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बजट 2026–27 में रेयर अर्थ और भारत की प्रकृति-संस्कृति

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केंद्रीय बजट 2026–27 में रेयर अर्थ को रणनीतिक और सुरक्षा ज़रूरतों से जोड़कर प्रस्तुत किया गया है, लेकिन इसके साथ ही देश की पर्वतमालाओं, विशेषकर अरावली, पर नए खनन दबाव की आशंका भी गहराती दिख रही है। पर्यावरणविदों और स्थानीय समुदायों का कहना है कि बजट के ज़रिये विकास के नाम पर प्रकृति और लोकतांत्रिक सहमति की परीक्षा ली जा रही है। सवाल यह है कि क्या रेयर अर्थ की दौड़ में भारत पहाड़ों की कीमत चुकाने को तैयार है।


भारत आज रेयर अर्थ के नाम पर जिस रास्ते पर आगे बढ़ने की तैयारी कर रहा है, वह रास्ता हमें चीन की उसी भूल की ओर ले जाता दिख रहा है, जिसे पूरी दुनिया अब एक चेतावनी के रूप में देखती है। तिब्बत में चीन ने पहाड़ों को काटते समय यह नहीं सोचा कि वह केवल खनिज नहीं निकाल रहा, बल्कि लगभग 80 हजार झरनों को सुखा रहा है। सोने का अंडा पाने की लालच में उसने मुर्गी का पेट चीर दिया। परिणाम यह हुआ कि न अंडा बचा, न मुर्गी।

लेकिन भारत तिब्बत नहीं है और भारत की जनता तिब्बत की जनता नहीं है।

बजट से पहले अरावली में रेयर अर्थ कॉरिडोर को लेकर उच्चतम न्यायालय के माध्यम से एक ऐसा रास्ता खोलने की कोशिश हुई, जो पहाड़ों के भविष्य के लिए घातक हो सकता था। लेकिन जनता की सजगता और लोकतांत्रिक दबाव ने इस प्रयास को सफल नहीं होने दिया और न्यायालय को स्वयं अपने निर्णय पर पुनर्विचार करना पड़ा।

अरावली अकेली नहीं है। पश्चिम घाट, हिमालय, सतपुड़ा और विंध्याचल इन सभी पर्वतमालाओं की जनता एक जैसी है। यह जनता अपने पहाड़ों को तिब्बत की तरह नहीं कटने देगी। पूरे भारत में अब पहाड़ों को बचाने का आंदोलन खड़ा होगा। सरकार को यह समझना होगा कि जनता को सोने के अंडे नहीं खिलाए जा सकते। प्रकृति के प्राकृतिक अंडे ही मानव के लिए पोषक हैं। वही अंडे मुर्गी को यानी धरती और पहाड़ों को जिंदा रखते हैं और भविष्य के लिए अंडा भी देते रहते हैं। यह बात भारतीय समाज अच्छी तरह जानता है।

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रेयर अर्थ के नाम पर रक्षा और सुरक्षा का हवाला देकर सब कुछ नहीं खोदा जा सकता। राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जिन चुनिंदा खनिजों की आवश्यकता है, उन्हीं को लिया जाए। इसके लिए सभी पहाड़ों को खोद देना न आवश्यक है, न उचित। भारत का लोकतंत्र चीन के लोकतंत्र से बिल्कुल अलग है। अब भारत की जनता चीन की जनता की तरह डरपोक नहीं है।

सच्चाई यह भी है कि रेयर अर्थ अरावली में संभव ही नहीं है। अरावली की पीड़ा विश्व के अन्य पहाड़ों की पीड़ा से अलग नहीं है। जिन देशों की न्यायपालिका और लोकतांत्रिक सरकारें पहाड़ों की पीड़ा की अनदेखी कर उन्हें नष्ट कर रही हैं, उनके लिए भी अब वैश्विक स्तर पर चेतावनियाँ दी जा रही हैं। इसी संदर्भ में 20 नवंबर 2025 को ब्राजील के बेलेम शहर में आयोजित COP-30 में महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए हैं। खास बात यह है कि पहाड़ों और जंगलों को बचाने वाले देशों को सम्मानित किया जाएगा और उनकी अनदेखी करने वालों को दंडित किया जाएगा।

