सौ साल की सादगी, सेवा और संघर्ष का सफ़र – समाजवादियों के पितामह जी.जी. पारिख को अंतिम सलाम

मुंबई, 2 अक्‍टूबर। देश ने आज स्वतंत्रता संग्राम के उन अंतिम योद्धाओं में से एक को खो दिया। वरिष्ठ समाजवादी नेता, चिकित्सक, पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी डॉ. गुणवंतराय गणपतलाल राय पारिख, जिन्हें सब प्रेम से जी.जी. पारिख कहते थे, का गुरूवार सुबह मुंबई में 101 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वे लंबे समय तक सक्रिय समाजवादी आंदोलन के सबसे वरिष्ठ जीवित कार्यकर्ता माने जाते थे।

उनका पार्थिव शरीर जनता केंद्र, ताड़देव, मुंबई में दोपहर 1 से 5 बजे तक अंतिम दर्शन के लिए रखा गया, जिसके बाद जे.जे. अस्पताल को सौंपा गया। बड़ी संख्या में सामाजिक कार्यकर्ताओं, छात्र-युवाओं, समाजवादी संगठनों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी हैं।

18 बरस की उम्र में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ से शुरुआत

30 दिसंबर 1924 को जन्मे डॉ. जी.जी. पारिख का बचपन और युवावस्था उस दौर में गुज़री जब देश आज़ादी की लड़ाई से गुजर रहा था। महज़ 18 साल की उम्र में उन्होंने 9 अगस्त 1942 को मुंबई के ऐतिहासिक गवालिया टैंक मैदान (अब क्रांति मैदान) में हुए भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लिया। उस समय हजारों लोगों के साथ वे गिरफ्तार हुए और करीब 10 महीने जेल में रहे।

यह उनका पहला जेल-यात्रा अनुभव था, लेकिन इसके बाद स्वतंत्रता और समाजवाद की लड़ाई में जेल जाना मानो उनके जीवन का स्थायी हिस्सा बन गया। आपातकाल (1975-77) में भी उन्हें 20 महीने तक जेल में रहना पड़ा।

जी जी समाजवादी आंदोलन की उस पीढी से थे जिसने आजादी  की लड़ाई में बहादुरी की  मिसाल कायम की. मुंबई में तो एक बड़ी फौज ही थी. अशोक मेहता, युसूफ मेहरअली, केशव गोरे,  मृणाल गोरे, मधु लिमये, मधु दंडवते. एक लंबी सूची है. जीजी समाजवादी आंदोलन के इस  गौरवशाली इतिहास के हिस्सा थे.

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गांधी, लोहिया और जयप्रकाश के साथ कंधे से कंधा

डॉ. पारिख पर महात्मा गांधी के विचारों का गहरा असर रहा। उन्होंने न सिर्फ गांधी का दर्शन आत्मसात किया, बल्कि समाजवादी आंदोलन के दिग्गज नेताओं डॉ. राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण और युसुफ मेहर अली के साथ भी काम किया।

वे अक्सर कहा करते थे कि “गांधी का स्वदेशी और ग्राम स्वराज सिर्फ़ आज़ादी की लड़ाई का नारा नहीं था, बल्कि आज भी सामाजिक और आर्थिक न्याय का सबसे व्यावहारिक मार्ग है।”

पेशे से चिकित्सक, स्वभाव से समाजसेवी

चिकित्सक होने के बावजूद डॉ. पारिख ने कभी अपनी पेशेवर जिम्मेदारियों को सामाजिक कार्यों से अलग नहीं किया। मुंबई के ग्रांट रोड स्थित उनके दवाखाने में गरीब और वंचित मरीजों को मुफ्त या बेहद कम शुल्क पर इलाज मिलता था। उनका मानना था कि “डॉक्टर का धर्म मरीज़ की जेब नहीं, बल्कि उसके स्वास्थ्य को देखना है।”

वे उन पुराने ज़माने के डॉक्टरों में थे जो मरीज की पूरी परिस्थिति समझते थे और दवा के साथ उम्मीद और भरोसा भी देते थे।

जनता’ साप्ताहिक के संपादक और वैचारिक ध्वजवाहक

1946 से लेकर अपने अंतिम दिनों तक डॉ. पारिख साप्ताहिक ‘जनता’ का प्रकाशन और संपादन करते रहे। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने इस पत्रिका को समाजवादी विचारधारा का मंच बनाए रखा। बाद के वर्षों में जब संसाधनों की कमी हुई, तो वे इसे ई-पत्रिका के रूप में निकालते रहे। उनके करीबी बताते हैं कि “जनता सिर्फ़ अख़बार नहीं, बल्कि विचारों का आंदोलन था।”

