दिल्ली में लैंडफिल गैसें बन रही हैं मुसीबत

प्रमोद भार्गव

दिल्ली और एनसीआर में फैले लैंडफिल ठिकाने सिर्फ कचरे के ढेर नहीं, बल्कि हवा और पानी को ज़हर बना देने वाले खतरनाक गैस कारखाने हैं। यहां से निकलने वाली मीथेन और अन्य जहरीली गैसें वायु प्रदूषण, स्वास्थ्य संकट और आग की घटनाओं को जन्म दे रही हैं, जबकि इनके वैज्ञानिक निस्तारण के प्रयास अब तक नतीजाहीन रहे हैं।

दिल्ली की आबोहवा खराब करने में कचरों के ऐसे ठिकाने  खतरनाक साबित हो रहे हैं, जिनसे लैंडफिल गैसें हवा और जल स्रोतों को एक साथ प्रदूषित करते हैं। दिल्ली समेत समूचे राजनीति क्षेत्र में अनेक लैंडफिल landfill ठिकाने हैं। इसलिए इस पूरे क्षेत्र में कचरे के इन ढेरों से फूटती लैंडफिल नामक शैतानी गैसों से एक बड़ी आबादी का जीना कठिन हो गया है। इन ठिकानों को हटाने और कचरे का वैज्ञानिक ढंग से निस्तारण करने के लिए विभिंन्न संस्थाएं राष्‍ट्रीय हरित प्राधिकरण और सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा चुकी हैं, लेकिन अब तक नतीजा ढांक के तीन पांत ही रहा है।

अब मौसम विभाग की तर्ज पर लैंडफिल ठिकानों पर ‘अर्ली वार्निंग सिस्टम‘जैसी व्यवस्था होगी। इस कचरे से उत्सर्जित होने वाली तीव्र ज्वलनशील मीथेन गैस methane emission को चिन्हित करने वाले डिटेक्टर भी लगाए जाएंगे। इन ठिकानों के तापमान पर भी निगरानी रखने के लिए ‘नान कांटेक्ट इंफ्रारेड थर्मामीटर‘लगाए जाएंगे। वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीक्यूएम) ने इन साइटों पर आग लगने की घटनाओं को थामने और इससे होने वाले प्रदूषण की रोकथाम के लिए 8 सूत्रीय निर्देश भी जारी किए हैं। इन निर्देशों का पालन दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश एवं राजस्थान सरकार को एनसीआर नगरों की सभी लैंडफिल साइटों पर इन निर्देशों का पालन करना होगा।    

दिल्ली में गाजीपुर, भलस्वा तथा ओखला में लैंडफिल ठिकाने हैं। इनमें रोजाना हजारों टन कचरा डाला जाता है। इसके वैज्ञानिक ढंग से निस्तारण के कोई तकनीकी इंतजाम नहीं हैं। एनजीटी ने एक समिति का गठन कर उससे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के कचरे से बिजली पैदा करने की संभावना तलाशने को कहा था, लेकिन दिल्ली सरकार, दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड किसी परिणाम तक नही पहुंच पाए। इन ढेरों में अचानक आग भी लग जाती है, इस कारण समूचे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु प्रदूषण जानलेवा साबित होने लगता है। पर्यावरणीय मामलों के प्रमुख वकील गौरव बंसल का कहना है कि ये लैंडफिल कचरों के ठिकाने नहीं हैं। क्योंकि ऐसे ठिकानों के लिए विशेष डिजाइन और कायदे-कानून का प्रावधान है। कचरा डालने से पहले इन मैदानों में मिट्टी, प्लास्टिक, जैव और जैव-चिकित्सा जैसे कचरे को अलग किया जाता है। जबकि इन ठिकानों पर ऐसा कुछ भी नहीं होता है। इसलिए ये ठिकाने वेस्ट डंपिंग ग्राउंड बनकर रह गए हैं।

