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मनुष्य, प्रकृति और समाज के पक्ष में हर वक्‍त खड़े रहे माणकचंद कटारिया : मेधा पाटकर

माणकचंद कटारिया की जन्मशताब्‍दी पर स्मरण–संवाद कार्यक्रम में ‘अहिंसा कुछ करने को कहती है’ का विमोचन

इंदौर, 14 दिसंबर। ‘’माणकचंद कटारिया मध्यप्रदेश के गांधी ही नहीं, बल्कि अपने समय की एक आंधी भी थे। उन्होंने हर उस मुद्दे पर लिखा और जिया, जहां मनुष्य, प्रकृति और समाज के साथ अन्याय हो रहा था। महावीर स्वामी और महात्मा गांधी के विचारों को जोड़कर उन्होंने जो जीवन-दृष्टि प्रस्तुत की, वह आज और अधिक प्रासंगिक हो गई है।‘’ सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने यह विचार गांधीवादी चिंतक माणकचंद कटारिया की जन्मशताब्दी पर आयोजित स्मरण-संवाद और उनकी पुस्तक ‘अहिंसा कुछ करने को कहती है’ के विमोचन अवसर पर व्यक्त किए। इस मौके पर सामाजिक कार्यकर्ता श्री अनिल त्रिवेदी, वरिष्‍ठ पत्रकार एवं लेखक श्रवण गर्ग एवं प्रतिष्ठित कवि कुमार अंबुज, साहित्‍यकार सरोजकुमार अतिथि बतौर उपस्थित थे1

उल्लेखनीय है कि माणकचंद कटारिया ने स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े अनुभवों, युवा मन के प्रश्नों और सामाजिक सरोकारों को अपनी डायरियों में सहेजा था। इन्हीं स्मृतियों और अप्रकाशित लेखों का संकलन ‘अहिंसा कुछ करने को कहती है’ में किया गया है।

कटारिया के विचारों को जीवंत रखना हमारा कर्तव्य

इस मौके पर मेधा पाटकर ने कहा कि कटारिया ने हिंसा को हर रूप में नकारा। केवल हथियारों की हिंसा नहीं, बल्कि प्रकृति का शोषण, श्रम का अपमान और जरूरत से ज्यादा संग्रह भी हिंसा है। स्वतंत्रता आंदोलन में सभी धर्मों और वर्गों की साझी भागीदारी का स्मरण कराते हुए उन्होंने कहा कि आज धर्म के नाम पर समाज को बांटा जा रहा है। ऐसे समय में कटारिया के विचारों को जीवंत रखना हमारा कर्तव्य है।

स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में 1942 के संघर्षों को स्वयं झेलने के बावजूद माणकचंद कटारिया ने जीवनभर अहिंसा को ही अपना धर्म बनाए रखा—यह अपने आप में असाधारण है। महात्मा गांधी और भगवान महावीर के “मेरा जीवन ही मेरा संदेश है” के सूत्र को माणकचंद कटारिया ने अपनी पूरी जीवन-यात्रा में व्यवहार में उतारा।

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उन्होंने कहा कि आज देश में हिंसा तेज़ी से बढ़ रही है—धर्म, जाति, वर्ग, लिंग और क्षेत्र के आधार पर समाज का विभाजन गहराता जा रहा है। ऐसे समय में ‘अहिंसा कुछ करने को कहती है’ जैसी डायरी केवल स्मृति नहीं, बल्कि आज के लिए चेतावनी और दिशा है। कटारिया जी ने हिंसा और प्रतिहिंसा के बीच “दीवार” बनने के बजाय “दामन” बनने का रास्ता चुना—ऐसा दामन जिस पर इंसानी ख़ून का रंग न हो।

मेधा पाटकर ने कहा कि कटारिया जी की डायरी में धर्म का जो विवेकपूर्ण विश्लेषण है, वह आज भी बेहद प्रासंगिक है। उन्होंने धर्म को कर्म, मानवता और प्रकृति से जोड़कर देखा। श्रम की गरिमा पर उनके विचार आज के उपभोक्तावादी समाज को आईना दिखाते हैं, जहां श्रम से बचना और आराम को जीवन का लक्ष्य मान लिया गया है। उन्होंने कहा कि जब तक श्रम को जीवन का स्वाभाविक हिस्सा नहीं माना जाएगा, अहिंसा समाज में प्रवेश नहीं कर सकती।

पर्यावरण और विकास के संदर्भ में बोलते हुए मेधा पाटकर ने कहा कि प्रकृति के साथ हो रही हिंसा अंततः मनुष्य के खिलाफ हिंसा में बदल जाती है। जलवायु परिवर्तन, विस्थापन और विषमता उसी विकास मॉडल का परिणाम हैं, जिसे कटारिया जी ने दशकों पहले ही प्रश्नांकित किया था। सादगी, स्वावलंबन और प्रकृति-सम्मत जीवन—यही उनके दर्शन का सार था।

