‘सरदार सरोवर’ के शुरुआती दौर में तब के ‘नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण’ के उपाध्यक्ष सुशीलचन्द्र वर्मा ने अपनी किताब में दुनिया का सर्वोत्तम विस्थापन-पुनर्वास बताते हुए जिस तरह परियोजना के कसीदे पढ़े थे,आज वे धूल-धूसरित दिखाई दे रहे हैं। बांध बनने और उसके कथित लाभों के दावों के बावजूद आज तक विस्थापित न्याय-संगत, कानूनी पुनर्वास प्राप्त कर पाने से वंचित हैं।
‘कोई नहीं हटेगा, बांध नहीं बनेगा’–अस्सी-नब्बे के दशक की नर्मदा घाटी की यह गूंज आज भी सुनाई देती है। बांध भले ही बन गया, लेकिन लड़ाई बंद नहीं हुई है। चाहे वह डूब प्रभावितों की लड़ाई हो या फिर मध्यप्रदेश और गुजरात सरकारों के बीच की। जहाँ डूब प्रभावित अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं, तो वहीं सरकारें लकीरें पीटने की नूराकुश्ती में व्यस्त हैं। इन सबके बीच प्रभावितों की बरसों पुरानी मांग का निराकरण करते हुये मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने भूखंडों की रजिस्ट्री करने का आदेश दिया है। मजे की बात है कि इस एक ही आदेश से प्रभावित, रिश्वतखोर अधिकारी और ‘नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण’ में दलाली करने वाले सब खुश नजर आ रहे हैं। अधिकारी-दलाल गठजोड़ में शामिल लोगों के चेहरे की रौनक बता रही है कि वे इस बार रजिस्ट्री करवाने में मुआवजे की पिछली दलाली से भी ज्यादा चाँदी काटेंगे।
‘सरदार सरोवर बांध’ की नींव 1961 में रखी गई थी और 2017 में इसे लोकर्पित किया गया था। इस दौरान ‘नवागाम बांध’ का नाम ‘सरदार सरोवर’ हो गया। सरकार द्वारा प्रभावितों का पुनर्वास न किए जाने से सन् 1995 में सुप्रीम कोर्ट ने बांध की ऊंचाई 80.03 मीटर तक रखने के निर्देश दिए थे। उस समय मप्र सरकार ने गुजरात सरकार से 281 करोड़ के मुआवजे की मांग की थी। गुजरात सरकार ने इसे अधिक बताते हुये राशि देने से इंकार कर दिया था। पुनर्वास के सवाल बने रहे, लेकिन सन् 2014 में बांध की पूर्ण ऊंचाई 138.68 मीटर तक बढ़ा दी गई और 2019 में इसे पूरी क्षमता से भर भी दिया गया।
इसके बाद मप्र सरकार ने वास्तविक डूब के आधार पर गुजरात सरकार से 7669.19 करोड़ रुपए का हर्जाना माँगा। इसमें प्रदेश में बांध से डूबी वन-राजस्व-आबादी भूमि परिसंपत्ति, खनिज संपदा, पुनर्वास के लिए उपयोग में ली गई भूमि तथा पुनर्वास स्थलों के विकास पर हुए खर्च शामिल थे। मप्र सरकार का दावा है कि बाँध के पूरा भरने पर 178 के बदले प्रदेश के 192 गाँव डूब गए। इसका अर्थ है कि सरकार ने पुनर्वास की जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने के लिए पहले डूब का प्रभाव कम बताया था और इसी आधार पर पुनर्वास के दावे किए गए थे।
‘नर्मदा न्यायाधिकरण’ के गठन के पहले से ही अनुभव किया गया है कि राज्यों के बीच गुजरात हमेशा भारी पड़ा है। 30 सालों से गुजरात सरकार न तो मध्यप्रदेश को उसके अधिकार का पैसा दे रही है और न ही मध्यप्रदेश सरकार अपना पैसा वसूल पाई है। ताजा स्थिति के अनुसार गुजरात सरकार साढ़े सात हजार करोड़ रुपए में से मात्र 281 करोड़ में ही मामला निपटाना चाहती है। अब मध्यप्रदेश सरकार के सामने आर्बिट्रेशन में जाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा है।
