संपूर्ण क्रांति की असली कहानी सत्ता परिवर्तन से आगे शुरू होती है। यह उन लोगों की कहानी है जिन्होंने आंदोलन की चेतना को जीवन का संकल्प बनाया और जल, जंगल, जमीन, ग्राम स्वराज तथा सामाजिक पुनर्निर्माण के माध्यम से बदलाव की ऐसी मिसालें गढ़ीं, जो आज भी भारत के भविष्य को नई दिशा देने की क्षमता रखती हैं।
25 जून संपूर्ण क्रांति दिवस है। देश भर में 1975 के संपूर्ण क्रांति आंदोलन में शामिल रहे साथी इस दिवस को बड़े उत्साह से मनाते हैं। यह दिवस उन सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। मैं जानता हूँ कि संपूर्ण क्रांति आंदोलन में हजारों-लाखों युवा शामिल हुए थे, जिनमें से हजारों कार्यकर्ता पूर्णकालिक रूप से सामाजिक कार्यों में जुट गए थे। ये वे लोग थे, जो सरकारी नौकरियाँ छोड़कर आए थे, जिन्होंने अपने कॉलेज और विश्वविद्यालय की पढ़ाई छोड़ दी थी। वे अपने विचारों, अपनी अंतरचेतना और अंतःक्रांति के बल पर संपूर्ण क्रांति में शामिल हुए थे। उनके भीतर जो वैचारिक क्रांति थी, वही उन्हें संपूर्ण क्रांति के आह्वान से जोड़ती थी। इसलिए पूरे भारत के सभी राज्यों में हजारों लोग संपूर्ण क्रांति के दीवाने थे। वे गीत गाते थे, नए युवाओं को प्रेरित करते थे, उन्हें सामाजिक कार्यों से जोड़ते थे और उनके भीतर सामाजिक चेतना जगाने का कार्य करते थे।
यह सामाजिक चेतना देश भर में गहराई से फैल गई थी और इसी चेतना के बल पर देश एक तरह से अपने पैरों पर खड़ा हो गया था। इसका परिणाम यह हुआ कि देश में लगा आपातकाल समाप्त हुआ और नई व्यवस्था को देश संभालने का अवसर मिला। लेकिन तब तक संपूर्ण क्रांति के बीज लोगों के विचारों, व्यवहार और संस्कारों में पूरी तरह परिपक्व नहीं हुए थे। क्रांति के बीज सबके मन में थे, परंतु क्रांति की जो परिपक्वता होती है, वह अभी विकसित नहीं हुई थी।
उस काल में मैं अपने सैकड़ों साथियों से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा रहा। मैंने देखा कि जो लोग राजनीतिक बदलाव और राजनीतिक क्रांति चाहते थे, वे बैठकों, सभाओं, सम्मेलनों और संघर्षों में दिन-रात परिश्रम करते थे। वे अपने विचारों की परिपक्वता के लिए लगातार काम करते थे। लेकिन कुछ लोगों को यह राजनीतिक परिवर्तन स्वीकार नहीं था। ऐसे भी अनेक लोग थे जिन्हें यह देखकर निराशा होती थी कि संपूर्ण क्रांति के कुछ साथी सत्ता के साथ चिपकने लगे थे और वही कार्य करने लगे थे जो पुराने राजनेता करते थे। यद्यपि उनमें सादगी और सद्भावना थी, इसलिए पुराने शासकों की तुलना में कुछ अंतर अवश्य था, पर सत्ता की प्रकृति ऐसी थी कि उसमें संवेदनशीलता उतनी दिखाई नहीं देती थी।
विभिन्न विचारधाराओं के मिश्रण के कारण धीरे-धीरे पुराने राजनीतिक दलों की कमियाँ भी दिखाई देने लगीं। परिणामस्वरूप लगभग 2.5 वर्षों में ही सत्ता का बिखराव होने लगा। इसके बाद कई लोग प्रकृति और समाज के निर्माणकारी कार्यों में लग गए। कुछ बड़े बाँधों के विरोध में खड़े हुए, कुछ गरीबों को भूमि दिलाने के आंदोलनों में जुट गए। गया का आंदोलन भी इसी संपूर्ण क्रांति आंदोलन की देन था। आज भी इसी आंदोलन से निकले पंकज भाई जैसे लोग गरीबों को जमीन दिलाने में लगे हुए हैं। अनेक साथी विज्ञान को लोकविज्ञान बनाने, तकनीक को लोक तकनीक और लोक अभियांत्रिकी में बदलने तथा दुनिया भर में इस विचार को फैलाने के कार्य में जुट गए। कंचन मुक्ति से लेकर बिना पैसे की दुनिया जैसे विचारों तक, अनेक प्रयोग हुए। सतीश कुमार जी, जो पहले जैन मुनि रहे और बाद में संपूर्ण क्रांति आंदोलन के सक्रिय साथी बने, उन्होंने विश्व यात्राएँ कर इस विचार को फैलाया। संपूर्ण क्रांति का अर्थ केवल भारत में नहीं, बल्कि पूरे विश्व में परिवर्तन की आकांक्षा से था, इसलिए लोग बड़े उत्साह से इस कार्य में लगे।
