प्लास्टिक पर पाबंदी: कानूनी पहल जरूरी

कुमार सिद्धार्थ

प्लास्टिक कचरा एक विकट समस्या बन चुका है। प्लास्टिक और पॉलीथिन के बढ़ते उपयोग को रोकने के लिए मध्यप्रदेश सरकार ने कानून भी बनाया है। प्लास्टिक के निपटान की कोई समुचित व्यवस्था न होने के कारण संपूर्ण धरती प्लास्टिकमय हो रही है। मुशिकल यह भी है कि बाजार के फैलाव के साथ वस्तुओं की बिक्री में थैलियों और पैकिंग आदि में पॉलिथीन का जितना इस्तेमाल बढ़ रहा है, उसका व्यावहारिक विकल्प निकाले बगैर इसे पूरी तरह रोक पाना शायद संभव नहीं होगा।

प्लास्टिक की थैलियों के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाने की घोषणा जैसी पहल में वैसे तो कोई नई बात नहीं है, लेकिन अब तक जहाँ प्लास्टिक को पर्यावरण के लिहाज से कई स्तरों पर खतरनाक बताकर इस पर रोक लगाने की पैरवी की जा रही थीं, वहीं राज्य सरकार ने प्लास्टिक पर पाबंदी के लिए पर्यावरण के मुद्दों के अलावा गाय एवं अन्य पशुओं के लिए खतरे को मुख्य वजह बताई है। सरकार के मुताबिक नए कानून में केवल प्लास्टिक की थैलियों और पन्नियों पर पाबंदी होगी, इससे बनने वाले अन्य सामानों पर कोई रोक नहीं होगी। आज बाजार में उपलब्ध घरेलू उपयोग की ज्यादातर वस्तुएँ प्लास्टिक से बनी होती हैं और सस्ती होने की वजह से लोग प्लास्टिक से बनी चीजों का इस्तेमाल अधिक करते हैं। इसी वजह से शायद सरकार ने फिलहाल प्रतिबंध को प्लास्टिक की थैलियों तक ही सीमित रखा है। वैसे भी लंबे समय से केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की अनेक समितियों के माध्यम से प्लास्टिक के अव्यवस्थित कचरे और प्लास्टिक के कचरे का पुनर्चक्रण न कर पाने की समस्याओं पर कई वर्षों तक विचार-विमर्श किया।

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देखना है कि प्रदेश  में इस नये कानून का किस तरह प्रभावी क्रियान्वयन होगा। गौरतलब है कि अनेक राज्य सरकारों ने भी प्लास्टिक से उत्पन्न पर्यावरण खतरों को महसूस किया है। इसके घातक प्रभावों के बारे में समय-समय पर चिंता जताई है। कई राज्य सरकारों ने प्लास्टिक प्रबंधन को नियंत्रित करने के लिए अपने स्तर पर नियम-कानून कायदे भी लागू किये। लेकिन दशकों से इससे निपटने और इस पर पाबंदी लगाने के दावों के बावजूद आज भी पॉलिथीन का इस्तेमाल रोका नहीं जा सका है। आंकडे दर्शाते हैं कि देश में 15,342 टन प्लास्टिक कचरा प्रतिदिन उत्पन्न होता है, जिसमें केवल 9,205 टन प्लास्टिक कचरे को पुर्नप्रयोग हो पाता है। यानी देश में प्रतिदिन लगभग 6,000 टन प्लास्टिक बिना पुनर्चक्रण के अभाव में सड़ता रहता है। वर्षभर में यह आंकड़ा 22 लाख टन से भी अधिक पहुँच जाता है। सही मायने में यदि इस समस्या पर चिंतन करें तो यह अपने आप में एक भयानक समस्या है।

