। कभी सैर के बहाने, कभी सब्जी लेने के लिए, कभी कुछ और काम से वहां के लोगों से पहचान बनाना शुरू की है। पहले तो स्थानीय लोगों में थोड़ी झिझक हुई, लेकिन जल्दी ही लोग सहजता से बात करने लगे। मेधा ने हम कुछ मित्रों को ‘पठानवाड़ी’ के बारे में जानकारी दी और तय हुआ कि ईद के दिन “ईद मुबारक” कहने और पहचान बनाने के लिए हमें मस्जिद में जाना चाहिए। हम कुछ महिला-पुरुष मित्र ‘नूरानी मस्जिद’ पहुंचे और वहां के मुस्लिम भाईयों को ईद मुबारक कहा। उन्होंने बहुत ही उत्साह से हमारा स्वागत किया और हमें मस्जिद के अंदर ले गये। अंदर से मस्जिद कैसी है, यह हमें पहली बार देखने मिला। हम सभी के लिए यह अनोखा अनुभव था। अब हमारा ‘पठानवाड़ी’ के लोगों के साथ दोस्ती का सिलसिला शुरू हुआ।
आपसी समझ बनाने और देश भर के अनुभवों को साझा करने के उद्देश्य से हम मिलते रहे। हमारे एक युवा साथी ने स्कूल के ग्रीष्म-कालीन शिविर में बच्चों के साथ खेल व अन्य मज़ेदार गतिविधियां शुरु कीं। हमारी दोस्ती ने वहां के लोगों के मन में हमारे प्रति विश्वास बनाया। तय हुआ कि बक़रीद के उपलक्ष्य में हम ऐसा “ईद मिलन” कार्यक्रम रखते हैं जिसमें सभी धर्मों के लोग शामिल हों। 15 जून को ईद मिलन के उपलक्ष में हम साथ आये और हमारे बीच दोस्ती की शुरुआत हुई। इस कार्यक्रम में तकरीबन सौ लोग शामिल हुए।
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हम मानते थे कि प्रगतिशील महाराष्ट्र राज्य में हिंदू-मुस्लिम द्वेष हो ही नहीं सकता। यहां संतों की परंपरा रही है, प्रगतिशील साहित्यकार, कलाकर, सामाजिक कार्यकर्ताओं का जमघट रहा है, स्त्री मुक्ति आंदोलन की अगुवाई रही है। यहां नफरत कैसे हो सकती है? यह द्वेष सिर्फ उत्तर-भारत के राज्यों में ही दिखाई/सुनाई देता है, लेकिन हम गलत थे। छोटी-बड़ी घटनाओं और आसपास की टिप्पणियों से इस ज़हर की व्यापकता का अहसास होता है।
ऐसा ही एक उदाहरण महाराष्ट्र के अहिल्यानगर (अहमदनगर) जिले के गुहा गांव (तहसील राहुरी) का है, जहां की कुल जनसंख्या पांच हजार है जिनमें 120 परिवार मुसलमानों के हैं। गुहा गांव में पिछले दो साल से वातावरण तनावपूर्ण है, कारण है सदियों पुरानी दरगाह। यह दरगाह रमजान बाबा शाह माही की है। इस दरगाह को 1857 में अंग्रेजों ने मंजूरी दी थी। जहां हर त्यौहार मिल-जुलकर मनाये जाते थे वहां अब मंदिर-दरगाह को लेकर द्वेष और ज़हर का माहौल है। इस मुद्दे को लेकर दोनों धर्मों के कट्टरपंथियों ने स्थानीय लोगों को भड़काया है।
नतीजे में दोनों धर्म के लोगों में पिछले दो साल से तनाव का वातावरण है। इस विवाद के चलते मुस्लिम समाज का आर्थिक/सामाजिक बहिष्कार किया गया है। मोची उनके जूते नहीं सिल सकते, नाई उनके बाल नहीं काट सकते, अगर काटें तो दो हजार रुपए जुर्माना देना पड़ता है। मुस्लिम परिवार अपनी ही ज़मीन में खेती नहीं कर सकते। गुहा गांव के मुस्लिम इस संबंध में अपनी मांगों को लेकर करीब डेढ साल से तहसील कार्यालय के सामने पूरे-पूरे दिन का धरना दे रहे हैं, लेकिन अभी तक कोई सुनवाई नहीं हुई है। कुछ मुस्लिम परिवार तो हताशा में गांव छोड़कर चले गये हैं। पिछले कुछ सालों से इस तरह की तमाम छोटी-बड़ी घटनाएं महाराष्ट्र के अलग-अलग इलाकों से सुनाई दे रही हैं। संवेदनशील लोग चिंतित हैं, उनके मन में सवाल है – “हमारा महाराष्ट्र तो ऐसा नहीं था?”
कहीं-कहीं इस साम्प्रदायिक घटाटोप से निपटने की कोशिशें भी शुरु हुई हैं। महाराष्ट्र के अलग-अलग शहरों में धार्मिक भाईचारा बनाने की छोटी-बड़ी कोशिशों में पूना का ‘सलोखा’ नामक समूह है जो मुस्लिमों की मदद करता है। तुषार गांधी की पहल पर ‘हम भारत के लोग’ देश के अन्य सवालों के साथ धार्मिक सद्भाव का काम कर रहे हैं। मुंबई में ‘मुंबई फॉर पीस’ नामक समूह लोगों में भाईचारा बनाने का काम कर रहा है। इस सिलसिले में अभी एक जून को ‘मुंबई फॉर पीस’ की तरफ से दादर इलाके में एक शांति यात्रा का आयोजन किया गया, जिसमें लगभग 500 लोगों ने भाग लिया।
आज हमारे देश के मूल सवाल क्या हैं? बेरोजगारी, मंहगाई, गरीबी, महिलाओं की असुरक्षा, बिगड़ती हुई शिक्षण व्यवस्था, स्वास्थ्य व्यवस्था और सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सवाल। आम जनता का ध्यान देश के इन सवालों से हटाने का सबसे आसान तरीका है – हिंदू-मुस्लिम द्वेष बनाये रखना। हमारी और हमारे जैसे लोगों की जिम्मेदारी है कि इन तनावों से परे जाकर मूल सवालों पर काम करें। (सप्रेस)
सुश्री भारती दीवान सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं।


