‘स्मार्ट सिटी’ में डाटा : निजीकरण से कमाई

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आजकल डाटा पूंजी के नए रूप की तरह उभरा है। मोबाइल का सामान्य उपयोग हमारे जीवन की जानकारियों, यानि डाटा को सार्वजनिक कर सकता है जिसे बाद में तरह-तरह के बाजारों में बेचा जा सकता है। एक दशक पहले देश के 100 शहरों को स्मार्ट बनाने के लिए लाया गया ‘स्मार्ट सिटी मिशन’ इसी डाटा की कमाई का आसान तरीका बन गया है। क्या हैं, इसके निहितार्थ?


खालिक पारकर

‘स्मार्ट सिटीज़ मिशन’ ने डेटा-आधारित शासन के एक नए दौर की शुरुआत करके भारत के शहरों को पुनर्जीवित करने का वादा किया था। इसमें कहा गया था कि ऐप्स के ज़रिए डेटा का उपयोग करके नागरिकों को प्रमाणपत्र और आधिकारिक दस्तावेज़ सीधे उपलब्ध कराए जा सकेंगे, जबकि संपत्तिकर और सेवाओं के बिलों की ऑनलाइन वसूली से नगर निगमों की आमदनी में सुधार किया जा सकता है। इसने यह विचार भी रखा कि शहरी सेवाएं जैसे सार्वजनिक परिवहन, यातायात नियंत्रण और कचरा संग्रहण, डेटा विश्लेषण और स्वचालन के उपयोग से काफी बेहतर बनाई जा सकती हैं।

इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए बेंगलुरु, भुवनेश्वर, भोपाल और सूरत जैसे शहरों में सार्वजनिक परिवहन, यातायात और कुछ मामलों में ठोस कचरे से जुड़ा डेटा एकत्र करने के लिए विभिन्न सेंसर, नेटवर्क और डाटाबेस स्थापित किए गए। मिशन के तहत चुने गए सौ शहरों में बनाए गए ‘इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटरों’ के प्लेटफॉर्म इन डिजिटल संरचनाओं से प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण करके शहरी सेवाओं को स्वचालित करने वाले थे। डेटा डैशबोर्ड शहर प्रशासन को प्रदर्शन की निगरानी में मदद करने के लिए बनाए गए थे, ताकि निर्णय लेने की प्रक्रिया में सुधार किया जा सके।

आवास और शहरी कार्य मंत्रालय ने इन डेटा आधारित प्रयासों को दिशा देने के लिए ‘डेटा स्मार्ट सिटीज स्ट्रैटेजी’ जारी की थी। इसके अलावा, ‘इंडिया अर्बन डेटा एक्सचेंज’ नामक एक केंद्रीकृत प्लेटफॉर्म ने ‘स्मार्ट सिटीज मिशन’ के तहत 50 शहरों की डिजिटल अवसंरचना से प्राप्त आंकड़ों को एकत्रित किया, लेकिन दस साल बाद भी ‘स्मार्ट सिटीज मिशन’ के वादे पूरे नहीं हुए हैं। इसके बजाय, इन आकर्षक नारों के पीछे सार्वजनिक धन से तैयार की गई अवसंरचना और डेटा का उपयोग शहरी शासन के निजीकरण को तेज़ करने के लिए किया जा रहा है।

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‘स्मार्ट सिटीज मिशन’ की कमियों के बावजूद, डेटा आधारित शासन और ऐप्स नए शहरी कार्यक्रमों का केंद्र बने हुए हैं। साल 2021 में ‘नेशनल अर्बन डिजिटल मिशन’ ने पूरे देश के सभी शहरों और कस्बों में नागरिकों को प्रमाणपत्र और सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए ‘उपयोग’ नामक एक एकीकृत ऐप पेश किया। इस वर्ष ‘ट्रांसपोर्ट स्टैक’ परियोजनाएं शुरू की गईं, जिनके तहत दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों में सार्वजनिक परिवहन के लिए ऐप्स लाए जा रहे हैं। इनका उद्देश्य ऑनलाइन टिकटिंग, मार्ग योजना और वाहनों की ट्रैकिंग जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराना है।

