महेंद्रभाई की 23वीं पुण्यतिथि एक ऐसे सार्वजनिक जीवन को याद करने का अवसर है, जिसमें सादगी, सेवा और नैतिक दृढ़ता केंद्रीय मूल्य रहे। सर्वोदय प्रेस सर्विस के माध्यम से उन्होंने पत्रकारिता को सत्ता के समीप नहीं, समाज के पक्ष में खड़ा किया। खादी,सर्वोदय और गांधी-विनोबा विचार उनके जीवन की सतत साधना रहे।
3 जनवरी : 23वां पुण्य स्मरण
कुमार सिद्धार्थ / डॉ. सम्यक
पिता को स्मरण करना हमारे लिए केवल बीती स्मृतियों में लौटना नहीं है, बल्कि मूल्यनिष्ठा, समर्पण और सादगी से बनी उस जीवंत परंपरा के साथ खड़ा होना है, जिनसे हमारा व्यक्तित्व और दृष्टि गढ़ी गई। उनका जीवन सादगी और अनुशासन से भरा हुआ था। वे मानते थे कि व्यक्ति का आचरण ही उसके विचारों की सबसे सच्ची अभिव्यक्ति होता है। उनके व्यवहार में न कोई दिखावा था, न ही किसी प्रकार का अहंकार। वे कम में जीने और अधिक देने में विश्वास रखते थे। यही कारण था कि उनका जीवन स्वयं एक पाठशाला बन गया, जहाँ से परिवार, सहयोगी और समाज निरंतर सीखता रहा। असहमति को वे संघर्ष नहीं, संवाद का अवसर मानते थे। वे कहते थे कि विचारों की लड़ाई भी अहिंसा, संयम और सम्मान के साथ लड़ी जानी चाहिए।
पत्रकारिता में पिता का रास्ता भी अलग था। उनके लिए पत्रकारिता आजीविका नहीं, बल्कि समाज के प्रति उत्तरदायित्व थी। वे सर्वोदय प्रेस सर्विस (सप्रेस) के संस्थापक संपादक थे, किंतु उन्होंने स्वयं को कभी केवल पत्रकार/संपादक के रूप में सीमित नहीं किया। उन्होंने कभी तात्कालिक लोकप्रियता की दौड़ नहीं पकड़ी। सप्रेस के माध्यम से उन्होंने ऐसी पत्रकारिता को बढ़ावा दिया, जो सत्ता से सवाल पूछे, लेकिन शोर के बजाय तथ्य और विवेक के साथ। वे कहते थे कि पत्रकार का काम आग लगाना नहीं, बल्कि अंधेरे में रोशनी दिखाना है। उनका मानना था कि कलम का धर्म सत्ता के निकट जाना नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति के पक्ष में खड़ा होना है। यही सर्वोदय की पत्रकारिता थी, जिसमें सत्य और करुणा साथ-साथ चलते हैं।

गांधी-विचार, सर्वोदय उनके जीवन की आधारशिला था। सत्य, अहिंसा, आत्मसंयम और श्रम की गरिमा ये उनके लिए केवल सैद्धांतिक आदर्श नहीं थे, बल्कि रोज़मर्रा के जीवन की सहज आदतें थीं। इसी वैचारिक यात्रा में उन्हें आचार्य विनोबा भावे का सान्निध्य मिला, जिसने उनके भीतर सेवा और त्याग की चेतना को और गहरा किया। भूदान, ग्राम-स्वराज और त्याग की भावना उनके लिए आंदोलन नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि थे। वे मानते थे कि समाज की प्रगति का सही मापदंड वही है, जो सबसे कमजोर व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सके।
इस जीवन-दृष्टि का सबसे सजीव और स्पर्शनीय रूप खादी में दिखाई देता था। पिताजी के व्यक्तित्व में खादी पहनना कोई प्रतीकात्मक प्रदर्शन नहीं था, बल्कि एक गहरी साधना थी। अंबर चरखे से नियमित कताई उनके दैनिक जीवन का हिस्सा थी। वह कताई केवल सूत कातने की क्रिया नहीं थी, बल्कि आत्मसंयम, धैर्य और आत्मनिर्भरता की साधना थी। चरखे की मंथर गति में उन्हें जीवन का संतुलन दिखाई देता था ।
