कृषि संसार वन्य जीव एवं जैव विविधता

नीलगाय और जंगली सुअर : खेती और नीति की समस्या

लेखक की फोटो

नीलगायों और जंगली सुअरों का फसलों को चौपट करने के लिए खेतों में उतरना एक तरह से कथित ‘वैज्ञानिक वानिकी’ का ही नतीजा है। कई इलाकों में वन्यप्राणियों के वन-निवासियों से घातक द्वंद्व भी इसी पद्धति से उपजे हैं। इनसे आखिर कैसे निपटा जा सकता है?


नीलगाय और जंगली सुअर से फसलों को बड़े पैमाने पर हो रहे नुकसान से किसान परेशान हैं और खेती— किसानी को जानने— समझने वाले लगभग सभी लोग इस समस्या से वाकिफ हैं। इस समस्या के निदान में कई भ्रांतियाँ बाधक बनी हैं। मसलन – यह भ्रम बना हुआ है कि इन जानवरों का आवास जंगल में है जो कि सही नहीं है। एक अध्ययन के अनुसार 85% नीलगायों का आवास राजस्व क्षेत्र में है।

गाँव के आसपास की चरनोई ज़मीन और वहाँ की झाड़ियों के बीच इनका डेरा रहता है। वहाँ से वे अपना पेट भरने के लिए खेतों में आ जाती हैं और फसलों को नुकसान पहुँचाती हैं। नीलगायों की संख्या कई गुना बढ़ गई है। एक रपट के अनुसार मध्यप्रदेश के अकेले शाजापुर जिले में नीलगायों की संख्या लगभग 2000 और कुछ अन्य जिलों में 6000 है। मध्यप्रदेश के ऐसे 21 जिले हैं, जिन्हें वन विभाग ने समस्या-ग्रस्त बताया है। इन जिलों के राजस्व क्षेत्र में नीलगायों की संख्या हजारों में होने की सम्भावना है।

एक अनुमान के अनुसार भारत में करीब एक लाख नीलगायें हैं और इनका बड़ा हिस्सा मध्यप्रदेश में है जहां पुराना अनुमान 33,500 का बताया जाता है। जंगल को बचाने के लिए इन्हें ‘वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम,1972’ में जोड़ा गया था, किन्तु जब नीलगाय की मौजूगी राजस्व क्षेत्र में होने की बात सामने आई तो यह स्वत: ही ‘वन्यजीव संरक्षण कानून’ की परिधि से बाहर हो गईं। एक नीलगाय को प्रतिदिन 18 से 30 किलो हरा चारा चाहिए जो चरनोई की घास एवं खेती को नष्ट करके ही प्राप्त हो सकता है। एक जिले में जहाँ 6000 नीलगाय हैं, वहाँ इनसे लगभग 4000 हेक्टेयर कृषि भूमि प्रभावित होती है।

See also  उत्तराखंड : खुद के भरोसे की खेती

इस तथ्य का पहला निष्कर्ष यह निकलता है कि वन विभाग को मध्यप्रदेश के 21 जिलों और 34  चिन्हित ब्लाकों, जो उनकी रपट के अनुसार सबसे प्रभावित इलाके हैं, में सघन सर्वे करके नीलगाय और जंगली सुअर की गणना की जाए। इसमें ग्राम पंचायत और किसानों का पूरा सहयोग लिया जाए। सर्वे के माध्यम से नीलगायों के डेरों को मानचित्र पर उतारा जाना चाहिए और उनका प्रभाव क्षेत्र एवं संख्या नोट की जानी चाहिए।

समस्या के निदान का एक तरीका हो सकता है कि नीलगायों को राजस्व क्षेत्र से पकड़कर जंगल में छोड़ा जाए। कई कारणों से यह कारगर नहीं है। हाल में शाजापुर जिले में स्थानांतरण का एक प्रयोग किया गया था। यह साउथ अफ्रीका की ‘बोमा तकनीक’ है। एक बागड़ बनाकर रास्ता निकाला जाता है जहाँ से हिरण एवं नीलगाय को हेलीकाप्टर की मदद से जंगल की ओर भगाया जाता है। इस तरह से केवल 67 नीलगायों को हकाला जा सका, जबकि उनकी संख्या हजारों में है। यदि स्थानांतरण संभव भी हो, तब भी तर्क संगत नहीं है, क्योंकि वर्तमान में वन्यजीवों की बड़ी संख्या के पोषण की आपूर्ति जंगल नहीं कर सकता। जंगल के संसाधनों को देखते हुए एक सीमित मात्रा में स्थानांतरण किया जा सकता है। कई लोगों का कहना है कि जंगल में चरनोई एवं पानी की व्यवस्था बढ़ाई जाए, ताकि इस प्रकार के वन्यजीवों के लिए पर्याप्त पोषण हो सके।  