‘सरदार सरोवर परियोजना’ से प्रभावित लोगों की बात करें तो आज भी कई लोग मुआवजे की बाट जोह रहे हैं। हजारों मामले ‘शिकायत निवारण प्राधिकरण’ में सालों से बिना सुनवाई के लंबित पड़े हैं क्योंकि वहाँ न्यायाधीशों की नियुक्ति करवाने के लिए ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ को न्यायालय में जाना पड़ता है। प्राधिकरण से निराक़ृत सैकड़ों प्रकरण उच्च न्यायालय में लंबित हैं, क्योंकि सरकार न्यायालय के आदेश भी नहीं मानती। पुनर्वास से बचे प्रभावित मांगों को लेकर ‘नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण’ के सिर्फ चक्कर ही काट रहे हैं क्योंकि विभाग के किसी भी आफिस में पुनर्वास अधिकारी नहीं है। दूसरी ओर डूब प्रभावितों को आवंटित भूखंडों की रजिस्ट्री हेतु मप्र उच्च न्यायालय द्वारा दिये गए आदेश के बाद डूब प्रभावित आशान्वित हैं कि रजिस्ट्री के बाद वे भूखण्डों के मालिक बन जाएंगे।
‘सरदार सरोवर बांध’ प्रभावितों को जब मुआवजा वितरण प्रारम्भ हुआ तो उसमें जमकर भ्रष्टाचार के साथ दलाली हुई। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा गठित ‘जस्टिस श्रवणशंकर झा आयोग’ की विस्तृत रिपोर्ट ने उसकी पुष्टि की थी। दलालों और अधिकारियों के संगठित भ्रष्टाचार उन दिनों काफी सुर्खियों में रहे थे। मुआवजे की दलाली में दलालों के साथ 40 अधिकारी-कर्मचारियों के नाम भी ‘झा आयोग’ की रिपोर्ट में आए थे, लेकिन सरकार ने किसी पर कोई कार्यवाही नहीं की। उस समय के सरकारी कारिंदे आज तक विभाग में जमे हैं, उनके पुराने दलालों के साथ फिर से मधुर संबंध कायम होने लगे हैं। यह गठजोड़ बेघर हुए प्रभावितों को शिकार बनाने के लिए गिद्ध दृष्टि लगाए बैठा है।
सन् 2019 में डूब चुके पिछोड़ी गाँव के करीब डेढ़ सौ परिवारों को सिर्फ कागज में ही पट्टा दिया गया है, क्योंकि उनके पुनर्वास के लिए जो जमीन अधिग्रहित की गई थी उसका कब्जा सरकार नहीं ले पाई है। मध्यप्रदेश सरकार जिनके पुनर्वास के लिए गुजरात से हर्जाना माँग रही है, उनका तो पुनर्वास ही नहीं किया गया है। इसके अलावा 16 हजार प्रभावित परिवारों को डूब से बाहर बताकर पुनर्वास से इंकार कर दिया गया है, हालांकि इनमें से ज्यादातर परिवारों को आवासीय भूखण्ड पहले ही आवंटित कर दिए गए थे। जिन प्रभावितों ने आवंटित भूखंड पर निर्माण नहीं किया उनके भूखंडों पर अवैध कब्जे भी हो गए हैं। इतना ही नहीं, बड़ी संख्या में लोगों ने अपने भूखण्ड दूसरों को बेच दिए हैं और खरीददारों ने उन पर निर्माण भी कर लिए हैं। ऐसे में भूखण्डों की रजिस्ट्री प्रक्रिया आसान नहीं होने वाली। आयुक्त पुनर्वास/फील्ड (‘नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण, इंदौर’) के द्वारा अपने मातहतों को जारी पत्र में स्पष्ट है कि भूखंडों का नामांतरण एव सीमांकन किये जाने के साथ राजस्व अभिलेख एवं मानचित्र में संशोधन किया जाना भी शामिल है, उसी के बाद रजिस्ट्री प्रक्रिया की जाएगी। ‘नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण’ के अधिकारियों को भी मालूम है, किस भूखंड पर कौन काबिज है, और कौन कब्जेदार है। इन सबके चलते आने वाले समय में हर पुर्नवास स्थल पर विवाद होने से इंकार नहीं किया जा सकता। (सप्रेस)