अपने और परिवार के लिए खादी का कपड़ा बनाना उनकी जीवन-शैली थी। यह खादी उन्हें बाज़ार से नहीं, श्रम और स्वावलंबन से जोड़ती थी। वे मानते थे कि खादी पहनना केवल वस्त्र धारण करना नहीं, बल्कि श्रम की गरिमा को अपने शरीर पर ओढ़ लेना है। परिवार के हम बच्चों के लिए यह कोई उपदेश नहीं था; हमने खादी को उनके जीवन में उतरते हुए देखा—चरखे की आवाज़, सूत की गंध और हाथों से बने कपड़े की सहज गरिमा के रूप में।
उनका मानना था कि उपभोग और उत्पादन के बीच संतुलन टूटते ही समाज असंतुलित हो जाता है। यही सोच उनके व्यवहार में भी दिखती थी। हमारा घर हमेशा खुला रहता था, लोग आते-जाते रहते थे, और हर किसी के लिए समय और संवेदना मौजूद रहती थी।
महेंद्रभाई का जुडाव गांधी शांति प्रतिष्ठान, सर्व सेवा संघ और सर्वोदय समाज जैसी संस्थाओं की वैचारिक चेतना से गहराई से जुड़ा रहा। पर्यावरणविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और प्रतिबद्ध पत्रकारों के साथ उनके संबंध केवल औपचारिक नहीं, बल्कि वैचारिक और आत्मीय थे। वे मंचों पर अधिक दिखने वाले व्यक्ति नहीं थे, लेकिन परदे के पीछे उनकी उपस्थिति एक मौन शक्ति की तरह महसूस की जाती थी।
पिता का व्यक्तित्व शांत स्वभाव से परिपूर्ण था, लेकिन भीतर एक गहरी दृढ़ता समाई हुई थी। वे कम बोलने में विश्वास रखते थे, पर जब बोलते, तो शब्दों में वजन होता था। उनकी वाकपटुता अदभुत थी। उन्होंने हमें उपदेशों से नहीं, बल्कि अपने जीवन कर्म से सिखाया। कठिन परिस्थितियों में संयम बनाए रखना, सफलता में विनम्र रहना और असफलता में धैर्य न खोना ये संस्कार उनके व्यवहार से हमारे भीतर उतरे। वे मानते थे कि बच्चों को सबसे बड़ी विरासत धन या संपत्ति नहीं, बल्कि मूल्य, साहस और आत्मनिर्भरता देनी चाहिए।
समर्पण उनके व्यक्तित्व की सबसे गहरी पहचान था। वे अपने कार्य के प्रति इतने तल्लीन रहते कि निजी सुविधाएँ, आराम और कभी-कभी स्वास्थ्य भी पीछे छूट जाता था। फिर भी उनके चेहरे पर कभी शिकन और शिकायत नहीं दिखी। उनका विश्वास था कि जिस कार्य को हमने चुना है, उसके प्रति ईमानदारी ही सबसे बड़ी निष्ठा है। यही कारण है कि बीमारी और कमजोरी के दिनों में भी उनका मन सक्रिय और सजग बना रहा।
आज, जब सार्वजनिक जीवन में धैर्य, सादगी और नैतिकता कमजोर पड़ती दिखाई देती है, महेंद्रभाई का जीवन हमें स्मरण कराता है। उनकी पुण्यतिथि पर यह अनुभूति और गहरी होती है कि वे हमारे बीच केवल स्मृति बनकर नहीं, बल्कि एक जीवंत प्रेरणा के रूप में उपस्थित हैं। उनके दिए संस्कार, उनकी सोच और उनका जीवन-दर्शन आज भी हमारा मार्गदर्शन करता है। उन्होंने यह भी सिखाया कि मूल्यों की राह पर चलना कई बार अकेला कर देता है, पर वही राह अंततः आत्मसम्मान और शांति की ओर ले जाती है। वे भले ही शारीरिक रूप से हमारे बीच न हों, लेकिन उनके मूल्य हमारे रोज़मर्रा के फैसलों में जीवित हैं।
हम यही कह सकते है कि पिता की सबसे बड़ी विरासत कोई संपत्ति नहीं, बल्कि वह दृष्टि है, जिससे जीवन को सही दिशा मिलती है। यही उनकी असली पहचान है और यही उनकी सच्ची स्मृति।


