भारत की आत्मा को शब्द देने वाले पत्रकार मार्क टुली का निधन केवल एक व्यक्तित्व का अंत नहीं, बल्कि संवेदनशील, संतुलित और सत्यनिष्ठ पत्रकारिता के एक युग का अवसान है। बीबीसी की शांत आवाज से उन्होंने भारत को दुनिया से जोड़ा और सत्य, करुणा तथा धैर्य को रिपोर्टिंग की पहचान बनाया। उनकी विरासत आज भी हमें दिशा देती रहती है।
भारत की समकालीन इतिहास-यात्रा में कुछ ऐसे नाम हैं, जो केवल घटनाओं के साक्षी नहीं बल्कि स्वयं इतिहास की चेतना बन जाते हैं। सर विलियम मार्क टुली, जिन्हें दुनिया ‘मार्क टुली’ के नाम से जानती है, ऐसे ही एक विरल पत्रकार थे। बीबीसी रेडियो की वह चिर-परिचित आवाज ‘दिस इज मार्क टुली रिपोर्टिग फ्रॉम दिल्ली’, दशकों तक करोड़ों भारतीयों के लिए सत्य का पर्याय रही। मार्क टुली केवल एक विदेशी पत्रकार नहीं थे बल्कि वे भारत की धड़कनों को सुनने वाले एक ऐसे ‘ऋषि’ थे, जिन्होंने इस देश को केवल कवर नहीं किया बल्कि उसे जिया और आत्मसात किया। दिल्ली के एक निजी अस्पताल में 90 वर्ष की आयु में उनका निधन पत्रकारिता के उस स्वर्ण युग का अंत है, जहां तथ्य पवित्र थे और शब्द गरिमापूर्ण। वे आंकड़ों से अधिक संवेदनाओं और सनसनी से अधिक सच्चाई में विश्वास रखते थे।
कोलकाता से कैम्ब्रिज तक: एक बहुसांस्कृतिक प्रारंभ
मार्क टुली का भारत से संबंध किसी वीजा या असाइनमेंट की देन नहीं था बल्कि यह उनके रक्त और मिट्टी का जुड़ाव था। 24 अक्टूबर 1935 को कोलकाता के टॉलीगंज में जन्मे टुली का बचपन ब्रिटिश राज के अंतिम दिनों की धूप-छांव में बीता। एक समृद्ध ब्रिटिश परिवार में जन्म लेने के बावजूद दार्जिलिंग के बोर्डिंग स्कूलों और भारत की गलियों ने उनके भीतर एक ऐसी संवेदनशीलता भर दी, जो उन्हें अन्य विदेशी पत्रकारों से अलग खड़ा करती थी। जब वे नौ वर्ष की आयु में ब्रिटेन गए तो अपने साथ भारत की एक अमिट छवि ले गए थे। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में धर्मशास्त्र की पढ़ाई के दौरान उन्होंने पादरी बनने का विचार किया था लेकिन शायद नियति ने उनके लिए एक बड़ा मंच चुना था। उन्होंने चर्च की दीवारों के भीतर उपदेश देने के बजाय मानवीय समाज की जटिलताओं और भारत जैसे विशाल लोकतंत्र की महागाथा को दुनिया को सुनाने का मार्ग चुना।
बीबीसी और भारत: सत्य की खोज का सफर
1964 में बीबीसी से जुड़ना और 1965 में भारत संवाददाता बनकर लौटना, टुली के जीवन का सबसे निर्णायक मोड़ था। जनवरी 1966 में ताशकंद समझौते के बाद प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का निधन हुआ। इस घटना की रिपोर्टिंग ने टुली को भारतीय राजनीति की अनिश्चितताओं और भावनाओं से रूबरू कराया। अगले तीन दशकों तक मार्क टुली बीबीसी के नई दिल्ली ब्यूरो के प्रमुख के रूप में भारत की आवाज बने रहे। उस दौर में, जब टेलीविजन और सोशल मीडिया का शोर नहीं था, लोग रेडियो पर टुली की आवाज का इंतजार करते थे ताकि जान सकें कि उनके अपने देश में वास्तव में क्या हो रहा है। उनकी पत्रकारिता सत्ता के गलियारों से शुरू होकर गांव की चौपालों तक जाती थी।
इतिहास के अग्नि-परीक्षा के क्षण
मार्क टुली ने भारत को उन क्षणों में देखा, जब राष्ट्र का अस्तित्व दांव पर था। उनके करियर के कुछ बेहद चुनौतीपूर्ण पड़ाव भी रहे। 1971 का युद्ध और बांग्लादेश का उदय; टुली ने इस मानवीय संकट और सैन्य विजय को अत्यंत बारीकी से कवर किया। आपातकाल (1975-77); जब प्रेस की आजादी पर कड़े पहरे थे, तब टुली की रिपोर्टिंग ने भारतीयों को वे सूचनाएं दी, जो स्वदेशी मीडिया नहीं दे पा रहा था। तत्कालीन सरकार की नाराजगी के कारण उन्हें भारत छोड़ना पड़ा था लेकिन वे पुनः लौटे, एक अधिक परिपक्व और निडर पत्रकार के रूप में। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में सैन्य कार्रवाई से पूर्व (ऑपरेशन ब्लू स्टार) जरनैल सिंह भिंडरावाले से लिया गया उनका साक्षात्कार आज भी पत्रकारिता के छात्रों के लिए एक ऐतिहासिक दस्तावेज है। उन्होंने खालिस्तानी उग्रवाद और पंजाब के दर्द को बिना किसी पक्षपात के दुनिया के सामने रखा। उसके बाद के वर्षों में कुछ बढ़ी त्रासदीपूर्ण घटनाओं और परिर्वतनों को टुली ने केवल ‘ब्रेकिंग न्यूज’ की तरह नहीं देखा बल्कि उनके पीछे छिपे सामाजिक घावों को कुरेदा।
