हर वर्ष 10 नवंबर को मनाया जाने वाला ‘शांति एवं विकास के लिए विश्व विज्ञान दिवस’ हमें याद दिलाता है कि भविष्य की चुनौतियों का समाधान विज्ञान की प्रगति और समाज के विश्वास पर आधारित है। यूनेस्को की इस वर्ष की थीम बताती है कि 2050 के भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए विज्ञान को जनसहभागिता, नैतिकता और समावेशी दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ना होगा।
November 10: World Science Day
हर वर्ष 10 नवम्बर को ‘शांति एवं विकास के लिए विश्व विज्ञान दिवस’ मनाया जाता है, जो समाज में विज्ञान की भूमिका को पुनर्परिभाषित करने, वैज्ञानिक दृष्टिकोण को मजबूत करने और वैज्ञानिक प्रगति को जनसामान्य के जीवन से जोड़ने का प्रयास है। इस वर्ष यूनेस्को द्वारा घोषित थीम ‘विश्वास, परिवर्तन और कल: 2050 के लिए हमें जिस विज्ञान की आवश्यकता है’ इस तथ्य को रेखांकित करती है कि भविष्य की चुनौतियों का समाधान केवल विज्ञान में ही निहित है परंतु इसके लिए विज्ञान और समाज के बीच पारस्परिक विश्वास और सहयोग की नई बुनियाद रखनी होगी। विज्ञान ही वह माध्यम है, जो ज्ञान, तर्क, विवेक और सृजनशीलता के सहारे शांति और विकास की दिशा तय करता है। विज्ञान के बिना आधुनिक जीवन की कल्पना असंभव है। हमारे घरों की बिजली से लेकर डिजिटल नेटवर्क तक, स्वास्थ्य से लेकर पर्यावरण तक, हर क्षेत्र में अब विज्ञान की धड़कन सुनाई देती है।
विज्ञान केवल तकनीक नहीं बल्कि एक सोच, एक दृष्टिकोण है, जो हमें अंधविश्वास से मुक्त कर सत्य की खोज की दिशा में अग्रसर करता है। यही कारण है कि ‘विश्व विज्ञान दिवस’ विज्ञान को केवल प्रयोगशालाओं या शोध संस्थानों तक सीमित रखने के बजाय समाज के प्रत्येक नागरिक तक पहुंचाने की आवश्यकता पर बल देता है। विज्ञान, शांति और विकास का त्रिकोण तभी सशक्त बन सकता है, जब ज्ञान का प्रवाह सीमित वर्ग तक न रहकर जन-जन तक पहुंचे।
संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अगस्त 2023 में घोषित ‘2024-2033: सतत विकास के लिए विज्ञान का अंतर्राष्ट्रीय दशक’ इसी विचार को वैश्विक रूप देता है। यह घोषणा बताती है कि 2030 के सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए विज्ञान को केवल प्रगति का उपकरण नहीं बल्कि मानवता के साझे भविष्य का सेतु बनना होगा। इस दशक का लक्ष्य विज्ञान, नीति और समाज के बीच ऐसी साझेदारी विकसित करना है, जो विश्वास और पारदर्शिता पर आधारित हो।
विश्व विज्ञान दिवस की थीम ‘विश्वास, परिवर्तन और कल’ वास्तव में तीन स्तंभों पर टिकी है। पहला, विश्वास, जो विज्ञान और समाज के बीच की दूरी को मिटा सकता है। आज जब झूठी सूचनाएं, अफवाहें और साजिश सिद्धांत तेजी से फैलते हैं, तब विज्ञान पर लोगों का विश्वास बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है। विज्ञान का लोकतंत्रीकरण तभी संभव है, जब उसकी भाषा जन-सुलभ बने और जनता उसमें अपनी भागीदारी महसूस करे।
दूसरा स्तंभ है परिवर्तन। विज्ञान का स्वभाव ही परिवर्तनशील है। यह स्थिर नहीं, गतिशील है। 2050 तक जिस विज्ञान की आवश्यकता होगी, वह न केवल तकनीकी रूप से अधिक उन्नत होगा बल्कि नैतिक, सामाजिक और पर्यावरणीय दृष्टि से भी उत्तरदायी होना चाहिए। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, जैव प्रौद्योगिकी, नैनोविज्ञान, जलवायु इंजीनियरिंग और अंतरिक्ष विज्ञान जैसी उभरती शाखाएं मानव सभ्यता को नई दिशा देंगी लेकिन इन सबके केंद्र में मानव कल्याण और पृथ्वी की सुरक्षा का भाव होना चाहिए। विज्ञान यदि संवेदनशील नहीं होगा तो उसका विकास विनाश का कारण बन सकता है।
तीसरा स्तंभ है कल यानी भविष्य। आने वाले समय में विज्ञान केवल तकनीकी समाधानों का माध्यम नहीं रहेगा बल्कि यह नीति-निर्माण, शासन और वैश्विक संबंधों के केंद्र में होगा। जलवायु संकट, जैव विविधता का ह्रास, ऊर्जा असमानता और संसाधनों की कमी जैसी चुनौतियां हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि 2050 तक हमारी पृथ्वी कैसी होगी और हम उसे कैसा बनाना चाहते हैं। इसका उत्तर विज्ञान में ही है, ऐसा विज्ञान, जो केवल प्रयोगशालाओं में नहीं, खेतों, कारखानों और कक्षाओं में भी जीवंत हो।