युसुफ मेहर अली सेंटर और रचनात्मक प्रकल्प

वे कई जनांदोलनों और रचनात्मक प्रकल्पों से जुड़े थे l युवा बिरादरी के संचालन,  इसके साथ ही कई समाजवादी संगठनों के संस्थाओं के संरक्षक एवं मार्गदर्शक रहे थे । स्वतंत्रता संग्राम सेनानी युसुफ मेहर अली से गहराई से प्रभावित डॉ. पारिख ने मुंबई से करीब 100 किलोमीटर दूर रायगढ़ ज़िले के तारा गाँव में युसुफ मेहर अली सेंटर की स्थापना की। यहाँ उन्होंने ग्रामीण विकास, स्वदेशी, खादी, हस्तशिल्प और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने का काम किया। उनकी दृष्टि थी कि “ग्राम स्वराज सिर्फ़ एक नारा नहीं, बल्कि रोज़गार, शिक्षा और आत्मनिर्भरता का आधार होना चाहिए।”

इसके अलावा वे युवा बिरादरी सहित अनेक सामाजिक संगठनों और जनांदोलनों से सक्रिय रूप से जुड़े रहे।

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जनांदोलनों में सतत भागीदारी

जीवन के अंतिम वर्षों तक भी डॉ. पारिख आंदोलनों और कार्यक्रमों में सक्रिय रूप से भाग लेते रहे। 2024 के रक्षाबंधन पर मेधा पाटकर स्वयं मुंबई पहुँचीं और उन्हें राखी बाँधी। यह तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हुई और सबने उनकी जीवटता और सक्रियता की सराहना की।

गुजरात के कच्छ से गहरे जुड़े होने के कारण उन्होंने 2001 के भूकंप के बाद राहत और पुनर्वास कार्यों में पूरी ताकत से हिस्सा लिया।

श्रद्धांजलियाँ

डॉ. पारिख के निधन पर पूरे देश से श्रद्धांजलियों का तांता लगा। सामाजिक संस्‍थाओं, राजनीतिक दलों, व्‍यक्तियों ने श्री पारिख के निधन पर शोक संवेदनाएं व्‍यक्‍त की है। राष्‍ट्रवादी कांग्रेस की सुश्री सुप्रिया सुले, पत्रकार राजनीतिक विश्‍लेषण प्रकाश पाटिल, राज्‍यसभा के उपसभापति हरिवंश, पूर्व सांसद अबु आसिम अजमी, योगेंद्र यादव सहित अनेक जाने माने प्रबुध्‍दजनों ने श्रद्धासुमन अर्पित किये है।

नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेत्री मेधा पाटकर ने कहा कि “जीजी समाजवादियों के पितामह थे। उनका जीवन हमें हमेशा संघर्ष और सादगी का मार्ग दिखाता रहेगा।” समाजवादी नेता डॉ. सुनीलम ने कहा कि “वे स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं, हमारे प्रेरणा स्रोत थे। 101 साल का संघर्ष और निर्माण का जीवन पीछे छोड़कर चले गए।” जनांदोलनो के राष्‍ट्रीय समूह (NAPM) ने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि  “लोकतांत्रिक समाजवादी आंदोलन के एक युग का अंत हो गया। उनका मार्गदर्शन हमेशा याद रहेगा।”

सप्रेस की ओर से कुमार सिद्धार्थ ने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि जी जी समाजवादियों के पितामह थे, वे समाज और देश के धरोहर थे। जिनका देश के सामाजिक संगठनों, संस्थाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओ से सीधा लगाव था। वे अपने जीवन के अंतिम समय तक आंदोलनों व कार्यक्रमों में शामिल होकर गति प्रदान करते रहे । इसके अलावा मध्य प्रदेश समाजवादी समागम, किसान संघर्ष समिति, समाजवादी पार्टी मध्य प्रदेश और सभी सहमना संगठनों की ओर से रामस्वरूप मंत्री, दिनेश सिंह कुशवाह, अनिल सिन्‍हा आदि ने विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की है।

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क्यों महत्वपूर्ण है उनकी विरासत?

डॉ. पारिख की सबसे बड़ी विशेषता थी कि वे राजनीति में रहते हुए भी दलगत समझौते और अवसरवाद से दूर रहे। समाजवादी आंदोलन की गिरती ताक़त के बीच भी वे एक स्थायी स्तंभ की तरह खड़े रहे।

उनका जीवन यह बताता है कि राजनीति और समाज सेवा को कैसे जोड़ा जा सकता है। वे कहते थे, “सत्ता में आए बिना भी जनता के बीच रहकर काम किया जा सकता है, यही असली राजनीति है।”

अंतिम सलाम

101 साल का यह सफर केवल किसी एक व्यक्ति की गाथा नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, समाजवादी संघर्ष और जनसेवा का जीवंत इतिहास है। डॉ. जी.जी. पारिख का मुस्कुराता चेहरा, उनका सादगीभरा व्यक्तित्व और अडिग समाजवादी सोच आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा। सचमुच, लोकतंत्र और समाजवाद की लड़ाई में उनका नाम सदैव आदर के साथ लिया जाएगा।

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