शहरी डिजिटल डेटा तैयार करने का प्रयास नया नहीं है। पिछले चार दशकों में भूमि स्वामित्व शीर्षक, संपत्तिकर रजिस्टर और जन्म-मृत्यु पंजीकरण जैसे नगर निगम अभिलेखों को धीरे-धीरे केंद्र और राज्य सरकारों की विभिन्न योजनाओं के तहत डिजिटाइज किया गया। साल 2006 की ‘नेशनल ई-गवर्नेंस योजना’ ने इन प्रयासों को कुछ गति दी थी, लेकिन अधिकांश राज्यों ने नागरिकों के अभिलेखों का डिजिटलीकरण और शहरों के संपत्ति रिकॉर्ड का एकीकरण केवल 2020 के आसपास ही पूरा किया, जब उन्हें ‘स्मार्ट सिटीज मिशन’ के तहत धन प्राप्त हुआ।

खंडित ‘नेशनल ई-गवर्नेंस योजना’ की वेबसाइटों को बदलने के लिए एकीकृत ऐप्स बनाए गए। इनसे नागरिक प्रमाणपत्र, लाइसेंस और कर वसूली से जुड़ी सेवाओं का लाभ ऑनलाइन उठा सकते थे, बिना नगर निगम कार्यालय गए। ‘स्मार्ट सिटीज मिशन’ का विशेष योगदान यह था कि इसने वाहनों की संख्या और गति का डेटा एकत्र करने, यातायात उल्लंघनों का पता लगाने, सार्वजनिक परिवहन वाहनों की निगरानी करने और कचरा संग्रहण को मापने के लिए डिजिटल अवसंरचना स्थापित की। ‘इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर्स’ में मौजूद सॉफ्टवेयर का उद्देश्य इन आंकड़ों का विश्लेषण कर शहरी सेवाओं में सुधार करना था — जैसे स्वचालित सिग्नलों के जरिए यातायात नियंत्रण, सार्वजनिक परिवहन की पहुंच और प्रदर्शन की निगरानी, तथा ‘प्रेडिक्टिव एनालिटिक्स’ के माध्यम से बेहतर आवागमन और कचरा संग्रहण मार्ग सुझाना।

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यातायात उल्लंघन सेंसर, नंबर प्लेट पहचान कैमरे और सभी पंजीकृत वाहनों के केंद्रीय वाहन डेटाबेस के माध्यम से जुर्माने की वसूली में तो वृद्धि हुई है, लेकिन ‘स्वचालित यातायात नियंत्रण प्रणाली’ अक्सर व्यस्त घंटों में अपने निर्धारित तरीके से काम नहीं करती। सार्वजनिक परिवहन तक बेहतर पहुंच के सबूत बहुत कम हैं, क्योंकि ‘स्मार्ट सिटीज मिशन’ के ऐप वाहन की वास्तविक स्थिति की जानकारी देने में विफल रहे। डेटा के उपयोग से कचरा संग्रहण या मार्ग योजना में सुधार का भी कोई स्पष्ट उदाहरण नहीं है। शहरों में आपातकालीन वाहनों के लिए ‘ग्रीन कॉरिडोर’ बनाने की कई पायलट परियोजनाओं की घोषणा की गई थी, लेकिन वे शायद ही लागू हुई हों।

इन विविध डिजिटल अवसंरचनाओं के परिणामस्वरूप, कई शहरों में उपलब्ध सबसे विस्तृत डेटा सार्वजनिक परिवहन, यातायात की मात्रा और गति तथा कचरा संग्रहण से संबंधित है। यह डेटा विभिन्न शहरों से एकत्रकर ‘इंडिया अर्बन डेटा एक्सचेंज’ में केंद्रीकृत किया गया है। यह एक्सचेंज डेटा मार्केटप्लेस के रूप में कार्य करते हुए अकादमिक संस्थानों और उद्योगों को डेटा तक पहुंच प्रदानकर सार्वजनिक हित में इसके उपयोग का वादा करता है।

