हमारा जीवन-हमारे मानवाधिकार

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दुनिया तेज़ विकास की दौड़ में पर्यावरण, गरिमा और मानवाधिकारों की उपेक्षा करती जा रही है। आधुनिकता ने नए जोखिम खड़े किए हैं, जिससे आज की पीढ़ी अपने भविष्य को लेकर चिंतित है। इसी संदर्भ में मानवाधिकार दिवस 2025 की थीम—मानवाधिकार, हमारी दैनिक आवश्यकताएँ—यह सवाल उठाती है कि क्या हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी वास्तव में मानव गरिमा का सम्मान कर पा रही है।


10 दिसंबर : विश्व मानव अधिकार दिवस

विश्व में प्रतिस्पर्धा है. दुनिया के सभी देश एक दूसरे से अधिक विकास करके आगे निकल जाना चाहते हैं. इन देशों में गलाकाट प्रतिस्पर्धा है. इन देशों में पर्यावरण को लेकर चिंताएं कम हैं. मनुष्य की गरिमा को लेकर कम हैं. इस ग्रह को लेकर केवल बड़ी-बड़ी बातें हो रही हैं. आधुनिकता ने सम्पूर्ण विश्व को एक अलग ही स्तर पर प्रभावित किया है. इससे हमारी आज की पीढ़ी बहुत ही सशंकित है कि आने वाले समय में हम किस प्रकार की सभ्यता और संस्कृति के हिस्सा बनेंगे? यह चिंता जायज है.

इस वर्ष संयुक्त राष्ट्र ने मानव अधिकारों के लिए जो थीम चुना है वह है मानवाधिकार, हमारी दैनिक आवश्यकताएं. इस थीम के मुताबिक पूरी दुनिया इस बहस में है कि क्या मनुष्य अपरिग्रह और अस्तेय के मूल्यों को समझ सका है या नहीं. इस बहस में है कि हमारी दैनिक दैनंदिन में वे कौन से तत्व हैं जो हमारी गरिमा के हनन में ज्यादा सक्रिय हैं.

विश्व मानव अधिकार दिवस हर वर्ष 10 दिसंबर को मनाया जाता है. इस वर्ष के विमर्श के केंद्र में है हमारी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी. इस वर्ष के केंद्र में है हमारा वातावरण. इस वर्ष के केंद्र में है हमारे मूलभूत अधिकार और हमारी आवश्यकताएं. लेकिन उन देशों का क्या जहाँ युद्ध हो रहे हैं. उन देशों का क्या जहाँ की महिलाएं शिक्षा से वंचित हैं. उनका क्या जो लोग अनागरिक होकर अपना जीवन जी रहे हैं. सबसे बुरा है अनागरिक होना. उनके मानव अधिकार की चिंता आखिर कौन करेगा. 4.4 मिलियन स्टेटलेसनेस पीपुल्स के बारे में आज कोई सोचने को तैयार नहीं है. शरणार्थी लोगों के जीवन के बारे में भी अगर विश्व के लोग बात करें तो शायद हम सम्पूर्ण रूप से मानव अधिकार के ऊपर परिचर्चा में सम्मिलित होंगे. कुछ लोगों को छोड़कर कुछ लोगों पर बात करके हम पृथ्वी के सभी नागरिकों के हितों पर बात करने से बच रहे हैं. यह बहस फिर हमारी दैनिक आवश्यकताओं की अधूरी है.

संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार उच्चायोग को विश्वव्यापी थीम बनाने में तो आसानी है लेकिन यदि सबको बहस में उच्चायोग सम्मिलित नहीं कर पाता तो यह तो सबसे बड़ी विडंबना है. लेकिन यह एक बड़ा सच है कि अभी भी दुनिया में कोई ऐसा तंत्र विकसित नहीं हो सका है जो सम्पूर्ण पृथ्वी को एक बहस के साथ जोड़ सके. इससे एक सवाल मन में आना स्वाभाविक है कि क्या यह कुछेक लोगों की बहसें हैं जिस पर पूरी पृथ्वी के प्रश्नों को किनारे करके संतोष कर लिया जाता है? आखिर इन बहसों से फिर निकलना क्या है? लेकिन अच्छी बात यह है कि कुछ तो बातें हो रही हैं वरना दुनिया के बहुत से सवाल प्रश्नांकित भी न हों सकें और जो वैश्विक स्तर पर बहस चल रही है वह भी बंद हो जाए.

इस बार का सवाल है कि हमारा दैनंदिन क्या है और हमारे दैनंदिन की आवश्यकताएं कितना ज़रूरी हैं हमारे जीवन के लिए. इस बार का सवाल है कि दुनिया की कितनी प्रतिशत आबादी अपनी दैनिक जीवन की ज़रूरतों को पूर्ण कर पा रही है और कितने लोग वंचना के शिकार हैं. यदि हम अफगानिस्तान की स्त्रियों से पूछें तो उन्हें बोलने की आज़ादी नहीं है. भारत के आसपास जेन-जी के आन्दोलनों ने कई सवालों को इस बीच उठाया है. भारत में ही जो आबादी वंचना की शिकार है उनके जीवन की ज़रूरतें भी बहुत अहम् हैं और यदि उनके जीवन की आवश्यकताओं की प्रतिपूर्ति नहीं हो रही है तो निःसंदेह यह मानवाधिकारों का बहुत बड़ा हनन है. यह उन आबादी की गरिमा से जुड़ा प्रश्न है. भारत समेत दुनिया के बहुत से देशों में डिजटलीकरण बड़े पैमाने पर हुआ है लेकिन सबके जीवन में उतनी मूलभूत सुविधाएँ नहीं हैं जिससे वे डिजटलीकरण का लाभ ले सकें. यह जो अंतर है उसकी भरपाई के लिए राज्य जब तक तैयार नहीं हैं तो एक अच्छी खासी आबााादी मानव अधिकारों से वंचित रहेगी.

