वन्‍य जीव एवं जैव विविधता वैश्विक पर्यावरण समाचार

“अरावली पर्वतमाला की पारिस्थितिकी, पर्यावरण और कृषि” विषयक अंतरराष्ट्रीय कॉन्क्लेव की जनघोषणा

“अरावली पर्वतमाला की पारिस्थितिकी, पर्यावरण और कृषि” विषयक अंतरराष्ट्रीय कॉन्क्लेव की जनघोषणा

उदयपुर। भारत और दुनिया से आए विशेषज्ञ एवं पर्यावरण चिंतक अरावली पर्वतमाला के संरक्षण के साझा संकल्प के साथ उदयपुर में एकत्र हुए। 7–8 फरवरी को जनार्दन राय नगर राजस्थान विद्यापीठ (डीम्ड-टू-बी विश्वविद्यालय) में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कॉन्क्लेव, चौथे...

उदयपुर। भारत और दुनिया से आए विशेषज्ञ एवं पर्यावरण चिंतक अरावली पर्वतमाला के संरक्षण के साझा संकल्प के साथ उदयपुर में एकत्र हुए। 7–8 फरवरी को जनार्दन राय नगर राजस्थान विद्यापीठ (डीम्ड-टू-बी विश्वविद्यालय) में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कॉन्क्लेव, चौथे विश्व जल सम्मेलन का हिस्सा था। इसमें वैज्ञानिकों, सामुदायिक नेताओं, नीति-निर्माताओं, शिक्षाविदों, युवा प्रतिनिधियों और अंतरराष्ट्रीय प्रतिभागियों की व्यापक भागीदारी रही। सर्वसम्मति से अरावली को भारत के भविष्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण एक जीवित पारितंत्र घोषित करते हुए विशेषज्ञों ने इसे देश की “जलवायु ढाल” बताया।

वक्ताओं ने कहा कि अरावली केवल एक भू-वैज्ञानिक संरचना नहीं, बल्कि जल, जैव-विविधता, कृषि, संस्कृति और मानव बस्तियों को सहारा देने वाली समग्र जीवन-प्रणाली है। यह पर्वतमाला जलवायु की प्राकृतिक नियंत्रक, मृदा एवं जलग्रहण क्षेत्रों की संरक्षक तथा भू-सांस्कृतिक पहचानों का आधार है। अनेक नदियाँ और जलधाराएँ अरावली से उद्गमित होती हैं तथा यह भूजल भंडारों का पुनर्भरण कर क्षेत्रीय पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखती है। अतः इसकी रक्षा को सभ्यतागत दायित्व बताया गया।

कॉन्क्लेव में भूजल क्षरण, जैव-विविधता की हानि, भूमि क्षरण, अनियंत्रित खनन और अन्य पारिस्थितिक रूप से हानिकारक गतिविधियों पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई। विकास को चक्रीय पारिस्थितिक-आर्थिक मॉडल, वैज्ञानिक विनियमन और ढलान स्थिरता के सिद्धांतों के अनुरूप संचालित करने की आवश्यकता रेखांकित की गई।

पर्वतों की समझ और प्रबंधन के लिए आधुनिक तकनीक—जैसे उपग्रह चित्रण, भू-आकृतिक मानचित्रण—के साथ पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों के समन्वय पर बल दिया गया। अरावली संरक्षण को संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) तथा अनुच्छेद 48A (पर्यावरण संरक्षण का राज्य का दायित्व) सहित सार्वजनिक न्यास और अंतर-पीढ़ीगत समानता के सिद्धांतों से जोड़ा गया।

See also  भू-सांस्कृतिक मानचित्रण : स्वदेशी ज्ञान से सतत विकास की ओर

वक्ताओं ने कहा कि अरावली की पहचान समुदायों और परिदृश्यों के बीच ऐतिहासिक संबंधों में निहित है। निर्णय-प्रक्रिया को बहु-स्तरीय एवं सहभागितापूर्ण बनाते हुए स्थानीय समुदायों की भूमिका सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल दिया गया। आदिवासी और स्थानीय ज्ञान पर आधारित विकेंद्रीकृत जल प्रबंधन तथा सह-अस्तित्व की जीवन-दृष्टि को दीर्घकालिक संरक्षण का आधार माना गया।