उन्होंने कहा कि हम महावीर, गांधी या माणकचंद कटारिया नहीं बन सकते, लेकिन उनके विचारों को अपने जीवन में जीवित रखना आज का कर्तव्य और संकल्प होना चाहिए। धर्म, उत्सव और आडंबर के दायरे से बाहर निकलकर पीड़ा के बीच जाकर करुणा को जीना ही अहिंसा की सच्ची आराधना है।

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सामाजिक कार्यकर्ता अनिल त्रिवेदी (75 वर्षीय) ने बचपन और युवापन में कटारियाजी से मिले सान्निध्‍य-संस्‍मरण को रखा। उन्‍होंने कहा कि कटारिया के जीवन-मूल्य गांधी और महावीर से जुड़े थे। उन्‍होंने कहा पुरानी दुनिया और नई दुनिया में अंतर है। पुराना जीवन तन और मन के बल पर चलता था और लेकिन हमने नई चीज खोज ली धन और तन मन को कबीर की चदार के तरह टांग दिया और धन के बावले होकर जीवन को चलाना चाहते है तो हमको अजीब चलता है कि उन्होंने बिना धन के केवल तन और मन के बल पर जीवन जिया, इसलिए आज उनका जीवन हमें असहज लगता है। इन पचास सालों में हमारा जीवन का दर्शन ही बदल गया। आधुनिक दुनिया में मनुष्‍य अपने आप से डरता है। वह तेज हीन और खोया हुआ है। महावीर की यात्रा विजर्सन से आरंभ होती है, वैभव धनसंपदा को छोडकर अपने जीवन को चलाने की यात्रा पर चले थे  और हम अपने जीवन को छोडकर धनसंपदा को अपनाने में पुरूषार्थ कर रहे है। ये परिप्रेक्ष्‍य पूरी दुनिया में बदला है। माणकचंद जी जैसे लोग किसी दूसरी दुनिया के लोग नहीं थे।

स्मृतियों का संकलन नहीं, बल्कि कालजयी दस्तावेज

कवि व लेखक कुमार अंबुज ने कहा कि उन्होंने कटारिया जी की 17 से 22 वर्ष की उम्र के बीच लिखी गई डायरियां पढ़ीं, जिनमें एक युवा की बेचैनी, आत्मशोध और समकालीन विश्व घटनाओं की गहरी समझ दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि संवेदनशीलता, स्वप्नशीलता और विचारशीलता से ही साहित्य बनता है और यह पुस्तक उसी का उदाहरण है।

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इतिहास को मानवीय दृष्टि से देखने का नजरिया

वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक श्रवण गर्ग ने कहा कि उनकी डायरी यह समझने का अवसर देती है कि आजादी से पहले का युवा क्या सोचता था और किस तरह के संघर्षों से गुजरता था। उन्होंने गांधी और सरदार पटेल से जुड़े प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि यह पुस्तक इतिहास को मानवीय दृष्टि से देखने का नजरिया देती है।

समारोह में कवि सरोज कुमार, शिक्षाविद माधव परांजपे, डॉ. भरत रावत, पदमश्री भालू मोढे, राकेश दीवान, संजय पटेल, मनोरमा कुटटी मेनन, राजेंद्र कोठारी, दीपक खरे, कुमार सिद्धार्थ, अमूल्‍य निधि, डॉ सम्‍यक जैन, कस्‍तूरबाग्राम से जुड़े परिवारजन, सुरेश मंडलोई सहित शहर के कई प्रबुद्धजन शामिल हुए। कार्यक्रम में पंचम निषाद संगीत संस्थान की भक्तिमय प्रस्तुति भी हुई, जिसका निर्देशन शोभा चौधरी ने किया।

इस मौके पर माणकचंद कटारिया की पुस्तक ‘महावीर जीवन में’ की चतुर्थ आवृत्ति और अतुल कटारिया के कविता संग्रह वाचाल चुप्पियां का विमोचन भी किया गया। इस मौके पर परिवार के अरविंद-मीना कटारिया, मंजु गर्ग, किरण-नरेंद्र जैन, अजय-रेणु कटारिया और रश्मि कटारिया ने अतिथियों को स्‍मृति चिन्‍ह भेंट कर अभिनंदन किया।

कार्यक्रम का संचालन अतुल कटारिया ने किया। इस मौके पर शहर के प्रबुध्‍द गणमान्‍य नगारिक बडी संख्‍या में उपस्थित थे।

     

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