मेरे जैसे लोग, जो संपूर्ण क्रांति की बैठकों में सबसे पीछे बैठते थे, उन्हें यह अनुभव हुआ कि इस भागदौड़ और संघर्ष के बीच हमें अपने स्तर पर कुछ करना चाहिए। यद्यपि मेरा स्वभाव अकेले काम करने का नहीं था, मैं साथियों के साथ मिलकर काम करने में विश्वास रखता था, फिर भी मुझे लगा कि कुछ कार्य अकेले प्रारंभ करने होंगे। कुछ समय मैंने सरकार के साथ काम किया और बाद में समाज के साथ। जब मैं पुनः सरकारी दायित्वों में गया, तब भी अरावली के बढ़ते तापक्रम और पर्यावरणीय संकट को लेकर चिंतित रहता था। उस समय यह समस्या मुझे बहुत बड़ी दिखाई देती थी। खनन करने वाले प्रभावशाली लोग थे, इसलिए मैं तत्काल उनसे टकराने की स्थिति में नहीं था, लेकिन इस विषय को समझने के लिए संगोष्ठियाँ, यात्राएँ और चर्चाएँ करता रहता था।
जवाहर नगर में हमने अरावली से संबंधित संगोष्ठियाँ आयोजित कीं और फिर यह विचार किया कि यदि अरावली को पुनर्जीवित करना है तो ऐसे क्षेत्र से शुरुआत करनी होगी जहाँ विनाश अपेक्षाकृत कम हुआ हो। जब मैंने ऐसी जगह खोजने का प्रयास किया तो पाया कि लगभग पूरा क्षेत्र खनन की मार झेल चुका था। थानागाजी, अलवर और राजगढ़ क्षेत्र में खानों के कारण भूजल सूख चुका था, नदियाँ सूख गई थीं और कुएँ भी समाप्त हो रहे थे। चारों ओर विनाश दिखाई देता था।
जब मैंने सरकारी नौकरी छोड़ी, तब स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में काम प्रारंभ किया। उस समय संपूर्ण क्रांति के वरिष्ठ चिंतक सिद्धराज ढड्डा जी मेरे साथ गाँवों में गए। उनसे बहुत कुछ सीखने और समझने का अवसर मिला। बाद में जब मैंने शिक्षा और स्वास्थ्य के कार्यों से आगे बढ़कर पानी के काम को अपना केंद्र बनाया, तब सिद्धराज जी ने कहा था कि यदि आज महात्मा गांधी जीवित होते तो जैसे उन्होंने मैनचेस्टर के औद्योगिक प्रभुत्व के विरुद्ध चरखे को स्वावलंबन का प्रतीक बनाया था, वैसे ही आज वे जल स्वराज का आंदोलन खड़ा करते। वे कहते थे कि पानी की लूट से देश को बचाने का कार्य ही आज की सबसे बड़ी क्रांति है और यही हमें संपूर्ण क्रांति की ओर ले जाएगा।
वे अक्सर कुछ नारे बड़े उत्साह से दोहराते थे- “गाँव का पानी गाँव में, गाँव की माटी गाँव में”, “हर अमावस्या को हो ग्रामसभा”, और “गाँव की छोटी समस्याएँ गाँव में ही सुलझें।” उनका विश्वास था कि जब गाँव का पानी गाँव में रहेगा, तब खेती समृद्ध होगी, मिट्टी बचेगी और ग्राम स्वराज स्थापित होगा। उस समय मुझे भी यह विचार बहुत बड़ा और कठिन लगता था, लेकिन धीरे-धीरे काम करते हुए मैंने देखा कि जब गाँव के लोग तालाब बनाते हैं तो वे श्रमदान करते हैं, बैठकर निर्णय लेते हैं कि किस परिवार को कितना योगदान देना है और सामूहिक प्रयास से निर्माण कार्य पूरा करते हैं।

