देश में जीएसटी घटाने की चर्चा “स्वदेशी” के नाम पर हो रही है, पर असल में यह कदम गरीबों पर पड़े कर के बोझ को घटाने की बजाय बड़े पूँजीपतियों को राहत देने जैसा है। स्वदेशी का अर्थ आत्मनिर्भरता, समानता और न्याय है — न कि आर्थिक नारेबाज़ी। जब तक नीति निर्माण में इस दर्शन की सच्ची समझ नहीं होगी, तब तक “स्वदेशी” केवल एक राजनीतिक आवरण बनकर रह जाएगा।
देश में वर्तमान में जीएसटी घटाने पर बहुत चर्चा हो रही है और इसे “स्वदेशी” से जोड़कर पेश किया जा रहा है। यह बात चिंताजनक है कि पिछले आठ सालों में कर वसूली एक असुरी तरीके से की गई — जिसका सीधा निशाना गरीब जनता रही। गरीबों ने टैक्स दिया और उनकी जेबें और पेट पर इसका असर पड़ा। अब जीएसटी घटाकर बड़े पूँजीपतियों को लाभ पहुँचाने की स्थिति बन रही है, जबकि कहा जा रहा है कि अर्थव्यवस्था कमजोर होने के कारण पुराने, गलत नियमों में सुधार किया जा रहा है।
कुछ लोग तो पुरानी वैट व्यवस्था की वापसी की माँग कर रहे हैं — पर सवाल यही है कि क्या सरकार स्वदेशी दर्शन को समझती है, या यह सब बस एक और नारेबाज़ी बनकर रह जाएगा? “स्वदेशी” केवल नारा नहीं है; इसका अर्थ है उत्पादन, उपभोग और जीवनशैली में आत्मनिर्भरता और न्याय। उसे केवल राजनीतिक ढाल के रूप में प्रयोग करना असत्य है।
इसके साथ-साथ एक नई परिभाषा गढ़ने की कोशिश हो रही है — टैक्स को “बचत” बताकर पेश किया जा रहा है, जबकि कर हमेशा ही सार्वजनिक खर्चों में जाता है। वे खाते जिनमें कर की राशि जाती है, वह सेविंग अकाउंट नहीं बल्कि व्यय के खातों में ही दर्ज होती है। ऐसे में अगर कर घटा कर किसी को कुछ “बचत” दी जा रही है तो असल में वह समाज के कमजोर वर्गों से लिया गया संसाधन अब बड़े हितधारकों को दिया जा रहा है।
नतीजा यही होगा कि गरीब जनता बार-बार लूटी जाएगी — और स्वदेशी की झूठी वाणी गूँजती रहेगी पर उसका वास्तविक अध्ययन और प्रयोग नहीं होगा। जिन लोगों ने “स्वदेशी” के नारे लगाए, उन्होंने कभी उसके दर्शन को समझने या अपनाने की कोशिश ही नहीं की। हमें असली अर्थ में स्वदेशी के सिद्धांतों — न्याय, समानता और आत्मनिर्भरता — को समझ कर नीतियाँ बनानी चाहिए, न कि केवल नारेबाजी से जनभावनाओं का दोहन करना।
तकनीक का स्वदेशी और स्थानीय होना अत्यावश्यक है। इसके साथ ही पर्यावरण का ध्यान रखना और प्रकृति के साथ उसकी पूरकता का संबंध बनाए रखना भी उतना ही ज़रूरी है। व्यापार में विकेंद्रीकरण हो, ताकि हर व्यक्ति को रोज़गार मिले, आर्थिक समानता और समान वितरण सुनिश्चित हो। स्थानीय उत्पादन, प्रबंधन और वितरण की व्यवस्था समाज को सशक्त बनाती है।
दुनिया के किसी भी कोने में बसे हुए स्थानीय समुदाय से तकनीक साझा की जा सकती है, किंतु बड़ी फैक्टरियाँ और घातक तकनीक, उत्पादन अक्सर हिंसा को बढ़ावा देती हैं। स्वदेशी का मूल मंत्र ही अहिंसा है।
स्वदेशी को समझने के लिए खुले मन और व्यापक अंतर्दृष्टि की आवश्यकता है। इसके प्रति हमेशा सतर्क रहना चाहिए, क्योंकि यही प्रतिस्पर्धा और पूँजीवाद के विकल्प के रूप में खड़ा होता है। महात्मा गांधी ने भी इसी प्रकार की स्वदेशी की सोच को प्रस्तुत किया था, जिसमें स्वावलंबन, विकेंद्रीकरण और अहिंसा का गहरा संदेश निहित है।
तकनीक किसी भी देश या राष्ट्र के कब्ज़े में नहीं होनी चाहिए। यह सम्पूर्ण मानवता के लिए है, ताकि लोग जब चाहें इसे सीख सकें और साझा कर सकें। यदि राष्ट्र या राज्य इसमें अड़चनें डालेंगे तो यह स्वदेशी नहीं रह पाएगी।
तकनीक मूलतः समाज की संपत्ति है। चाहे वह हुनर हो या तकनीक, यह समाज की हज़ारों वर्षों की मेहनत और अनुभव से विकसित हुई है। परंतु वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं के एकाधिकार ने इस सहज प्रक्रिया को तोड़कर इसे जटिल और कृत्रिम बना दिया। परिणामस्वरूप भारत के विभिन्न स्थानीय अंचलों और समुदायों का ज्ञान धीरे-धीरे लुप्त हो गया। यही स्थिति अफ्रीका, ब्राज़ील, मैक्सिको और अन्य देशों के स्थानीय समुदायों के साथ भी हुई है।
आज हाथ से काम करना मानो अपराध या हीनता का प्रतीक समझा जाने लगा है। पूँजीपतियों और टेक्नोक्रेट्स की गठजोड़ ने इस संकट को और विकराल बना दिया है। तकनीक की सहजता और सरलता का मार्ग लगभग बंद कर दिया गया है।


