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जी. डी. अग्रवाल के बलिदान को कैसे स्मरण करेगें?

जी. डी. अग्रवाल के बलिदान को कैसे स्मरण करेगें?

जन्म दिवस (20 जुलाई) स्मरण प्रसंग प्रोफेसर जी डी अग्रवाल गंगा को अविरल और निर्मल बनाने के लिए प्रतिबद्ध संत थे. उन्हें स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद के नाम से भी जाना जाता था. आईआईटी का यह एक प्रोफेसर था, जिसे...

जन्म दिवस (20 जुलाई) स्मरण प्रसंग

राजेन्द्र सिंह

प्रोफेसर जी डी अग्रवाल गंगा को अविरल और निर्मल बनाने के लिए प्रतिबद्ध संत थे. उन्हें स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद के नाम से भी जाना जाता था. आईआईटी का यह एक प्रोफेसर था, जिसे बेस्ट टीचर का अवार्ड मिला, जिसने विदेश में पढ़ाई की और देश में आकर गंगा की सफाई के लिए जुट गया था. 20 जुलाई 1932 को जन्में प्रोफेसर अग्रवाल अविरल गंगा के पैरोकार थे और गंगा को बांधों से मुक्त कराने के लिए कई बार आंदोलन कर चुके थे. 112 दिनों के लंबे अनशन के बाद 12 अक्टूबर 2018 को उनका निधन हो गया था!

प्रो. जी. डी. अग्रवाल ( स्वामी ज्ञानस्वरूप सानन्द) के जीवन भर की गंगा तपस्या और सत्याग्रह में मिली सफलताओं के विरूद्ध हिमालय की हरियाली और माँ गंगा की पवित्रता नष्ट करने हेतु चार धाम रोड़ परियोजना है। इसे रद्द करने के लिए उच्चतम न्यायालय आदि ने भी पुनर्विचार करने को कहा था। लेकिन इस सरकार ने न्यायपालिका द्वारा बनाई समितियों की रपट तथा निर्णयों को भी दरकिनार कर दिया है। भागीरथी की संवेदनशीलता को नष्ट करने हेतु काम शुरू कर दिया है। 

भागीरथी की संवेदनशीलता सिद्धि को 17 जुलाई 2020 को प्रकाश जावेड़कर और नीतिन गड़करी ने रद्द करने का आदेश कर दिया है। आप सभी जानते है कि  स्वामी सानंद ने माँ गंगा को तीर्थ रूप में कायम रखने हेतु 2008 गंगा दशहरा पर उत्तर काशी में गंगा सत्याग्रह शुरू किया। उस समय माँ गंगा के उद्गम गोमुख से उत्तरकाशी तक 150 कि.मी लम्बी धारा भागीरथी को पर्यावरणीय संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया था। उस पर बन रहे तीन बाँध, विद्युत परियोजनाओं और सुरंगों को रद्द कर दिया था। लुहारी नागपाला परियोजना 60 प्रतिशत से अधिक बन चुकी थी। भैरू घाटी पर 20 प्रतिशत काम हुआ था। पालामनैरी भी 40 प्रतिशत बन चुकी थी। भारत सरकार ने माँ गंगा की अविरलता सुनिश्चित कराने की दिशा में पहल शुरू कर दी थी। जिससे भारत की अगली पीढ़ी गंगा जी के गंगत्व के गुणों को जान सके। देख – समझकर उनसे लाभान्वित होकर शुभ कर्म करने में जुट जाये।

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गंगत्व 17 तरह के मानवीय रोगाणुओं को नष्ट करने की क्षमता रखता है। ये मानवीय रोगाणु, जो मानव की सेहत के लिए हानिकारक है। उन्हें ही नष्ट करता है। गंगाजल की यह विशिष्टता केवल अविरल प्रवाह में ही उपलब्ध रहती हैं। जब जल ठहर जाता है, तो यह विशिष्ट गुण सिल्ट रूप में धरती पर बैठ जाता है। ऊपर केवल विशिष्ट गुण विहीन गंगा जल ही बचता हैं। इसे प्रो. जी. डी. अग्रवाल बहुत अच्छे से समझते थे। उन्होंने अपने बहुत से शिष्यों को आई. आई. टी. कानपुर से इसी विषय को जानने हेतु पी. एच. डी. कराई थी।

