‘अमीरों की सत्ता का प्रतिरोध’ : ‘डब्ल्यूईएफ’ में जारी ‘ऑक्सफैम’ की रिपोर्ट

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दुनियाभर के दिमागों को दुरुस्त करने वाली ‘ऑक्सफैम’ की रिपोर्ट फिर हाजिर है। 19 से 23 जनवरी के बीच हो रहे ‘वर्ल्ड इकॉनॉमिक फोरम’ के पहले दिन चेतावनी-स्वरूप जारी की गई इस रिपोर्ट ने दुनियाभर के आर्थिक विकास की पोलपट्टी खोल दी है। क्या ‘जीडीपी’ से मापी जाने वाली आर्थिक सम्पन्नता धरती के आम रहवासियों को ठीक-ठाक जिन्दा रख पाने में कामयाब हो पा रही है? ‘ऑक्सफैम’ की रिपोर्ट इस पर क्या कहती है?


अभी चार दिन पहले, 19 जनवरी 2026 को स्विट्जरलैंड के दावोस में ‘विश्व आर्थिक मंच’ (वर्ल्ड इकॉनॉमिक फोरम) की बैठक के ठीक पहले जारी की गई वैश्विक ‘गैर-सरकारी संगठन’ (एनजीओ) ‘ऑक्सफैम’ यानि ‘ऑक्सफोर्ड कमेटी फॉर फेमिन रिलीफ’ की 2025 की ‘अमीरों की सत्ता का प्रतिरोध’ शीर्षक रिपोर्ट ने अरबपतियों की संपत्ति में ऐतिहासिक वृद्धि और बढ़ती असमानता को उजागर किया है।

यह रिपोर्ट आज की दुनिया की उस सच्चाई को फिर से सामने रखती है, जिसे अक्सर विकास, ‘सकल घरेलू उत्पाद’ (जीडीपी) और आर्थिक वृद्धि के चमकदार आंकड़ों के पीछे छिपा दिया जाता है। यह रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था तेज़ी से आगे बढ़ने के बावजूद अत्यधिक असंतुलित और अन्यायपूर्ण होती जा रही है। दुनिया के कुछ बेहद अमीर लोगों के हाथों में अपार धन सिमटता जा रहा है, जबकि करोड़ों लोग आज भी गरीबी, भूख और असुरक्षा से जूझ रहे हैं।

वैश्विक असमानता की इस भयावह रिपोर्ट का सबसे अहम निष्कर्ष यह है कि पिछले दशक में अरबपतियों की संपत्ति न केवल बढ़ी है, बल्कि तीन गुना तेजी से बढ़ी है। 2015 से अब तक दुनिया की सबसे अमीर एक प्रतिशत आबादी ने 33.9 ट्रिलियन डॉलर से अधिक संपत्ति अर्जित की है। ‘ऑक्सफैम’ के अनुसार, यह राशि वैश्विक गरीबी को समाप्त करने के लिए पर्याप्त है। इसके बावजूद, दुनिया की लगभग आधी आबादी आज भी गरीब है और गरीबी उन्मूलन के वैश्विक लक्ष्य लगातार पीछे खिसकते जा रहे हैं। यह विरोधाभास इस बात को रेखांकित करता है कि मौजूदा वैश्विक आर्थिक व्यवस्था धन पैदा तो कर रही है, लेकिन उसका लाभ समाज के विशाल बहुमत तक नहीं पहुंच रहा है। असमानता केवल सामाजिक नहीं, आर्थिक समस्या भी है जो लोगों की क्रय-शक्ति घटाती है, घरेलू मांग कमजोर करती है और दीर्घकालिक आर्थिक विकास बाधित होता है।

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रिपोर्ट का एक और चिंताजनक पहलू यह है कि विकसित देशों, विशेषकर राजनीतिक और आर्थिक जमावडे के ‘जी -7’ देशों (कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, यूनाइटेड किंगडम और अमेरिका) द्वारा विदेशी सहायता में भारी कटौती की जा रही है। सन् 2024 की तुलना में 2026 के बजट तक इन देशों द्वारा विदेशी सहायता में लगभग 28 प्रतिशत कमी की जा रही है, जो 1960 के बाद सबसे बड़ी कटौती मानी जा रही है। ‘ऑक्सफैम’ चेतावनी देता है कि इसका सीधा असर स्वास्थ्य सेवाओं, कुपोषण की रोकथाम और बुनियादी जीवन के रखरखाव की योजनाओं पर गहरा पड़ेगा। अनुमान है कि इस कटौती के कारण लगभग 29 लाख अतिरिक्त लोगों की मृत्यु हो सकती है। यह आंकड़ा बताता है कि वित्तीय फैसले केवल बजट का मामला नहीं होते, वे सीधे मानव जीवन को प्रभावित करते हैं।

