Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

हिमाचल : खतरे में जीवन

कुलभूषण उपमन्यु

हिमालय में जारी विनाश की वजह क्या सिर्फ भगवानजी की बरसाई जा रही आपदा या ‘जलवायु – परिवर्तन’ भर है? क्या इसमें हम इंसानों की भी कोई भागीदारी है? जैसे ऊर्जा, बाढ़-नियंत्रण और सिंचाई के कथित लाभों के लिए इफरात में ताने जा रहे बड़े बांधों से पैदा होती मीथेन गैस और उससे बढ़ता तापक्रम बादल फटने की वजह बनते हैं। या अपने ‘इहलोक’ और ‘परलोक’ संवारने के लिए बढ़ता अंतहीन पर्यटन मौसम को गर्म करता है और नतीजे में भारी-से-भारी बरसात होती है। क्या है, इन सबकी भूमिका?

विकास सूचकांक में आगे हिमाचल प्रदेश गत वर्षों में लगातार प्राकृतिक आपदाओं से घिरता जा रहा है। बादल फटने की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। जहां 2018 में बादल फटने की 21 घटनाएं हुईं, वहीं 2019 में 16, ‘20 में 3, ‘21 में 30, ‘22 में 39, ‘23 में 65 और 2024 में 57 घटनाएं हुईं। अभी बरसात के आरंभिक चरण में ही 14 से ज्यादा जगह बादल फटा है और 69 लोग अकाल मृत्यु का ग्रास बन चुके हैं। अभी असली बरसात तो शेष है। आगे क्या होगा, यह सोचकर ही दिल दहल जाता है।

क्या कारण है कि प्रकृति हिमाचल प्रदेश पर इतनी नाराज है, जबकि उत्तराखंड का हाल भी अच्छा नहीं है। इसका अर्थ हुआ कि हिमालय में सब जगह ही प्रकृति क्रुद्ध हो चुकी है। बादल फटने की घटना का अर्थ है – एक छोटे 20-30 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में बादलों का सघन होकर एक घंटे में 10 सेंटीमीटर से ज्यादा बारिश हो जाना। मंडी में दुर्घटना वाले दिन 21 सेंटीमीटर से ज्यादा बारिश रिकॉर्ड हुई है। इससे भीषण बाढ़ और भूस्खलन की स्थितियां बन गईं। जाहिर है, ये घटनाएं वैश्विक तापमान वृद्धि के कारण हो रही हैं। चिंता की बात यह है कि हिमालय में औसत से ज्यादा तापमान वृद्धि हुई है। इसी कारण लगातार हिमाचल प्रदेश में बादल फटने की घटनाएं साल-दर-साल बढती जा रही हैं।  

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हिमाचल प्रदेश में ढांचागत विकास और बड़ी परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर वनभूमियों का भूमि उपयोग बदला गया है, वन-संपदा घटी है और तोड़-फोड़ बढ़ी है। इसके चलते हिमालय की नाजुक धरती भारी बारिश का दबाव न झेल सकने के कारण भूस्खलन का शिकार हो रही है और अभूतपूर्व तबाही का कारण बन रही है। चीन और अमेरिका के बाद भारत तीसरा सबसे बड़ा वायु-प्रदूषणकर्ता देश बन गया है जिसके ‘ग्रीन-हाउस’ प्रभाव के कारण तापमान में वृद्धि हो रही है। हिमालय में औसत से ज्यादा तापमान-वृद्धि पर्यटन और अन्य कारणों से बढ़ती परिवहन की भीड़ के कारण पैदा हुए प्रदूषण से हो रही है। पहाड़ों की संकरी घाटियों में प्रदूषित वायु अटक जाती है और शायद यह भी तापमान बढ़ने का कारक हो सकता है।  

हिमाचल प्रदेश के बांधों में बहकर आने वाला मलबा अपने साथ जैविक पदार्थ भी लाता है, जो झीलों के तल में बैठ जाते हैं। ये जैविक पदार्थ जब बिना आक्सीजन के सड़ते हैं तो मीथेन गैस पैदा होती है। मीथेन कार्बन डाई-आक्साइड की तुलना में 28 से 64  गुना ज्यादा ‘ग्रीन हॉउस’ प्रभाव पैदा करती है। यह भी औसत से ज्यादा तापमान वृद्धि का कारण हो सकता है। इस मुद्दे को गहन वैज्ञानिक शोध की जरूरत है।

