धरती के दिग्गज का संकट : हाथियों की घटती दुनिया

योगेश कुमार गोयल

धरती के सबसे बड़े जमीनी जीव हाथी, जो बुद्धिमान और सामाजिक स्वभाव के लिए जाने जाते हैं, आज अस्तित्व के संकट में हैं। आवास विनाश, मानव-हाथी संघर्ष, अवैध शिकार और कैद में दुर्व्यवहार ने उनकी संख्या को तेजी से घटाया है। भारत सहित एशिया और अफ्रीका में यह स्थिति गंभीर है, जहां संरक्षण उपायों में देरी उनका भविष्य अंधकारमय बना सकती है।

World Elephant Day : 12 August

हाथी धरती पर सबसे बड़े जमीनी जानवर हैं, जो झुंड में रहने वाले बुद्धिमान सामाजिक प्राणी हैं। दुनियाभर की विभिन्न संस्कृतियों में हाथी को प्यार, सम्मान और आदर दिया जाता रहा है लेकिन फिर भी यह चिंता का बड़ा कारण है कि दो विशाल महाद्वीपों एशिया तथा अफ्रीका में धरती का यह शानदार प्राणी अंतिम दर्शन के कगार पर हैं।

कुछ अनुमानों के अनुसार पिछले एक दशक में ही हाथियों की संख्या में करीब 62 प्रतिशत की गिरावट आई है और हाथियों के संरक्षण के लिए यदि तत्काल सुरक्षात्मक उपाय नहीं किए गए तो अगले दशक के अंत तक अधिकांश हाथी समाप्त हो सकते हैं। इसीलिए एशियाई और अफ्रीकी हाथियों की गंभीर दुर्दशा की ओर पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित करने के लिए प्रतिवर्ष एक विशेष थीम के साथ 12 अगस्त को ‘विश्व हाथी दिवस’ मनाया जाता है।

हाथियों के प्राकृतिक आवास खत्म होते जाने से हाथियों के साथ मानव संघर्ष लगातार बढ़ रहा है। इसी संघर्ष के फलस्वरूप हाथियों को पकड़ लिया जाता है या मार दिया जाता है। पकड़े गए ऐसे ही कुछ हाथियों को चिड़ियाघरों तथा सर्कसों में भेज दिया जाता है, जहां वे जीवनभर करतब दिखाने में ही बिता देते हैं।

कृषि और बुनियादी ढ़ांचे के विकास के लिए हम हाथियों के पारंपरिक आवासों पर लगातार अतिक्रमण कर रहे हैं और मानवजनित दबाव के कारण हाथियों को उनके आवासों से बाहर खदेड़ा जा रहा है। हाथियों के चरने के क्षेत्र में पशुओं के चरने और औद्योगिक विकास का दबाव निरंतर बढ़ रहा है, जिससे हाथियों के लिए उपलब्ध भोजन की मात्रा प्रभावित हो रही है और भूख से व्याकुल घबराए हुए हाथियों द्वारा आसपास के लोगों पर हमला किए जाने की संभावनाएं बढ़ रही हैं।

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विशालकाय जंगलों में घूमने वाले हाथियों के पास अलग-थलग पड़ी जमीन के छोटे-छोटे हिस्से ही रह जाने के कारण जब जंगलों को कब्जाकर बनी बस्तियों में हाथियों का आक्रमण होता है तो वहां भूखे हाथी एक ही रात में पूरे एक साल की फसल नष्ट कर देते हैं। ऐसी परिस्थितियों में आजीविका के लिए फसलों पर ही निर्भर रहने वाले समुदायों में आक्रोश पनपता है, जिसकी परिणति मानव और हाथी संघर्ष के रूप में होती है। इस संघर्ष में दोनों या तो घायल होते हैं या मारे जाते हैं।

विभिन्न शोधों से यह स्पष्ट हो चुका है कि मानव बस्तियां और इसके परिणामस्वरूप उत्पन्न जैविक दबाव तथा सड़कें, रेलवे लाइन, नहरें और गलियारे वाले क्षेत्रों में अतिक्रमण इत्यादि रैखिक अवसंरचनाएं मानव बस्तियों में हाथियों के प्रवेश के प्रमुख कारण हैं। सड़कें, रेलवे लाइन, पाइपलाइन, कारखाने और मानव बस्तियां वन्यजीवों की आवाजाही में बाधा बन रही हैं, जिससे उनके प्राकृतिक आवास छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित हो रहे हैं।


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वन्यजीवों के अलग-थलग आवास के इन द्वीपों को जोड़ने के लिए गलियारों के बिना, झुंडों को भोजन और पानी तक पहुंचने में परेशानी होती है और वे अपने हमवतन लोगों से भी अलग हो जाते हैं, जिससे उनके सामाजिककरण और प्रजनन के अवसर भी कम हो रहे हैं।

वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार एशिया और अफ्रीका में यह सब हाथियों के अस्तित्व के लिए ठीक नहीं है। एशियाई हाथियों की वैश्विक आबादी का 60 प्रतिशत से अधिक भारत में है। वर्तमान में देश के 14 राज्यों में 65 हजार वर्ग किलोमीटर में हाथियों के लिए 30 वन क्षेत्र सुरक्षित हैं लेकिन भारत में भी अब एक ओर जहां हर साल 100 से भी ज्यादा हाथी मानव-हाथी संघर्ष के कारण जान से मार दिए जाते हैं, वहीं प्रतिदिन औसतन एक व्यक्ति भी इस संघर्ष में मारा जाता है। पिछले छह वर्षों में मानव-हाथी संघर्ष के कारण हुई कुल मौतों में से 48 प्रतिशत ओडिशा, पश्चिम बंगाल तथा झारखंड में हुई जबकि इन तीन राज्यों और असम, छत्तीसगढ़ तथा तमिलनाडु सहित कुल छह राज्यों में यह संख्या कुल मौतों का 85 प्रतिशत है।

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हाथियों की संख्या में गिरावट के प्रमुख कारणों में आवास की क्षति के अलावा मानव-हाथी संघर्ष, उनके साथ कैद में दुर्व्यवहार और अवैध शिकार शामिल हैं। एक अनुमान के अनुसार हाथी दांत, मांस और शरीर के अंगों की तलाश में शिकारियों द्वारा प्रतिदिन करीब सौ अफ्रीकी हाथियों को मार दिया जाता है। चीन में हाथी दांत की कीमतें कई गुना बढ़ जाने के कारण हाथियों का अवैध शिकार आसमान छूने लगा।

एशिया में ही हाथी दांत के लिए हजारों अफ्रीकी हाथियों को मार डाला जाता है। हाथी दांत के लिए अवैध शिकार और चिड़ियाघरों तथा सर्कसों सहित बंदी वन्यजीव उद्योग के लिए जंगली जानवरों को पकड़ने के कारण अफ्रीकी और एशियाई हाथियों को जंगल में खतरा है। जंगली हाथियों का सीमा पार व्यापार भी होता है। भारत से नेपाल में जीवित हाथियों की तस्करी के कुछ मामले सामने भी आ चुके हैं।

हालांकि भारत में एशियाई हाथी को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत अनुसूची 1 के जानवर के रूप में संरक्षित किया गया है और जंगल में उनकी स्थिति को मजबूत करने तथा अवैध शिकार को रोकने के लिए सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से 2010 में उन्हें ‘भारत का राष्ट्रीय विरासत पशु’ भी नामित किया जा चुका है।

थाईलैंड, भारत, लाओस, कंबोडिया, नेपाल, श्रीलंका, मलेशिया इत्यादि कई देशों में एक दशक तक किए गए एक अध्ययन के अनुसार पूरे एशिया में इस समय पर्यटकों के मनोरंजन के लिए 357 शिविरों में 3800 से भी ज्यादा हाथी बंदी हैं। इनमें से करीब 2400 हाथी गंभीर रूप से भयावह परिस्थितियों में पीड़ित हैं, जिनमें से केवल 279 हाथियों को ही उच्च कल्याण स्थलों पर रखा गया है।

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अध्ययन के मुताबिक बंदी हाथियों के साथ प्रायः काफी दुर्व्यवहार किया जाता है, जिनमें से अधिकांश पैर की समस्याओं और आंखों की बीमारियों से पीड़ित हैं। भारत के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अनुसार देश में करीब 27 हजार जंगली हाथी हैं, जिनमें से 2675 बंदी हाथी हैं। कथित तौर पर इनमें से 1821 हाथी निजी हिरासत में हैं जबकि बाकी विभिन्न राज्यों के वन विभाग की देखरेख में हैं। निजी हिरासत में बंदी हाथियों का स्वामित्व कुछ मंदिरों और प्रभावशाली व्यक्तियों के पास है, जो हाथियों को ‘स्टेटस सिंबल’ के रूप में रखते हैं।

वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि करीबी पर्यटक संपर्क के लिए उपयोग किए जाने वाले सभी हाथियों को दर्दनाक प्रशिक्षण पद्धति से गुजरना पड़ता है, जिसमें युवा हाथी के बच्चों को उनकी मां से अलग करना, उन्हें अलग-थलग रखना, उन्हें भोजन-पानी से वंचित करना तथा जब तक वे टूट न जाएं और उन्हें डर से नियंत्रित नहीं किया जा सके, इसके लिए उन्हें बार-बार पीटना शामिल हैं।

वन्यजीव विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है अफ्रीकी तथा एशियाई हाथी मानव कैद में रहने के लिए उपयुक्त नहीं हैं और इनमें से बड़ी संख्या में मानव हिरासत में युवावस्था में ही मर जाते हैं। बहरहाल, विशेषज्ञों के मुताबिक मानव-हाथी संघर्ष को कम करने और संघर्षरत हाथियों को पकड़ने से रोकने में वन्यजीव गलियारों का निर्माण एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

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