‘ऑक्सफैम’ की 2025 की प्रतिक्रिया यह भी स्पष्ट करती है कि आज की खाद्य-असुरक्षा केवल संसाधनों की कमी का परिणाम नहीं है। यह मूलतः एक राजनीतिक और नीतिगत समस्या है। युद्ध, सामाजिक कल्याण में कटौती और जलवायु परिवर्तन, ये तीनों मिलकर दुनिया के सबसे गरीब लोगों को भुखमरी की ओर धकेल रहे हैं। पर्याप्त भोजन उपलब्ध होने के बावजूद, गलत नीतियां और असमान वितरण करोड़ों लोगों को भूखा रखे हुए है।

‘ऑक्सफैम-इंडिया’ की भारत पर ‘विशेष रिपोर्ट-2025’ बताती है कि यह वैश्विक प्रवृत्ति भारत में और भी तीव्र रूप में दिखाई देती है। ‘कोविड  महामारी’ के दौरान जहां आम लोगों को रोजगार, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा में भारी गिरावट का सामना करना पड़ा, वहीं देश के सबसे धनी लोगों की संपत्ति में जबरदस्त वृद्धि हुई। रिपोर्ट के अनुसार, भारत के शीर्ष एक प्रतिशत लोगों के पास देश की 40 प्रतिशत से अधिक संपत्ति है, जबकि निचले 50 प्रतिशत लोगों के पास केवल लगभग तीन प्रतिशत संपत्ति है। देश के 21 अरबपतियों के पास 70 करोड़ से अधिक लोगों के बराबर दौलत है।

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ये आंकड़े साफ दिखाते हैं कि भारत में संपत्ति का केंद्रीकरण बेहद खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका है। असमानता की एक बड़ी वजह भारत की ‘अप्रत्यक्ष कर’ आधारित व्यवस्था, खासकर ‘गुड्स एण्‍ड सर्विस टैक्स’ (जीएसटी) है। ‘ऑक्सफैम-इंडिया’ के अनुसार, शीर्ष 10 प्रतिशत अमीरों का ‘जीएसटी’ में योगदान केवल लगभग तीन प्रतिशत है, जबकि निचले 50 प्रतिशत लोगों की हिस्सेदारी लगभग 64 प्रतिशत है। इसका अर्थ है कि गरीब और मध्यम वर्ग अपनी आय का बड़ा हिस्सा ‘अप्रत्यक्ष करों’ के रूप में चुका रहा है, जबकि अमीर वर्ग कर-छूट और बचाव के रास्तों से लाभ उठा रहा है। यह व्यवस्था न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि असमानता को और गहरा करती है।

‘ऑक्सफैम’ की यह रिपोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि निजी वित्त पर अत्यधिक निर्भरता असफल रही है। विकास और असमानता की समस्या का समाधान तभी संभव है जब सरकारें सार्वजनिक सेवाओं और नीतिगत सुधारों को प्राथमिकता दें। इसके लिए आवश्यक है कि अमीरों पर प्रगतिशील कर प्रणाली लागू की जाए। शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा में सरकारी निवेश बढ़ाया जाए और ऐसी नीतियां बनाई जाएं जो धन के अत्यधिक केंद्रीकरण को रोकें।

जब संपत्ति और संसाधन कुछ लोगों तक सीमित हो जाते हैं तो नीति निर्धारण में कॉरपोरेट और अमीर वर्ग का प्रभाव बढ़ जाता है। जब नीति का झुकाव अमीरों के पक्ष में होता है तो सार्वजनिक निवेश घटता है एवं निजीकरण बढ़ता है और सामाजिक सुरक्षा कमजोर होती है। भारत में बढ़ती आर्थिक असमानता लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और टिकाऊ विकास, तीनों के लिए गंभीर चुनौती है। यदि नीतियां समावेशी विकास, प्रगतिशील कर व्यवस्था, मजबूत सार्वजनिक सेवाओं और श्रमिक एवं किसान हितों पर केंद्रित नहीं हुईं, तो यह असमानता सामाजिक विस्फोट का कारण भी बन सकती है। ‘ऑक्सफैम’ की 2025 की रिपोर्ट एक चेतावनी है कि अगर मौजूदा आर्थिक और नीतिगत दिशा नहीं बदली गई, तो असमानता और गरीबी और गहराएगी। यह रिपोर्ट हमें याद दिलाती है कि सच्चा विकास वही है जिसमें आर्थिक वृद्धि के साथ सामाजिक न्याय भी हो। वरना अमीरों की बढ़ती दौलत और गरीबों की बढ़ती बदहाली के बीच की खाई दुनिया को और अस्थिर बना देगी। (सप्रेस)

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