अमेरिकी लेखक पीटर ब्रेविट ने अपनी पुस्तक ‘सेम रिवर ट्विस’ में बांध की झीलों से जैविक पदार्थों के आक्सीजन-रहित अपघटन से मीथेन गैस पैदा होने की पुष्टि की है। इसके चलते ही अमेरिका में वर्जीनिया की रेपानहौक नदी पर अम्ब्रे बांध को हटाया गया था और नतीजे में मीथेन उत्सर्जन में कमी दर्ज की गई थी। ‘नासा’ के मैथ्यू जॉनसन की 2021 की शोध के अनुसार विश्व में 3 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र बांधों की झीलों के नीचे है जिसमें 10.1 टेराग्राम (10 अरब 10 लाख किलो) मीथेन हर वर्ष पैदा होती है। हालांकि पुराने अनुमान के अनुसार यह मात्रा 70 टेराग्राम मानी गई है।

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फोरलेन सडकों के कारण होने वाली तोड़फोड़ और बढ़ती सड़क कनेक्टिविटी के कारण होने वाले निर्माण कार्यों में पर्वतों की विशिष्ट तकनीक का अभाव है। खासकर ठेकेदारी प्रथा के चलते डंपिंग कार्य में भारी कोताही बरती जा रही है। बांध प्रबन्धन में भी लापरवाही देखने में आई है। कहीं बाढ़ के समय बांध के गेट ही नहीं खुलते हैं और कहीं बाढ़-नियंत्रण के लिए बांध में समय रहते, बाढ़ के पानी को रोकने योग्य जगह ही (समय पर पानी छोड़कर) खाली नहीं की जाती। इससे बाढ़ का पानी रोका नहीं जा सकता और तत्काल अचानक छोड़ना पड़ता है, जिससे सामान्य से ज्यादा बाढ़ आ जाती है।

इन सब लापरवाहियों के चलते हिमाचल प्रदेश का जीवन खतरे में घिरता जा रहा है, जिसका प्रभाव पर्यटन पर भी बुरा पड़ेगा। पर्यटन विकास के लिए ठंडा मौसम, सुंदर पर्वतीय वृक्ष, वनस्पतियों से भरी ढलानें और पर्याप्त बर्फ जरूरी तत्व हैं। बाकी आवास अदि सुविधाएँ तो बाद में आती हैं। पर्यटन का बुनियादी आकर्षण ही समाप्त हो जाएगा तो पंचतारा सुविधाएँ भी पर्यटन को बचा नहीं पाएंगी। कुछ तथ्यपूर्ण मान्यताएं हैं जिनको मानकर ही पर्वत पर विशिष्ट विकास योजनाएं बनाई जा सकती हैं जो प्रकृति मित्र और टिकाऊ विकास लाने वाली हों। 

हिमालय पूरे देश के लिए सदानीरा नदियां देने वाला और जलवायु निर्धारित करने वाला क्षेत्र है। वह नाजुक, अगम्य और हाशिए पर है। इसके वनों और हिमनदों की रक्षा करना देशहित का कार्य है। हिमाचल प्रदेश में पर्यटन जैसे पर्यावरण मित्र विकास को टिकाऊ बनाने के लिए सारे विकास मॉडल को पर्यावरण मित्र बनाना पड़ेगा। तोड़फोड़ वाले विकास के विकल्प तलाशने होंगे।  वाहन प्रदूषण नियंत्रित करने के लिए सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था में सुधार करना होगा। इलेक्ट्रिक वाहन, हाइड्रोजन वाहन और ‘रज्जू मार्गों’ (रोप-वे) को मुख्यधारा परिवहन व्यवस्था का भाग बनाना होगा।

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बड़ी जलविद्युत परियोजनाएं उपयुक्त नहीं हैं, उनके विकल्प ढूँढने होंगे। झीलों से मीथेन पैदा होती है। हिमालय में ‘स्माल इस ब्यूटीफुल’ के सिद्धांत पर विकास करना होगा। हिमालय की राष्ट्रीय स्तर पर दी जाने वाली पर्यावरणीय सेवाओं को मान्यता देते हुए ये सेवाएं सतत देते रहने की शक्ति को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर योजना निर्माण और क्रियान्वयन की जिम्मेदारी लेनी होगी। इस दिशा में सोचकर योजना निर्माण होगा, तभी हिमाचल प्रदेश और हिमालयी राज्यों में पर्यावरण मित्र विकास का युग आरंभ हो सकेगा, हिमालय में रहने वाले लोगों का जीवन भी सुरक्षित हो सकेगा और देश के लिए जीवनदायी हवा, पानी और मिटटी के निर्माण और संरक्षण की हिमालयी व्यवस्थाएं बची रहेंगी। (सप्रेस)

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