शोध अध्ययन बताते हैं कि दिल्ली से हर साल कोई ढाई लाख टन प्लास्टिक का कूड़ा निकलता है, जो सीवर, टॉयलेट, मेडिकल वेस्ट के तौर पर, डायपर या अन्य रूपों में पानी में बहा दिया जाता है। गाय या अन्य पशुओं के लिए यह कचरा घातक है, वहीं दूसरी ओर छोटी मछलियाँ भी इस प्लास्टिक कूडे को खाना समझ कर खा लेती हैं। इन छोटी-बड़ी मछलियों को इंसान अपना भोजन बना लेते हैं। मछलियों के शरीर में पाया जाने वाला प्लास्टिक कई तरह से मछली खाने वालों के लिए जहरीला साबित हो सकता है। प्लास्टिक में तमाम तरह के रंग और कैमिकल जैसे बिसफेनौल ए, जैविक प्रदूषक और अन्य जहरीले तत्त्व होते हैं, जो मछलियों को भी जहरीला बना सकते हैं। कहने का आशय है कि ये प्लास्टिक का कूड़ा केवल जमीन को ही बर्बाद नहीं कर रहा है, इसे पानी में बहाने पर भी कई खतरे हैं।

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देश  में स्वच्छता के प्रति जागरूकता धीरे-धीरे बढ़ रही है। हम सब जानते हैं कि पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने में प्लास्टिक की थैलियों की क्या भूमिका रही है। आज देश में प्लास्टिक की छोटी-बड़ी, पतली और मोटी हर प्रकार की थैलियां खरीददारी का अंग बन चुकी हैं। विशेष समस्या प्लास्टिक की अत्यन्त पतली और पारदर्शी थैलियों की है, जो रोज के कूड़े-कचरे में इस प्रकार मिल जाती हैं कि सफाई की प्रक्रिया में उनको अलग करना भी मुष्किल हो जाता है। कूड़े में पतला प्लास्टिक कई दिन तक गर्मी के कारण सड़ता रहता है। यह प्लास्टिक की थैलियाँ अपने अंदर के रसायनिक पदार्थों को वायुमंडल में छोड़कर प्रदूषण फैलाती रहती हैं। वैज्ञानिक यह सिद्ध कर चुके हैं कि प्लास्टिक पदार्थों के जलने या गर्मी से सड़ने के कारण होने वाला वायु प्रदूषण सारी धरती के लिए एक खतरा बनता जा रहा है।

सच यह है कि थैलियों के साथ-साथ प्लास्टिक से बने सामानों को तैयार करने में भी कई तरह के खतरनाक रसायनों के घोल का इस्तेमाल होता है, जिसमें रखे गए खाने-पीने के सामान पर इसका सेहत के लिहाज से बुरा असर पड़ता है। इनमें कई ऐसे रसायन होते हैं जिनकी थोड़ी भी मात्रा अगर शरीर में चली जाए तो वह कैंसर की वजह बन सकती है, उससे घातक असर पड़ सकता है।

यह जरूर है कि प्लास्टिक-कूडे़ के निपटान के लिए देश  के कई स्थानों पर प्लास्टिक की सड़कें बनाई जा रही हैं। पुनर्चक्रित प्लास्टिक से बनी टाइल्स का प्रयोग करके जगह-जगह पर शौचालयों का निर्माण भी किया जा सकता है, और इससे सजावटी वस्तुएँ बनाने की पहल हो रही है। आन्तरिक सजावट की सह-सामग्री जैसे लैम्प शेड, फ्लोर-कुशन्स, फूल सजावट पात्र के लिए दिल्ली की स्वयंसेवी संस्था ‘कन्जर्व’ दिल्ली में बेकार प्लास्टिक की थैलियों को एकत्रित कर विभिन्न क्रमबध्द प्रक्रियाओं के  माध्यम से चादर में बदला जाता है और उनसे बहु-रंगी वस्तुएं बनाई जाती हैं। 

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मध्यप्रदेश सरकार ने प्लास्टिक की पतली थैलियों के उत्पादन और प्रयोग को लेकर उठाए सख्त कदम से पॉलीथीन के उपयोग पर रोक तो जरूर लग सकेगी। किंतु मुश्किल यह भी होगी कि बाजार के फैलाव के साथ-साथ वस्तुओं की बिक्री में थैलियों और पैकिंग आदि में पॉलिथीन का जितना इस्तेमाल होने लगा है, उसका व्यावहारिक विकल्प निकाले बगैर इसे पूरी तरह रोक पाना शायद संभव नहीं हो सकेगा। लेकिन प्लास्टिक के सही निपटाने की अब तक कोई कारगर पहल करने की जरूरत नहीं समझी गई। (सप्रेस)           

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