यह एक्सचेंज शहरों की अवसंरचना से डेटा एकत्र करता है और कंपनियों को उस तक पहुंच प्रदान करता है, लेकिन स्पष्ट डेटा कानूनों और नीतियों के अभाव में यह स्पष्ट नहीं है कि इस सार्वजनिक डेटा तक पहुंच की अनुमति कौन देता है और क्या इसके लिए कोई शुल्क लिया जाता है। उदाहरण के लिए, भुवनेश्वर का सार्वजनिक परिवहन डेटा इस एक्सचेंज पर उपलब्ध कराया गया था। एक निजी कंपनी ने इस डेटा का उपयोग अपनी टिकटिंग और बस ट्रैकिंग ऐप चलाने के लिए किया, जिसे बाद में शहर की सार्वजनिक परिवहन एजेंसी को एक ‘समाधान’ के रूप में बेचा गया। इसी तरह के ऐप यातायात नियंत्रण, सार्वजनिक परिवहन और ठोस कचरा प्रबंधन के लिए सूरत, बेंगलुरु और वाराणसी जैसे शहरों में भी लागू किए गए।

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प्रमाणपत्र, लाइसेंस और बिलिंग की डिजिटल डिलीवरी डिजिटलीकरण के पूरा होने के बाद निश्चित रूप से तेज़ और अधिक कुशल हुई है, लेकिन यह वास्तव में ‘स्मार्ट सिटीज मिशन’ की नहीं, बल्कि पहले की ई-गवर्नेंस सुधार पहलों की क्रमिक सफलता है। ‘स्मार्ट सिटीज मिशन’ ने केवल इन सेवाओं तक पहुंच के लिए एकीकृत ऐप्स पेश करके इन पहलों को पूरा करने में सहायता की। इस क्षेत्र में ‘स्मार्ट सिटीज मिशन’ का योगदान सार्वजनिक धन से डिजिटल अवसंरचना स्थापित करने तक सीमित रहा। जो जानकारी एजेंसियों को शहरी सेवाओं की गुणवत्ता सुधारने में मदद करने के लिए एकत्र की गई थी, वह अंततः ‘इंडिया अर्बन डेटा एक्सचेंज’ के माध्यम से एक वस्तु में बदल गई।

इन ऐप्स को विकसित और बढ़ावा देने वाले उद्योग प्रतिनिधियों का दावा है कि ये नागरिकों और शहरी सेवाओं में सुधार से जुड़ी अधूरी परियोजनाओं को पूरा करेंगे। हालांकि मंत्रालय और उद्योग जगत इन ऐप्स को ‘डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर’ कह रहे हैं, लेकिन इनका एकमात्र ‘सार्वजनिक’ पहलू वह डेटा है जिस पर ये निर्भर करते हैं — और यह डेटा दशकों से सरकार द्वारा वित्तपोषित डिजिटल परियोजनाओं और अवसंरचनाओं से प्राप्त हुआ है।

‘स्मार्ट सिटीज मिशन’ और ‘इंडिया अर्बन डेटा एक्सचेंज’ ने शहरी सेवाओं की गुणवत्ता सुधारने का वादा किया था, लेकिन वास्तव में ये इस बात की याद दिलाते हैं कि सार्वजनिक धन का उपयोग हमारे डेटा के वस्तुकरण और निजीकरण को तेज़ करने के लिए किया गया है। भारतीयों को इस मूल धारणा पर सवाल उठाने के लिए प्रेरित करना चाहिए कि डेटा आधारित शासन और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना हमारे शहरों को बेहतर बनाने की आदर्श रणनीतियाँ हैं। (सप्रेस द्वारा सेंटर फॉर फाइनेंशियल अकॉउंटेबिलिटी के सहयोग से) 


ख़ालिक पारकर ‘अंतरराष्ट्रीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान, हैदराबाद’ के ‘ह्यूमन साइंसेज़ रिसर्च सेंटर’ में सहायक प्रोफेसर हैं।

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