नीलगाय एवं जंगली सुअर की विशाल संख्या, जिन्होंने गौचर भूमि पर दशकों से डेरा बना लिया है, को कम करने का एक ही तरीका हो सकता है। ‘वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972’ में प्रावधान है कि चिन्हित इलाकों में नीलगाय एवं जंगली सुअर को ‘वर्मिन’ यानी नुकसानदायक जानवर घोषित किया जाए। यह एक निश्चित समय के लिए लागू होता है। ऐसा करने पर वन विभाग, अपने नियंत्रण में उनकी संख्या को कम करने की योजना बना सकता है। वह शिकारियों की टीम गठित कर सकता है और एक योजना के तहत इसे अंजाम दे सकता है।

See also  आधुनिक खेती के खतरे

इसी प्रकार की योजना बिहार में लागू की गई थी और सफल रही। वर्ष 2015 में क़ानूनी अनुमति के बाद नीलगाय और जंगली सुअर को ‘वर्मिन’ घोषित किया गया। यह बिहार के 31 जिलों में लागू किया गया था। एक अनुमान है कि लगभग दस हज़ार नील गायों को मारा गया। इस प्रक्रिया में पंचायतों की लिखित शिकायत पर जांच करके वन विभाग ज़रूरत पड़ने पर शिकारियों की व्यवस्था करता है। वर्ष 2016 में उत्तराखंड सरकार ने जंगली सुअरों को मारने की अनुमति ली। इस प्रकार की अनुमति ‘मुख्य वन्यप्राणी वार्डन’ द्वारा विशेष परिस्थितियों में दी जाती है और कई राज्यों ने इसका उपयोग किया है।

इस समय मध्यप्रदेश के लिए एक विशेष अभियान की ज़रूरत है क्योंकि यह वन्यजीव जंगल के बाहर बड़ी संख्या में बसे हुए हैं। मुआवजा देकर या बागड़ बनाकर इसका हल निकालना समस्या को टालने वाला कदम होगा। अभी तक मुआवजे का रिकॉर्ड नगण्य रहा है और नीलगाय आसानी से बागड़ लांघ जाते हैं। पानी सर के ऊपर हो जाने से पहले कदम उठाना समझदारी होगी। 

इसकी रोकथाम से खेती पर बड़ा प्रभाव पड़ेगा। आज किसानों ने कई फसलें लगाना छोड़ दिया है जिन्हें नीलगाय या जंगली सुअर के झुण्ड रातों-रात नष्ट कर देते हैं, जैसे-चना, मक्का, तुअर, मूंगफली, सब्जियाँ आदि। हम मिश्रित खेती की ओर जाना चाहते हैं, इसलिए भी इस समस्या का निदान ज़रूरी है। आवश्यक है कि नीलगाय एवं जंगली सुअर की समस्या को केवल संघर्ष के रूप में नहीं, बल्कि ‘मानव – वन्यजीव प्रबंधन’ के रूप में देखा जाए। ‘वर्मिन’ घोषित करने जैसे निर्णयों के साथ प्रशिक्षित शिकारी और वन विभाग की सीधी जवाबदेही तय करना आवश्यक है। (सप्रेस)

लेखक का परिचय

अरविंद सरदाना

अरविंद सरदाना ने हाल ही में सम सामयिक मुद्दों पर लिखने की शुरूआत की है. अरविंद ’एकलव्य फाउन्डेशन’ के पूर्व-निदेशक हैं।

जुड़ें - हमारे व्हाट्सएप चैनल से

सप्रेस मीडिया - नवीनतम आलेख, रिपोर्ट, समाचार अपडेट सीधे अपने व्हाट्सएप पर प्राप्त करें।

व्हाट्सएप ग्रुप से जुड़ें →

निष्पक्ष पत्रकारिता का समर्थन करें

आज के दौर में निष्पक्ष, स्वतंत्र और जन-सरोकार की पत्रकारिता को जीवित रखना बड़ी चुनौती है। विज्ञापनदाताओं और कॉर्पोरेट के दबाव से मुक्त होकर आप तक सही और सटीक खबरें पहुंचाना हमारा मुख्य उद्देश्य है। हमारी स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए आपके आर्थिक सहयोग की आवश्यकता है। आपकी दी हुई छोटी-सी सहयोग राशि हमें सच्ची पत्रकारिता करते रहने का संबल देगी।

सहयोग राशि →

संबंधित आलेख

सर्वाधिक पढ़े गए