विडंबना यह है कि उसी दिन भारत के उच्चतम न्यायालय ने अरावली को नष्ट करने वाला निर्णय सुनाया। अब भारत सरकार और उच्चतम न्यायालय—दोनों के लिए अपने इस निर्णय पर पुनर्विचार करना आवश्यक हो गया है। भारत को अब तक COP मंचों पर की गई अपनी पर्यावरणीय प्रतिबद्धताओं और संकल्पों की ओर भी पीछे मुड़कर देखना होगा। भारत ने अपनी पहचान प्रकृति और संस्कृति के साथ जुड़े संकल्पों के बल पर बनाई है। प्रकृति हमारी आस्था रही है और वही हमारी पहचान है।

उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्देशों में यह स्वीकार किया है कि अरावली गुजरात से दिल्ली तक फैली एक संपूर्ण पर्वतमाला है और इसे समग्रता में देखा जाना चाहिए। लेकिन इसके साथ ही 100 मीटर से नीचे के क्षेत्रों में खनन की छूट देकर अरावली को टुकड़ों में बांट दिया गया। यह निर्णय न केवल अरावली, बल्कि भारत और दुनिया की सभी पर्वतमालाओं के लिए घातक है। यदि यह रास्ता खुला, तो दुनिया भर के पहाड़ों को बचाना असंभव हो जाएगा। इससे भारत की वैश्विक स्तर पर बदनामी भी हो सकती है, क्योंकि एक ऐसा देश जो प्रकृति और संस्कृति के संरक्षण की बात करता है, वही अपने पहाड़ों को नष्ट करने की पहल करता दिखेगा।

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यह सच है कि अरावली में कई महत्वपूर्ण खनिज हैं, जिनमें कुछ राष्ट्रीय और परमाणु सुरक्षा से जुड़े हैं। ऐसे खनिजों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही छूट दी है। लेकिन सामान्य खनिजों के लिए अरावली को काटना, जंगलों को नष्ट करना और पर्वतमाला में नए घाव बनाना किसी भी रूप में न्यायोचित नहीं है।

COP-30, बेलेम (ब्राजील) ने जंगलों और पहाड़ों को बचाने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल की है। वर्षावनों के संरक्षण और वनवासियों को निर्णय प्रक्रिया में भागीदार बनाने का प्रावधान उसी दिन किया गया। निर्णय लिया गया कि आदिवासी हितों के लिए निर्धारित धन सीधे आदिवासी संगठनों को दिया जाएगा, कोई सरकार बीच में नहीं होगी। आदिवासी स्वयं तय करेंगे कि अपने पहाड़, जंगल और आवास कैसे बचाने हैं। जर्मनी ने ब्राजील के नए वैश्विक वर्षावन कोष में दस वर्षों में एक अरब यूरो देने का वादा किया है। यह कोष उपग्रह निगरानी के आधार पर पहाड़ों और वनों को बचाने वालों को पुरस्कार और अधिक कटाई करने वालों को दंडित करेगा। जर्मनी ने जंगलों और पहाड़ों को धरती के “फेफड़े” बताया है।

ऐसे में सवाल उठता है अरावली के आदिवासियों का क्या होगा? अरावली के लोग स्पष्ट कर चुके हैं कि वे अरावली को रेयर अर्थ कॉरिडोर नहीं बनने देंगे। वे अरावली को बचाने के लिए सत्याग्रह करेंगे और अपने पहाड़ों की रक्षा करेंगे। यह केवल खनन का सवाल नहीं है, यह भारत की प्रकृति, संस्कृति और लोकतंत्र की आत्मा को बचाने का सवाल है।

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