श्री काशिनाथ त्रिवेदी स्मृति चतुर्थ व्याख्यानमाला
इंदौर, 16 फरवरी। “आधी आबादी को उसका पूरा हक मिलना चाहिए, क्योंकि स्त्री की असली पहचान और स्वतंत्रता उसके स्वावलंबन में है।” यह विचार वर्धा (महाराष्ट्र) से आईं पर्यावरणविद एवं स्त्री-शक्ति के लिए समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. प्रीति जोशी ने व्यक्त किए। वे श्री मध्य भारत हिन्दी साहित्य समिति एवं संस्था कल्याणी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित चतुर्थ श्री काशिनाथ त्रिवेदी स्मृति व्याख्यान माला में मुख्य वक्ता के रूप में अपने तीन दशकों के सामाजिक अनुभव साझा कर रही थीं।
डॉ. जोशी ने कहा कि उन्होंने पिछले 30 वर्षों में देश के विभिन्न क्षेत्रों—विशेषकर बस्तर, ग्रामीण इलाकों और शहरी बस्तियों—में काम करते हुए महिलाओं की वास्तविक स्थिति को करीब से देखा है। उनके अनुसार महिलाओं की समस्याएं केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक स्वीकृति, स्वास्थ्य, शिक्षा और सम्मान से भी जुड़ी होती हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि जब महिलाओं को अवसर, प्रशिक्षण और विश्वास मिलता है तो वे न केवल अपने जीवन, बल्कि पूरे समाज की दिशा बदल सकती हैं।
अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बस्तर का उल्लेख किया, जहां वर्ष 2000 के आसपास आदिवासी समुदाय के लिए 100 रुपये भी बड़ी राशि मानी जाती थी और लोग जड़ी-बूटियों की खेती इसलिए नहीं करना चाहते थे कि कहीं उनका पारंपरिक ज्ञान उजागर न हो जाए। ऐसे में महिलाओं को गढ़चिरौली ले जाकर औषधि निर्माण का प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण के बाद महिलाओं ने स्वयं दवाएं बनाईं और जरूरतमंदों में निःशुल्क वितरित कीं। उन्होंने बताया कि नक्सल क्षेत्र का भय दिखाकर अक्सर बाहरी लोगों को वहां जाने से रोका जाता है, जबकि वास्तविकता यह है कि आदिवासी समाज अपनी गरिमा और परंपराओं के साथ जीना चाहता है।
डॉ. जोशी ने गांवों में किए गए अपने कार्यों का उल्लेख करते हुए बताया कि अधिकांश महिलाएं अत्यधिक श्रम के बावजूद कुपोषण और एनीमिया से ग्रस्त थीं, क्योंकि भोजन पर्याप्त और संतुलित नहीं था। इस समस्या के समाधान के लिए किचन गार्डन का प्रशिक्षण दिया गया। मात्र छह माह में ही परिणाम दिखने लगे—महिलाओं ने 100 प्रतिशत जैविक अनाज उगाया, बीज और सब्जियां आपस में बांटीं, और जांच में सभी का हीमोग्लोबिन स्तर बढ़ा पाया गया। इस पहल को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और सरकारी एजेंसियों ने भी सराहा तथा आगे बढ़ाया। विदर्भ क्षेत्र में आठ संगठनों के सहयोग से “एनीमिया फ्री फोरम” का गठन किया गया, जिससे लगभग पांच हजार लोग जुड़े; इसे स्थापित करने में दस वर्षों का सतत प्रयास लगा।

उन्होंने 2019 से कचरा बीनने वाली महिलाओं के साथ किए गए कार्य का भी विस्तार से उल्लेख किया। इन महिलाओं के पास पहचान के दस्तावेज तक नहीं थे। प्रशासन से अनुमति लेकर उनके आधार कार्ड और राशन कार्ड बनवाए गए, जिससे उन्हें अंत्योदय योजना के तहत 35 किलो अनाज मिलने लगा। स्वयं सहायता समूह बनाकर बैंक खाते खुलवाए गए और शुरुआती राशि भी उपलब्ध कराई गई, जिसे महिलाओं ने समय पर वापस कर दिया। नगर परिषद द्वारा खातों में 10 हजार रुपये जमा किए गए तथा बैंक से मिले दो लाख रुपये के ऋण को भी समय पर चुका दिया गया। उन्होंने कहा कि इन महिलाओं की ईमानदारी अद्भुत है—एक भी रुपया डूबा नहीं।
कोरोना काल में उन्हें कौशल विकास प्रशिक्षण दिया गया, जिससे वे स्वावलंबी बनीं। उन्हें बागवानी, साबुन और अगरबत्ती निर्माण, तथा गीले कचरे से खाद बनाने का प्रशिक्षण मिला। छह माह में तैयार खाद से सब्जियां उगाकर अच्छी आय होने लगी। नगर परिषद ने उद्यानों की देखरेख का कार्य भी इन्हीं महिलाओं को सौंपा। उनके कार्यों से समाज का नजरिया बदला और दिवाली जैसे अवसरों पर लोग अपने घरों की सफाई के लिए इन्हीं महिलाओं को आमंत्रित करने लगे।
डॉ. जोशी ने अपने प्रेरणास्रोत काशिनाथ त्रिवेदी को स्मरण करते हुए कहा कि बचपन में उनके सानिध्य ने ही उनके जीवन को दिशा दी और सामाजिक-रचनात्मक चेतना को बल प्रदान किया, जिसके कारण वे समाज के वंचित वर्गों के साथ निरंतर कार्य कर सकीं।
कार्यक्रम का संचालन श्री अनिल त्रिवेदी ने किया और कहा कि दादा की प्रेरणा हर पीढ़ी का मार्गदर्शन करती है। संस्था कल्याणी की संस्थापक अध्यक्ष कविता त्रिवेदी ने वक्ता परिचय देते हुए कहा कि डॉ. प्रीति जोशी का समर्पित और रचनात्मक जीवन हर स्त्री के लिए प्रेरणा है। अंत में श्री मध्य भारत हिन्दी साहित्य समिति के प्रधानमंत्री श्री अरविंद जावलेकर ने सभी अतिथियों और उपस्थित जनों का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में प्रबुद्ध नागरिकों की उपस्थिति रही।