अब विभिन्न देशों में मानव अधिकारों को केवल मनुष्य तक नहीं देखा जा रहा है. पशुधन, पर्यावरण और जंगल भी मनुष्य के जीवन की आवश्यकताओं को पूर्ण करते हैं, यह एक बड़ा सच है. लेकिन ऐसे बहुत से देश है जहाँ जानवर सुरक्षित नहीं हैं. ऐसे बहुत से देश हैं जहाँ जंगल सुरक्षित नहीं हैं. भारत के उत्तरी हिस्से में एक बार फिर सफ़ेद धुन्ध छाई हुई है. दिल्ली और आसपास के इलाक़ों में रहने वाले लाखों लोगों के लिए सर्दियाँ अब मास्क पहनने, गले में जलन महसूस करने और आँखों में चुभन का मौसम बन गई है. साँस लेने की सामान्य प्रक्रिया भी, अब लोगों की सेहत के लिए नुक़सानदेह होती जा रही है.

पर्यावरण पर तो कॉप-30 में कितनी बहसें अभी विगत समय में हुई हैं, पूरी पृथ्वी की इंटेलक्चुअल कम्युनिटी जानती है. ब्राज़ील के बेलेम शहर में यूएन का वार्षिक जलवायु सम्मेलन-कॉप30 में स्वच्छ, स्वस्थ पर्यावरण की खूब चर्चा हुई. जलवायु अधिकार व जलवायु न्याय के लिए बातें हुईं. क़ानूनी याचिका को कारगर बताया गया. लेकिन आने वाले कॉप-31 जब भी बहस के केंद्र में आएगा तो कोई भी ऐसा आंकड़ा सामने आने के आसार नहीं हैं जिससे पूरी पृथ्वी की आबादी राहत की सांस लेती नज़र आए और अपने देशों पर गर्व कर सके.

यह जो जीवन के साथ घटित होने वाले जोखिम हैं उसके पीछे कहीं न कहीं मनुष्य की लालच और उसके भयानक विकास के स्वप्न भी हैं. अब विकास को सतत विकास के साथ बहस में लाया जा रहा है लेकिन विश्व में ऐसी कोई उओजना नहीं है कि बड़े पैमाने पर ग्रीन हाउस की चिंता को ख़त्म किया जाए. हम रोज खाते क्या हैं, पहनते क्या हैं? हम रोज जीते क्या हैं? हम रोज रहना कहाँ पसंद करते हैं? यह सब हमारा दैनंदिन का हिस्सा है. पिज्जा और बर्गर खाने वाली आज की आबादी भूखे लगों के पेट के बारे में नहीं सोचती. आज की आबादी शहरी भूख और शहरी भुलावे में गाँव की स्वच्छ हवा भी नहीं चाहती. खाती भी है अपने मन की और जीती भी है अपने मन की. लेकिन पता है यह सब तय होते हैं किसी के जीवन के साथ अतिक्रमण के साथ. यह सब पूर्ण होते हैं किसी के हक को मारकर. ऐसे में हमारे मानव अधिकार सुरक्षित होंगे कैसे?

विश्व मानव अधिकार दिवस पर हमारे देश में और दुनिया में यह अब तय करने की बारी है कि हम क्या सही भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं कि हमारा आने वाला समय बिलकुल हमसे ही रूठ कर दूर जाने वाला है. यह तय करना है कि हमारी पृथ्वी, जल-जंगल-जमीन और जीवन बचे कैसे? यह तह करना है कि हम अपने ऊपर अंकुश लगा सकते हैं या नहीं? यदि यह सब तय नहीं हुआ तो हमारा जीवन हमें छोड़ देगा और असमय छोड़ देगा.

आज की चुनौतियाँ हमें आगाह कर रही हैं कि अभी सही समय है जितना खोया उसे ठीक कैसे करें, इस पर विचार करें. हमारे लीविंग स्टैण्डर्ड भले ही हमें धोखे में रखें लेकिन हमारे पूर्वज जो कि नदी के किनारे जीवन जीते थे. गाँव या जंगल में रहना पसंद करते थे. साधारण जीवन से अपने यश, बल, बुद्धि, विद्या का विस्तार करके सबके हित में कार्य करते थे वे लोग हमें धोखा नहीं देंगे. इनकी सुचिता, शुद्धता और सादगी से परहेज करती आज की आबादी को उनसे प्रेरणा लेने की ज़रूरत है तभी हम आज हमारी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति अच्छे से कर सकेंगे और आने वाली पीढ़ी को सुखमय भविष्य दे पाएंगे नहीं तो एक-दूसरे का अतिक्रमण करती पीढ़िया एक दिन स्वतः अपनी करनी से समाप्त हो जाएँगी.

लेखक राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी रह चुके हैं और केंद्रीय विश्वविद्यालय पंजाब में चेयर प्रोफेसर हैं।

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