पत्रकारिता की नैतिकता: संयम और गहराई
आज की ‘लाउड’ और ‘ओपिनियन-ड्रिवन’ पत्रकारिता के दौर में मार्क टुली एक दुर्लभ उदाहरण थे। उनकी शैली के तीन मुख्य स्तंभ थे, संयम, संतुलन और संवेदनशीलता। वे मानते थे कि पत्रकार का काम न्यायाधीश बनना नहीं है। वे निष्कर्ष पाठक पर छोड़ देते थे। उनकी आवाज में कभी उत्तेजना नहीं होती थी बल्कि एक शांत गहराई होती थी, जो श्रोता को सोचने पर विवश कर देती थी। बीबीसी रेडियो 4 के कार्यक्रम ‘समथिंग अंडरस्टूड’ के माध्यम से उन्होंने धर्म, नैतिकता और मानवीय मूल्यों पर जो संवाद किया, वह पत्रकारिता के बौद्धिक स्तर को एक नई ऊंचाई पर ले गया।
एक लेखक के रूप में भारतीयता का अन्वेषण
मार्क टुली की पुस्तकें केवल संस्मरण नहीं हैं बल्कि वे भारत के समाजशास्त्रीय अध्ययन हैं। उनकी पुस्तक ‘नो फुल स्टॉप्स इन इंडिया’ भारतीय मानस को समझने की एक कुंजी है, जिसमें उन्होंने तर्क दिया कि भारत को पश्चिमी चश्मे से नहीं समझा जा सकता। भारत में कभी ‘पूर्ण विराम’ नहीं होता, यहां निरंतरता और परिवर्तन का अद्भुत संगम है। अपने सहयोगी गिलियन राइट के साथ लिखी गई पुस्तक ‘इंडिया इन स्लो मोशन’ में उन्होंने नौकरशाही, भ्रष्टाचार और जटिलताओं के बावजूद भारत की धीमी लेकिन निरंतर प्रगति का चित्रण किया। ‘द हार्ट ऑफ इंडिया’ पुस्तक में कथा-साहित्य के माध्यम से उन्होंने ग्रामीण भारत की सरलता और वहां के संघर्षों को शब्द दिए। उनकी लेखनी में एक ऐसा प्रेम झलकता था, जो अंधा नहीं था। वे भारत की कमियों पर प्रहार करते थे लेकिन ‘अपनों’ वाले अधिकार के साथ।
बीबीसी से विदाई और स्वतंत्र पहचान
1994 में बीबीसी के तत्कालीन महानिदेशक जॉन बिर्ट की नीतियों और कॉरपोरेट कार्यशैली से मतभेद के कारण टुली ने इस्तीफा दे दिया। यह एक पत्रकार के अपने सिद्धांतों के प्रति अडिग रहने का प्रमाण था। बीबीसी छोड़ने के बाद भी वे भारत नहीं छोड़ सके। उन्होंने दिल्ली के निजामुद्दीन क्षेत्र को अपना घर बनाया और एक स्वतंत्र पत्रकार व लेखक के रूप में अपनी यात्रा जारी रखी। यह भारत के प्रति उनके अटूट प्रेम का ही परिणाम था कि उन्होंने अपने जीवन के अंतिम क्षण तक यहीं रहने का निर्णय लिया।
सम्मान और वैचारिक विरासत
भारत और ब्रिटेन के बीच एक सेतु की भूमिका निभाने के लिए उन्हें दोनों देशों के सर्वोच्च सम्मानों से नवाजा गया। 1985 में उन्हें ऑफिसर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश एम्पायर, 1992 में पद्मश्री, 1995 में ब्रिटेन द्वारा नाइटहुड की उपाधि और 2005 में पद्म भूषण जैसे सर्वोच्च सम्मान मिले। मार्क टुली की सबसे बड़ी विरासत यह है कि उन्होंने हमें भारतीयता पर गर्व करना सिखाया, उस समय भी, जब हम स्वयं अपनी जड़ों पर संदेह कर रहे थे। वे बहुलतावाद के प्रबल समर्थक थे। वे मानते थे कि भारत की असली ताकत उसकी विविधता है, न कि एकरूपता।
भारत की आत्मा का स्थायी प्रवासी
बहरहाल, मार्क टुली का निधन केवल एक व्यक्ति का अंत नहीं है बल्कि उस दृष्टिकोण का ओझल होना है, जो जल्दबाजी के बजाय धैर्य को प्राथमिकता देता था। वे अक्सर कहते थे कि भारत को समझने के लिए आपको अपनी घड़ी उतारकर रखनी होगी और यहां की धूल, धूप और लोगों से बात करनी होगी। आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं तो उनकी कमी उस समय अधिक खलती है, जब दुनिया सूचनाओं के अंबार में सत्य को ढूंढ़ रही है। मार्क टुली ने हमें सिखाया कि पत्रकारिता केवल सूचना का व्यापार नहीं बल्कि मानवता की सेवा है। भारत की मिट्टी में जन्मा, विदेशी धरती पर शिक्षा पाया और पुनः भारत की गोद में समा जाने वाला यह व्यक्तित्व सदैव याद किया जाएगा। वे एक ऐसे विदेशी साक्षी थे, जिन्होंने भारत को दुनिया की नजरों में नहीं बल्कि भारतीयों की अपनी नजरों में भी गरिमा प्रदान की।