यूनेस्को की महानिदेशक ऑड्रे अजोले का यह कथन ‘विज्ञान शांति स्थापना के लिए आवश्यक है क्योंकि यह समकालीन वैश्विक चुनौतियों के लिए व्यावहारिक और टिकाऊ समाधान प्रस्तुत करता है’ अत्यंत सार्थक है। जब विज्ञान जलवायु संकटों, महामारियों और संसाधनों की कमी के समाधान खोजता है, तब वह केवल समस्याओं को हल नहीं करता बल्कि संघर्षों के मूल कारणों को कम करता है। इस प्रकार विज्ञान शांति का माध्यम भी है और विकास का साधन भी।
विज्ञान को सभी के लिए सुलभ और समावेशी बनाना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। सतत विकास के लिए अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान दशक (2024-2033) इसी दिशा में वैश्विक आंदोलन के रूप में कार्य कर रहा है। यूनेस्को इसके माध्यम से विज्ञान को साझे हित के रूप में देखता है, ऐसा हित, जो सीमाओं, भाषाओं और राजनीतिक मतभेदों से परे है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विज्ञान में महिलाओं, युवाओं और वंचित समुदायों की भागीदारी बढ़े ताकि नवाचार और सहयोग का दायरा व्यापक हो सके।
विश्व विज्ञान दिवस की परिकल्पना 1999 में बुडापेस्ट विश्व विज्ञान सम्मेलन के बाद सामने आई थी। 2001 में यूनेस्को ने इसे औपचारिक रूप से घोषित किया और 10 नवम्बर 2002 को यह दिवस पहली बार मनाया गया। तब से अब तक यह विज्ञान और समाज के बीच पुल बनाने का एक वैश्विक मंच बन चुका है। इस दिवस ने न केवल वैज्ञानिक सहयोग को बढ़ावा दिया है बल्कि संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में विज्ञान के माध्यम से संवाद की संभावनाएं भी खोली हैं। इजराइली-फिलिस्तीनी वैज्ञानिक संगठन जैसी पहल इसका ज्वलंत उदाहरण हैं, जहां विज्ञान शांति की भाषा बन गया। विज्ञान और मानव अधिकारों का संबंध भी गहरा है। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 10 दिसम्बर 1948 को अंगीकृत मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के अनुच्छेद 27 में कहा गया है कि प्रत्येक व्यक्ति को वैज्ञानिक प्रगति और उसके लाभों में भाग लेने का अधिकार है। यह अधिकार केवल विज्ञान तक पहुंच का नहीं बल्कि उसके लाभों को साझा करने का भी है। इस दृष्टि से विज्ञान कोई विलासिता नहीं बल्कि नागरिक अधिकार है।
आज का विज्ञान केवल प्रयोग नहीं बल्कि एक ऐसी नीति है, जो पर्यावरणीय न्याय, सामाजिक समानता और आर्थिक समावेशन की बुनियाद रखती है। उदाहरण के लिए, भविष्य के स्मार्ट फार्म केवल तकनीकी नवाचार नहीं हैं बल्कि खाद्य सुरक्षा, जल संरक्षण और ग्रामीण सशक्तिकरण की दिशा में क्रांतिकारी कदम हैं। इसी प्रकार कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डेटा विज्ञान, शासन और शिक्षा को अधिक पारदर्शी और उत्तरदायी बनाने में मदद कर सकते हैं लेकिन विज्ञान को अपनी पूर्ण क्षमता तक पहुंचाने के लिए आवश्यक है कि समाज उसमें विश्वास रखे। इस विश्वास की नींव पारदर्शिता, नैतिकता और संवाद से ही बनती है। जब वैज्ञानिक अनुसंधान जनता की आवश्यकताओं से जुड़ता है, जब नीतियां तथ्यों पर आधारित होती हैं और जब शिक्षा प्रणाली जिज्ञासा को प्रोत्साहित करती है, तभी विज्ञान वास्तविक अर्थों में शांति और विकास का माध्यम बन पाता है।
2050 का विज्ञान हमें न केवल नई तकनीक देगा बल्कि मानवता की दिशा भी तय करेगा। यह वह विज्ञान होगा, जो सीमाओं से परे सोचता है, जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता को संवेदनशीलता के साथ जोड़ता है, जो विकास को पर्यावरण से संघर्ष नहीं बल्कि सामंजस्य में देखता है। यह वह विज्ञान होगा, जो हर नागरिक को सहभागी बनाएगा, हर बच्चे को वैज्ञानिक दृष्टिकोण सिखाएगा और हर नीति में साक्ष्य का सम्मान स्थापित करेगा।
विज्ञान पर विश्वास केवल वैज्ञानिकों का दायित्व नहीं है बल्कि सम्पूर्ण समाज का उत्तरदायित्व है। परिवर्तन तभी संभव होगा, जब ज्ञान और आस्था में टकराव नहीं, संवाद होगा और कल तभी उज्जवल होगा, जब विज्ञान को हम केवल तकनीक नहीं बल्कि मानवता की साझा चेतना के रूप में स्वीकार करेंगे। आज जब पृथ्वी जलवायु असंतुलन, जैव विविधता के विनाश और बढ़ते संघर्षों के बीच जूझ रही है, तब विज्ञान ही वह ज्योति है, जो अंधकार को चीरकर नई दिशा दिखा सकती है। हमें ऐसे विज्ञान की आवश्यकता है, जो केवल प्रयोगशालाओं में नहीं बल्कि मानव जीवन की धड़कनों में बसता हो, जो तर्क से प्रेरित हो पर संवेदना से संपन्न भी। यही विज्ञान हमारे भविष्य का आधार है, यही विश्वास, परिवर्तन और कल का वास्तविक सेतु है।
(लेखक साढ़े तीन दशक से पत्रकारिता में निरंतर सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार हैं)


