ब्राज़ील कोप सम्मेलन के मौके पर पर्यावणविद राजेंद्र सिंह की अमेज़न यात्रा

कोप सम्मेलन में अमेज़न संरक्षण पर निर्णायक कदम उठाने का आह्वान

बेलेम (ब्राज़ील), 10 नवंबर । अमेज़न नदी की उपधारा बामो की अध्ययन यात्रा के दौरान विश्वप्रसिद्ध जल संरक्षण कार्यकर्ता, तरूण भारत संघ के संंस्‍थापक, पानी वाले बाबा के नाम से ख्‍यात राजेंद्र सिंह ने कहा कि ब्राज़ील सरकार को कोप सम्मेलन में अमेज़न जंगल और नदी प्रणाली को बचाने के लिए ठोस और साहसिक नीति दुनिया के सामने रखनी चाहिए। उन्होंने चेताया कि अमेज़न के जंगलों का विनाश केवल ब्राज़ील का नहीं, बल्कि पूरी पृथ्वी की जलवायु का संकट है।

नदी की स्वच्छता सतही, प्रदूषण अदृश्य

मेगसेस पुरस्‍कार से सम्‍मानित राजेंद्र सिंह के अनुसार, यह नदी जहां कोप हो रहा है, ब्राजील के बेलेम शहर के बीचों बीच बहती है। बामो नदी ऊपर से स्वच्छ और निर्मल दिखाई देती है। किन्तु औद्योगिक गतिविधियों, तेजी से बढ़े पर्यटन और व्यावसायिक खेती के चलते पानी में रासायनिक प्रदूषण बढ़ रहा है। नदी की जगह – जगह पर अध्ययन करने पर पता चला कि, पहले यह क्षेत्र निर्जन था । पर्यटन और होटल बढ़ने से नदी का जल धीरे-धीरे प्रदूषित हो रहा है। बहुत तेजी से नदी के बेसिन क्षेत्र में जंगलों का कटान हो गया है। यहाँ पूजा या आस्था के नाम पर प्रदूषण नहीं है, पर उद्योगों से आया रसायन पानी में घुला हुआ है, दिखता नहीं, पर मौजूद है। उन्होंने बताया कि पिछले 15 वर्षों में जंगलों का कटाव नदी बेसिन के भविष्य को असुरक्षित बना रहा है।

यह यात्रा संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकार परिषद के विशेष दूत डॉ. पारले, सीआईटीआर के महानिदेशक श्री सैजो, और अनुसंधान निदेशक ग्रेज़ के साथ मिलकर की गई। इस नदी पर एक अध्ययन की योजना बनाने हेतु उसको केंद्रित करके यात्रा की गई थी।

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अमेज़न पृथ्वी का फेफड़ा है, इसे निजी लाभ के लिए नष्ट नहीं किया जा सकता

राजेंद्र सिंह ने कहा कि ब्राज़ील एक बहुत ही भाग्यशाली देश है, जहां अमेजॉन जैसा फॉरेस्ट और अमेज़न नदी है। अमेज़न विश्व की सबसे महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी प्रणालियों में से है। अमेज़न नदी बहुत सारी नदियों से समृद्ध रही है, लेकिन अब यह नए विकास और औद्योगिक कामों से प्रदूषित हो गई है।अमेज़न का विनाश, केवल जंगलों का खत्म होना नहीं यह धरती की साँस कम करना है। उन्होंने कोप सम्मेलनों की दिशा पर भी सवाल उठाए। कोप में अब प्रकृति, नदी और जंगल की आवाज़ नहीं सुनाई देती। वहाँ कंपनियों और राजनीतिक प्रभुत्व का बोलबाला है।

भारत से संरक्षण नीति का संकेत

उन्होंने याद दिलाया कि भारत ने 1992 में अरावली और वेस्टर्न घाट की रक्षा हेतु कठोर नीतियाँ लागू की थीं, जिससे विनाश की गति धीमी हुई। ब्राज़ील यदि अमेज़न को बचाने का सख्त निर्णय ले, तो यह पूरी दुनिया के लिए नेतृत्व का संदेश होगा।

अर्थसम्मिट में राजेंद्र सिंह ने तरुण भारत संघ के 50 वर्षों के काम का हवाला दिया। उन्‍होंने कहा कि यह सारा काम विस्थापन, बिगाड़ और विनाश मुक्त है। इस काम से धरती पर हरियाली बढ़ी है। जहां पहले 2 प्रतिशत जंगल था, अब वहां 48 प्रतिशत जंगल हो गया है। यह छोटे-मोटे क्षेत्र की बात नहीं है, बल्कि तरुण भारत संघ ने 10,600 स्क्वायर किलोमीटर में जगह-जगह पर जल, मिट्टी संरक्षण और हरियाली का संरक्षण का काम किया। उस क्षेत्र की आर्थिकी बदल गई। इस आर्थिकी बदलने से पारिस्थितिकी में योगदान दिया। जब पारिस्थितिकी और पर्यावरण सुधरता है, तो आर्थिक स्थिति भी सुधर जाती है। चंबल, अलवर, जैसलमेर, मेवात, जयपुर क्षेत्र के उदाहरण प्रस्तुत किए। यह पूरा सत्र अर्थ चार्टर पर तरुण भारत संघ के अनुभवों को सुनने का सत्र रहा।

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जलवायु संकट: समाधान सहजीवन में

राजेंद्र सिंह ने कहा कि जलवायु संकट को नकारने वाली ताकतें पूंजी हितों से प्रेरित हैं, जबकि सबसे अधिक पीड़ा गरीब और श्रमजीवी समाज झेल रहा है। हमें समझना होगा कि कौन लोग इस आपदा को नकार रहे हैं। नकारने वाले लोग पूंजीपति हैं। इन्हें जलवायु परिवर्तन की आपदा से कुछ मतलब नहीं है, लेकिन इंसानों का जीवन इससे भयानक रूप से त्रस्त हो रहा है। यह अभिजात पूंजीपति वर्ग है, जो अभी अपने खान-पान, रहन-सहन को थोड़े दिन के लिए शायद बचा लेता है, लेकिन वो भी दवाइयों पर ही चलता रहता है।

इस जीवन को यदि समृद्ध जीवन में बदलना है, तो सादगी, स्नेह और सरलता से प्रकृति के साथ समरसता से काम करने वाला रास्ता ढूंढना होगा। यही तरुण भारत संघ का पिछले 50 वर्षों का अपना रास्ता रहा है। इसलिए ऐसे ही कामों की दुनिया में जरूरत है।

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