पश्चिमी मीडिया ने लगातार उछाला है कि ईरान-इजरायल-अमेरिका के संघर्ष में मुस्लिम देशों का शिया-सुन्नी विभाजन भी अहम भूमिका अदा करता है, जबकि गहराई से देखें तो पूंजी और प्रभाव के सामने साम्प्रदायिकता का यह नजरिया बेकाम साबित होता है। क्या है, खाड़ी के देशों की धार्मिक निष्ठाओं की भूमिका? क्या इन पहचानों ने पश्चिम एशिया के देशों के विभाजन में कोई भूमिका निभाई है?
मध्य-पूर्व की राजनीति को अक्सर शिया-सुन्नी विभाजन के चश्मे से देखा जाता है, लेकिन वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में फिलिस्तीन का मुद्दा इस पारंपरिक धारणा को गंभीर रूप से चुनौती देता है। फिलिस्तीनी समाज लगभग पूरी तरह (करीब 90–95%) सुन्नी है, फिर भी उन्हें सबसे मजबूत और निरंतर समर्थन शिया राष्ट्र ईरान से मिल रहा है। आज का मध्य-पूर्व धार्मिक पहचान के बजाय दो नए ध्रुवों में बंट चुका है।
एक ओर प्रतिरोध की धुरी सक्रिय है, जिसमें शिया-बहुल ईरान, सीरिया और हिज़्बुल्लाह के साथ-साथ सुन्नी हमास और यमन के हूती (ज़ैदी शिया) जैसे ‘गैर-राज्य संगठन’ शामिल हैं। धार्मिक भिन्नताओं के बावजूद ये सभी एक साझा साम्राज्य-विरोधी मंच पर एकजुट दिखाई देते हैं। इस गठबंधन का प्राथमिक उद्देश्य क्षेत्र में अमेरिकी प्रभुत्व वाली वैश्विक व्यवस्था को चुनौती देना और मौजूदा शक्ति संतुलन को बदलना है।
दूसरी तरफ, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और मिस्र जैसे शक्तिशाली सुन्नी राष्ट्र हैं, जो क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक व्यापार को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता मानते हैं। इन देशों के लिए फिलिस्तीन के प्रति सक्रिय सैन्य एकजुटता दिखाने के बजाय ‘अब्राहम समझौते’ जैसे कूटनीतिक प्रयास और पश्चिमी शक्तियों के साथ सुरक्षा गठबंधन कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं।
इस कूटनीतिक बदलाव के मूल में बड़े आर्थिक गलियारे और वैश्विक आर्थिक हब बनने की महत्वाकांक्षा है। इज़रायल के साथ संबंधों को सामान्य बनाना इन देशों की एक रणनीतिक मजबूरी बन चुकी है, ताकि वे अपने राष्ट्रीय विकास और दीर्घकालिक आर्थिक हितों को सुरक्षित कर सकें। यहाँ स्पष्ट रूप से व्यावहारिक राजनीति फिलिस्तीनी न्याय की पुकार पर हावी होती दिखाई दे रही है।
फिलिस्तीन संघर्ष अब मात्र एक क्षेत्रीय या धार्मिक विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक न्याय और शक्ति-संतुलन की एक नई कसौटी बन चुका है। अरब जगत का यह वैचारिक और राजनीतिक बिखराव इस वास्तविकता को रेखांकित करता है कि भविष्य में मध्य-पूर्व की दिशा धार्मिक पहचान के बजाय, साम्राज्यवाद के विरुद्ध उभरते नए रणनीतिक गठजोड़ों और शक्ति-समीकरणों से तय होगी।
भले ही अरब देशों की सरकारें अमेरिका या इजरायल के साथ कूटनीतिक संतुलन बनाने का प्रयास करती हैं, लेकिन अरब जन-मानस (अरब स्ट्रीट) का फिलिस्तीन के प्रति भावनात्मक और धार्मिक जुड़ाव इतना गहरा है कि सरकारें इसे नजरअंदाज करने का जोखिम नहीं उठा सकतीं। इसलिए उन्हें फिलिस्तीन के पक्ष में खड़ा होना और प्रतीकात्मक समर्थन देना पड़ता है।
वास्तव में, अरब सरकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी आंतरिक स्थिरता और सत्ता-संरक्षण की है। उन्हें डर रहता है कि फिलिस्तीन के समर्थन में उमड़ने वाला जनाक्रोश कहीं उनके ही देशों में सत्ता-विरोधी आंदोलनों को न भड़का दे। ‘अरब स्प्रिंग’ के अनुभव ने दिखाया है कि जनभावनाएँ जब सड़कों पर उतरती हैं, तो वे शासन की वैधता और सत्ता-व्यवस्था को भी चुनौती दे सकती हैं।