तरुण भारत संघ उस समय संसाधनों से लगभग खाली था, फिर भी समाज की चेतना इतनी मजबूत थी कि लोग स्वयं आगे बढ़कर काम करते थे। धीरे-धीरे यह जल क्रांति एक गाँव से निकलकर एक नदी तक पहुँची और फिर पूरे नदी क्षेत्र में फैल गई। अरवरी नदी के पुनर्जीवन के साथ लोकतंत्र के विकेंद्रीकरण की दिशा में नदी संसद का गठन हुआ। इस प्रक्रिया में सिद्धराज ढड्डा, अनिल अग्रवाल और देश के अनेक चिंतक जुड़े। इस पूरी प्रक्रिया को देखकर प्रशासनिक अधिकारी भी प्रभावित होते थे। उन्हें आश्चर्य होता था कि गाँव आज भी अपनी ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ जीवित हैं।
मैंने देखा कि जहाँ पानी लौटा, वहाँ शहरों में गए लोग वापस अपने गाँवों में लौटे और खेती करने लगे। जब सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से अरावली की हजारों खदानें बंद हुईं तो अनेक लोग बेरोजगार हो गए। उन्हें जल संरक्षण का प्रशिक्षण दिया गया। इस प्रशिक्षण ने उनमें नई चेतना जगाई। जो लोग पहले खनन के कारण सिलिकोसिस जैसी बीमारियों के शिकार हो रहे थे, वे अब सम्मानजनक और स्वस्थ जीवन की ओर बढ़ने लगे। वे आत्मनिर्भर बने, सम्मानित बने और समृद्ध भी बने। यही प्रक्रिया वास्तविक परिवर्तन की प्रक्रिया थी।
संपूर्ण क्रांति आंदोलन के दौरान जिन बातों पर हम सभाओं में चर्चा करते थे, वे बातें अब जमीन पर प्रत्यक्ष दिखाई देने लगी थीं। 1970 और 1980 के दशक में संपूर्ण क्रांति की जो बातें मेरे मन, मस्तिष्क और हृदय में बैठ गई थीं, उन्हें व्यवहार में उतारने का अवसर बाद में मिला। जब मैं गोपालपुरा पहुँचा तो सबसे पहले चबूतरे वाला जोहड़ बनाया। फिर आगे चलकर अनेक बाँध और जोहड़ बने। जैसे-जैसे पानी लौटा, यह प्रयास एक व्यापक जल क्रांति में बदल गया।
इस जल क्रांति ने समता, सादगी, श्रमनिष्ठा से समाज निर्माण के उन मूल्यों को व्यवहार में स्थापित किया जो संपूर्ण क्रांति के मूल बीज थे। शोषण, प्रदूषण और अतिक्रमण को रोकने की दिशा में भी सकारात्मक परिणाम दिखाई देने लगे। इन कार्यों के प्रति पहले प्रेम पैदा हुआ, फिर विश्वास और अंततः श्रद्धा का भाव विकसित हुआ।
आज मैं सत्तर वर्ष की आयु के निकट हूँ, लेकिन मेरे भीतर काम करने का उत्साह वैसा ही है जैसा सत्ताईस वर्ष की उम्र में था। जब मैं अपना आत्ममूल्यांकन करता हूँ तो समझ में आता है कि यह सब इसलिए संभव हुआ क्योंकि मेरी युवावस्था में संपूर्ण क्रांति का विचार, व्यवहार और संस्कार मेरे मन, मस्तिष्क और हृदय में गहराई से बस गया था। उसी संस्कार ने मुझे श्रमनिष्ठ बनाया, मेहनती बनाया और समाज के प्रति समर्पित बनाए रखा।
मैं आज भी मानता हूँ कि संपूर्ण क्रांति की अवधारणा को वास्तविक रूप देने वाले कार्य वही हैं जो जल, मिट्टी, हवा और आकाश को स्वस्थ बनाए रखने का प्रयास करते हैं। ऐसे कार्य हमें संपूर्ण क्रांति की ओर ले जाते हैं क्योंकि इनमें प्रकृति और संस्कृति के प्रति सद्भावना निहित होती है। आज धार्मिक सद्भावना जितनी आवश्यक है, उससे कहीं अधिक प्रकृति और संस्कृति के प्रति सद्भावना की आवश्यकता है। यदि हमारे व्यवहार में प्रकृति और संस्कृति के प्रति सम्मान होगा, तो हमारा आचरण भी सद्भावनापूर्ण होगा और सभी धर्मों के प्रति समान आदर विकसित होगा। इसलिए मेरा विश्वास है कि जल, जमीन और प्रकृति की रक्षा के लिए किया गया कार्य ही हमें वास्तविक संपूर्ण क्रांति की ओर ले जाता है।