स्वामी सानंद जी ऐसे वैज्ञानिक थे, जो बिना जाने और बिना करके देखे किसी भी काम को नहीं करते थे। इसलिए गंगाजल की विशिष्टता को जानकर ही, उसे बचाने हेतु गंगा सत्याग्रह किया था। सत्याग्रह में उनको सबसे बड़ी सफलता भारत सरकार द्वारा अविरलता की जरूरत को स्वीकार करना था। उसके पहले 2008 और 2009 के गंगा सत्याग्रह की मांगों को सरकार ने वैसे के वैसे ही स्वीकार कर लिया था। गंगा बैसिन राष्ट्रीय प्राधिकरण बनाया। गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कराया । भागीरथी पर बन रहे तीनों बाँधों को रद्द कराया। भागीरथी की अविरलता की तरह ही अलकनंदा, मंदाकिनी को भी अविरल बनाने के हेतु गंगा सत्याग्रह करते हुए 11 अक्टूबर 2018 को अपने प्राणों का माँ गंगा के लिए बलिदान दे दिया ।

स्वामी सानंदजी के बलिदान की कहानी और उनके गंगाजी को तीर्थ रूप में रक्षित कराने हेतु 8 बार सत्याग्रह किया था। जिसमें भागीरथी को तो पूर्ण अविरल-निर्मल बनाने का रास्ता पूर्णतः खुल गया था। लेकिन वर्तमान सरकार ने गंगाजी के सभी नियम कानून प्राधिकरण आदि के निर्माण को रद्द का दिया है। इसलिए प्रो. जी. डी. अग्रवाल के बलिदान को कैसे स्मरण करेगें? अब तक उनके कार्यों से जो सफलतायें और सत्याग्रह को सिद्धी मिली थी, उन सब को इस सरकार ने ही निरस्त किया है। गड़करी साहब को केवल बड़ी-बड़ी सड़कें चाहिए। उन्हें गंगा जी नहीं चाहिए। उनकी सरकार भी अब चीन के रास्ते पर ही चलकर केवल आर्थिक विकास करना चाहती है। यह सरकार दुनिया में आर्थिक नेता बनने का स्वप्न देख रही है। प्रकृति और भारतीय आस्था उनके लिए कोई अर्थ नहीं रखती।

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गंगा भारतीय आस्था में सबसे बड़ी तीर्थ हैं। इसे ये मैला ढोने वाली माल गाड़ी बनाकर, गंगामाई से भी कमाई करना चाहते है। यह भारतीय आस्था पर प्रहार किया है। गंगाजी को सरकार माई बोलती है। ये ही माई की आस्था को नष्ट कर रहे है। जो माई नहीं चाहती; वही ये कर रहे है। इन्हें माई की तरह सम्मान करके भारतीय गंगा को प्रेम, सम्मान, विश्वास, श्रद्धा, आस्था, निष्ठा, भक्ति भाव को बनाये रखने वाली गंगाजल विशिष्टता को बचाये रखने तथा गंगा को अविरलता प्रदान करने हेतु भागीरथी की संवेदनशीलता कायम रखनी चाहिए।

भागीरथी को पर्यावरणीय संवेदनशील क्षेत्र घोषित होने के बाद, स्वामी सानंद चाहते थे कि  भारत की अगली पीढ़ी पुनः गंगा के गीत ‘‘मैं उस देश का वासी हूँ, जिस देश में गंगा बहती है।”  यह गीत तो तभी गाया जा सकता है, जब गंगा अपने विशिष्ट गंगाजल के साथ पहले की तरह ही अविरल प्रवाहित होगी। उनकी अंतिम माँग थी कि भागीरथी की तरह अलकनंदा और मंदाकिनी भी वैसी ही अविरल बहे। इन धाराओं के जल में भी वही गुण है। इन्हीं तीनों के मिलने से ही देवप्रयाग में गंगा का नामकरण होता है। उनकी इस बात को इस सरकार ने अनसुनी करके भुलाने का प्रयास उनके जन्मदिन पर ही शुरू किया है। प्रो. जी. डी. अग्रवाल ने जो भी काम अभी तक गंगा हेतु कराया था, उसे भी रद्द कर दिया। यह सरकारी प्रयास गंगा तीर्थ के विरूद्ध है। इस सरकार का कदम तीर्थों की महत्ता सड़कों द्वारा बढ़ाना है; जो निर्जीव है। सजीव गंगा की पवित्रता और हिमालय की हरियाली नष्ट करने वाली चार धाम रोड़ का प्रो. साहब बराबर विरोध कर रहे थे। सरकार उसे ही बना रही है। आप समझे यह सरकार प्रो. जी. डी. अग्रवाल को किस प्रकार स्मरण कर रही है?

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