वाराणसी, 10 अगस्त। साझा संस्कृति मंच वाराणसी के बैनर तले आज कैंटोनमेंट नदेसर चौराहे से लेकर अम्बेडकर मूर्ति, कचहरी तक एक शांति मार्च निकाला गया। हाथों में मोमबत्तियाँ, गले में तख्तियाँ और चेहरों पर गंभीर संकल्प—इस मार्च का उद्देश्य भारत में अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ते दमन के विरोध में आवाज़ उठाना और फिलिस्तीन के संघर्ष के प्रति एकजुटता प्रदर्शित करना था।
मार्च में शामिल सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि हाल के वर्षों में भारत में अल्पसंख्यक समुदायों, विशेषकर मुस्लिम और ईसाई नागरिकों पर हिंसा और उत्पीड़न की घटनाएँ चिंताजनक गति से बढ़ी हैं। आंकड़ों के मुताबिक जून 2024 से जून 2025 के बीच देश में 2,600 से अधिक हेट-क्राइम या घृणास्पद भाषण दर्ज किए गए, जिनमें से लगभग 79.9% घटनाएँ भाजपा-शासित राज्यों में हुईं। ईसाई-विरोधी हिंसा के मामलों में भी तेज़ी आई है—2023 में जहाँ 601 घटनाएँ दर्ज हुईं, वहीं 2024 में यह बढ़कर 840 तक पहुँच गईं।
साल 2024 में देशभर में 63 लोगों की एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल हत्याएँ हुईं। केवल उत्तर प्रदेश में 56 से अधिक मुस्लिमों के “हाफ एनकाउंटर” हुए, जिनमें वे आंशिक या पूर्ण रूप से अपंग हो गए। मार्च 2025 में नागपुर में औरंगजेब की समाधि विवाद के बाद भड़की हिंसा में एक व्यक्ति की मौत और 30 से अधिक लोग घायल हुए। मणिपुर की स्थिति और भी भयावह रही—यहाँ 258 लोग मारे गए, 60,000 से अधिक लोग विस्थापित हुए और 400 से अधिक चर्च एवं 132 मंदिर क्षतिग्रस्त या ध्वस्त कर दिए गए।
इसी के समानांतर, फिलिस्तीन विशेषकर गाज़ा में मानवीय संकट भी अपने चरम पर है। अब तक 60,000 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं, और हाल के जुलाई महीने में 89 बच्चों की मौत भूख के कारण हुई। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, लगभग पाँच लाख लोग भुखमरी के कगार पर हैं। इस बर्बर हिंसा और मानवाधिकार उल्लंघन के बीच, साझा संस्कृति मंच के कार्यकर्ताओं ने वाराणसी में एकत्र होकर अपनी एकजुटता दर्ज की।
अम्बेडकर मूर्ति कचहरी पर पहुँचकर प्रतिभागियों ने मोमबत्ती जलाकर मार्च का समापन किया और सरकार से हस्तक्षेप की मांग की गयी — पहली, अल्पसंख्यकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करने हेतु केंद्रीय और राज्य सरकारों द्वारा ठोस कदम उठाए जाएँ। दूसरी, भारत सरकार फिलिस्तीन के संदर्भ में अपनी पारंपरिक ‘दो-राष्ट्र समाधान’ नीति और मानवीय दृष्टिकोण को स्पष्ट रूप से सामने रखे और प्रभावित नागरिकों को आवश्यक सहायता मुहैया कराए। तीसरी, राष्ट्र फिलिस्तीन में भूख से मर रहे और बर्बर दमन झेल रहे नागरिकों के प्रति एकजुटता प्रदर्शन के आयोजनों के लिए संवैधानिक सुरक्षा एवं अनुमति सुनिश्चित करने की व्यवस्था की जाए। और चौथी, सांप्रदायिक सद्भाव को बनाए रखते हुए, मानवाधिकारों की रक्षा के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच समितियों की स्थापना की जाए।
मार्च के अंत में उपस्थित नागरिकों ने एक संकल्प दोहराया““हम भारत में बहुसांस्कृतिकता और धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों को बचाने के लिए खड़े हैं। फिलिस्तीन में हो रहे मानवाधिकारों के उल्लंघन को रोकने के लिए हमारा समर्थन मानवता के आधार पर है। हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि भारत में अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ते प्रयासों को गंभीरता से लिया जाए। शांति, न्याय और आजादी के लिए यह हमारा शांतिपूर्ण आग्रह है।”
इस आयोजन में वाराणसी के कई जाने-माने सामाजिक और राजनीतिक चेहरे मौजूद थे, जिनमें नंदलाल मास्टर, नीति भाई, फ़ा0 जयंत, जागृति राही, प्रो महेश विक्रम सिंह, वल्लभाचार्य पांडेय, प्रेम नट, धनञ्जय, ऐड अब्दुल्लाह, सरफ़राज़, उर्फी , महेश चंद्र महेश्वरी, ऐड अबु हाशिम, इन्दु पांडेय, मो0 मूसा आज़मी, हिफाजत हुसैन आलम, सिस्टर जोशलिना, नीति , अमीनुद्दीन भाई, विद्याधर, प्रमोद , सिस्टर नतालिया, सिस्टर फ़्लोरिन, सिस्टर फ्रॉनसिस्का, अम्मीनुदिन प्रमुख थे।