दूसरे दिन कृषि पर विशेष चर्चा हुई। युवाओं और खेती के बीच बढ़ती दूरी पर चिंता व्यक्त करते हुए कृषि को सम्मानजनक, नवाचारी और आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाने का आह्वान किया गया। जैविक खेती, मृदा संरक्षण और सतत कृषि पद्धतियों को पारिस्थितिक संतुलन और ग्रामीण सशक्तिकरण के प्रभावी माध्यम के रूप में प्रस्तुत किया गया। “अरावली उत्पाद” की पारिस्थितिक एवं सांस्कृतिक पहचान विकसित करने का सुझाव भी सामने आया।

जल को समस्त विमर्श की केंद्रीय कड़ी मानते हुए सामुदायिक जल संरक्षण, कम लागत वाली जल संरचनाएँ और सहभागितापूर्ण जलग्रहण प्रबंधन को पुनर्जीवन के प्रभावी उपकरण बताया गया। यह साझा समझ बनी कि अरावली एक पारिस्थितिक गलियारा, सांस्कृतिक परिदृश्य और जीवित तंत्र है, जो क्षेत्रीय जलवायु को नियंत्रित करता है तथा मरुस्थलीकरण के विरुद्ध प्राकृतिक ढाल का कार्य करता है। इसकी पारिस्थितिक अखंडता को एकीकृत शासन, सतत कृषि, जल संरक्षण, वैज्ञानिक मानचित्रण और विशेष रूप से युवाओं की सक्रिय सहभागिता से सुदृढ़ करने का संकल्प लिया गया।

जनार्दन राय नगर राजस्थान विद्यापीठ ने अरावली क्षेत्र में जागरूकता एवं युवा सहभागिता कार्यक्रम प्रारंभ करने की घोषणा की। इस पहल में 20 विश्वविद्यालय, 40 महाविद्यालय और 100 विद्यालय अभियान, शैक्षिक कार्यक्रमों और सामुदायिक साझेदारी के माध्यम से भाग लेंगे। अरावली का भू-सांस्कृतिक मानचित्र तैयार करने, जैविक खेती को प्रोत्साहित करने तथा सामुदायिक पुनरुद्धार कार्यों के विस्तार का निर्णय लिया गया। सरकारों, शैक्षणिक संस्थानों, नागरिक समाज और अंतरराष्ट्रीय साझेदारों से सहयोग का आह्वान करते हुए कॉन्क्लेव ने जल सुरक्षा, जैव-विविधता संरक्षण, कृषि पुनर्जीवन और भू-सांस्कृतिक विविधता के संरक्षण की दिशा में समन्वित प्रयासों का संकल्प व्यक्त किया।

जुड़ें - हमारे व्हाट्सएप चैनल से

सप्रेस मीडिया - नवीनतम आलेख, रिपोर्ट, समाचार अपडेट सीधे अपने व्हाट्सएप पर प्राप्त करें।

व्हाट्सएप ग्रुप से जुड़ें →

निष्पक्ष पत्रकारिता का समर्थन करें

आज के दौर में निष्पक्ष, स्वतंत्र और जन-सरोकार की पत्रकारिता को जीवित रखना बड़ी चुनौती है। विज्ञापनदाताओं और कॉर्पोरेट के दबाव से मुक्त होकर आप तक सही और सटीक खबरें पहुंचाना हमारा मुख्य उद्देश्य है। हमारी स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए आपके आर्थिक सहयोग की आवश्यकता है। आपकी दी हुई छोटी-सी सहयोग राशि हमें सच्ची पत्रकारिता करते रहने का संबल देगी।

सहयोग राशि →

नवीन आलेख