वर्तमान में दुनिया में 57 मुस्लिम बहुल देश और लगभग 2 अरब की मुस्लिम आबादी है, जो वैश्विक जनसंख्या का करीब 25 प्रतिशत हिस्सा है। इतनी विशाल जनसांख्यिकीय और आर्थिक क्षमता होने के बावजूद, यह समुदाय राजनीतिक रूप से गहराई से विभाजित है। ‘ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन’ जैसी संस्थाओं की निष्क्रियता यह दर्शाती है कि मुस्लिम देश अब भी एक साझा, प्रभावी और निर्णायक रणनीति बनाने में असमर्थ हैं।
यह विशाल आबादी अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों, विविध आर्थिक प्रणालियों और परस्पर विरोधी राष्ट्रीय हितों में बंटी हुई है। यही कारण है कि फिलिस्तीनी मुद्दे पर व्यापक जन-समर्थन के बावजूद इन देशों की भूमिका अक्सर कूटनीतिक बयानों और प्रतीकात्मक विरोध तक सीमित रह जाती है।
इस संघर्ष ने यह भ्रांति भी तोड़ दी कि मुस्लिम देश एकजुट होकर न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं। वास्तविकता इसके सर्वथा विपरीत है। जहाँ फिलिस्तीनी जनता अपने अस्तित्व और न्याय के लिए संघर्षरत है, वहीं अधिकांश मुस्लिम राष्ट्र अपनी आंतरिक सुरक्षा, सत्ता के संरक्षण और वैश्विक शक्तियों के साथ अपने व्यापारिक संबंधों के अंतर्विरोधों में उलझे हुए हैं।
मुस्लिम जगत का यह बिखराव साम्राज्यवादी शक्तियों के लिए सबसे बड़ा अवसर बन जाता है, जो इन आंतरिक अंतर्विरोधों का लाभ उठाकर अपने हितों को आगे बढ़ाती हैं। विभिन्न वैश्विक और क्षेत्रीय शक्तियाँ अपने-अपने हितों के अनुसार इस विभाजन का उपयोग करती रही हैं। परिणामस्वरूप मानवीय संवेदनाओं को हाशिए पर धकेल दिया जाता है।
अमेरिका और इज़रायल ने इसी स्थिति का रणनीतिक लाभ उठाते हुए सुन्नी राष्ट्रों की सुरक्षा चिंताओं, विशेषकर ईरान के बढ़ते प्रभाव के भय को हथियार बनाया है और उनके साथ अपने सुरक्षा गठबंधनों को मजबूत किया है। वहीं दूसरी ओर, चीन द्वारा ईरान-सऊदी संबंधों में मध्यस्थता की सफल कोशिश और सीरिया में रूस का बढ़ता प्रभाव यह दर्शाता है कि एक पश्चिमी प्रभुत्व को चुनौती देने वाला वैकल्पिक शक्ति-संतुलन आकार ले रहा है। यह बहुध्रुवीय विश्व के उभरने का संकेत है।
पश्चिमी साम्राज्यवादी शक्तियाँ अक्सर लोकतंत्र और मानवाधिकार के आवरण में अपने हितों की रक्षा के लिए एकजुट होकर, एक सुव्यवस्थित इकाई की तरह काम करती हैं। अपने आर्थिक वर्चस्व और सामरिक नियंत्रण को बनाए रखने के लिए वे कई बार अंतरराष्ट्रीय कानूनों और बुनियादी मानवीय अधिकारों को भी दरकिनार करने में संकोच नहीं करते। इसके विपरीत, उनके विरुद्ध खड़ा प्रतिरोध अक्सर नेतृत्व के संकट, संसाधनों के अभाव और आपसी प्रतिस्पर्धा का शिकार हो जाता है।
साम्राज्यवाद का एक आधुनिक और सूक्ष्म रूप सोच पर नियंत्रण भी है। पश्चिमी मीडिया और वैश्विक डिजिटल मंच सूचनाओं के प्रवाह को इस तरह नियंत्रित करते हैं कि दमित समुदायों के न्यायसंगत प्रतिरोध को आतंकवाद और हमलावर की आक्रामकता को आत्मरक्षा के रूप में स्थापित कर दिया जाता है। यह डिजिटल शक्ति-संतुलन आज के दौर में साम्राज्यवाद का सबसे अदृश्य और घातक हथियार बन चुका है।
फिलिस्तीन अब ‘ग्लोबल साउथ’ के लिए औपनिवेशिक अन्याय के विरुद्ध साझा एकजुटता का प्रतीक बन चुका है। दक्षिण अफ्रीका द्वारा ‘अंतरराष्ट्रीय न्यायालय’ में इजरायल की सैन्य कार्रवाई को चुनौती देना इस तथ्य का ठोस प्रमाण है कि यह संघर्ष अब संकीर्ण संप्रदायवाद की सीमाओं को लांघ चुका है। यह अब केवल एक क्षेत्रीय मुद्दा न रहकर अंतरराष्ट्रीय न्याय व्यवस्था की जवाबदेही का प्रश्न बन गया है। आज फिलिस्तीन केवल एक भू-राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि साम्राज्यवाद बनाम न्याय की वैश्विक कसौटी बन गया है। यह संघर्ष आत्मनिर्णय के अधिकार और मानवीय गरिमा की बहाली का एक स्पष्ट आह्वान है। यह दुनिया को याद दिलाता है कि जब तक बुनियादी मानवाधिकार सुरक्षित नहीं होते, तब तक न्याय की वैश्विक अवधारणा अधूरी रहती है। (सप्रेस)