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दरअसल मीथेन गैस अत्यधिक ज्वलनशील गैस है। अन्य स्रोतों के अलावा लैंडफिल ठिकाने पर जमा जैविक कचरे के विघटित होने से मीथेन गैस का उत्सर्जन होता है। इस गैस में रंग और गंद नहीं होते है। इस कारण इसके रिसाव का पता नहीं चलता है। माना जाता है कि हवा में 5 से 15 प्रतिशत की सांद्रता से भी आग लग सकती है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पूर्व अपर निदेशक डॉ एसके त्यागी का कहना है कि मीथेन ग्रीन हाउस गैस है। उपग्रह से इसकी निकली छवि को देखा जा सकता है। इसे ट्रेप कर इसका उपयोग करने पर काम होना चाहिए। लेकिन सबसे ज्यादा जरूरी है कि महानागरों में इस तरह के बड़े कचरे के ढेरों को एकत्रित करने से रोका जाए। इसके लिए कचरे को अलगाने, उसे रिसाइकल करने एवं उससे खाद एवं ईंधन तैयार करने पर विचार होना चाहिए।

दरअसल लैंडफिल गैसें उन स्थलों से उत्सर्जित होती हैं, जहां गड्ढों में शहरी कचरा भर दिया गया हो। इस कचरे में औद्योगिक कचरा भी शामिल हो तो इसमें प्रदूषण की भयानकता और बढ़ जाती है। नए शोधों से पता चला है कि नियम-कानूनों को ताक पर रखकर लापरवाही से तैयार किए भूखंडों पर खड़ी इमारतों में चल रहे सूचना तकनीक के कारोबार में प्रयुक्त चांदी, तांबा और पीतल के कल-पूर्जों की सेहत लैंडफिल गैसों के संपर्क में आकर बिगड़ जाती है। इनका हमला निर्जीव यांत्रिक उपकरणों पर ही नहीं मानव स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल असर डालता है।

हमारे देश की महानगर पालिकाएं और भवन-निर्माता गड्ढों वाली भूमि के समतलीकरण का बड़ा आसान उपाय इस कचरे से खोज लेते हैं। रोजाना घरों से निकलने वाले कचरे और इलेक्ट्रॉनिक कचरे से गड्ढों को पाटने का काम बिना किसी रासायनिक उपचार के कर दिया जाता है। इस मिश्रित कचरे में मौजूद विभिन्न रसायन परस्पर संपर्क में आकर जब पांच-छह साल बाद रासायनिक क्रियाएं करते हैं, तो इसमें से जहरीली लैंडफिल गैसें पैदा होने लगती हैं। इनमें हाइड्रोजन पेरोक्साइड, हाइड्रोजन ऑक्साइड, मीथेन, कार्बन मोनोऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड इत्यादि होती हैं।

कचरे के सड़ने से बनने वाली इन बदबूदार गैसों को वैज्ञानिकों ने लैंडफिल गैसों के दर्जे में रखकर एक अलग ही श्रेणी बना दी है। दफन कचरे में भीतर ही भीतर जहरीला तरल पदार्थ जमीन की दरारों में रिसता है। यह जमीन के भीतर रहने वाले जीवों के लिए प्राणघातक होता है। भूगर्भ में निरंतर बहते रहने वाले जल-स्रोतों में मिलकर यह शुद्ध पानी को जहरीला बना देता है। गंधक के अनेक जीवाणुनाशक यौगिक भूमि में फैलकर उसकी उर्वरा क्षमता को नष्ट कर देते हैं।

आधुनिक जीवन शैली बहुत अधिक कचरा पैदा करती है। इसलिए भारत ही नहीं, दुनिया के ज्यादातर विकसित और विकासशील देश कचरे को ठिकाने लगाने की समस्या से जूझ रहे हैं। लेकिन ज्यादातर विकसित देशों ने समझदारी बरतते हुए इस कचरे को अपने देशों में ही नष्ट कर देने की कार्यवाही पर रोक लगा दी है।

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दरअसल पहले इन देशों में भी इस कचरे को धरती में गड्ढे खोदकर दफना देने की छूट थी। लेकिन जिन-जिन क्षेत्रों में यह कचरा दफनाया गया, उन-उन क्षेत्रों में लैंडफिल गैसों के उत्सर्जन से पर्यावराण बुरी तरह प्रभावित होकर खतरनाक बीमारियों का जनक बन गया। जब ये रोग लाइजाज बीमारियों के रूप में पहचाने जाने लगे तो इन देशों का शासन-प्रशासन जागा और उसने कानून बनाकर औद्योगिक व घरेलू कूड़े-कचरे को अपने देश में दफन करने पर सख्त प्रतिबंध लगा दिए। तब इन देशों ने इस कचरे को ठिकाने लगाने के लिए लाचार देशों की तलाश की और सबसे लाचार देश निकला भारत।दुनिया के 105 से भी ज्यादा देश अपना औद्योगिक कचरा भारत के समुद्री तटवर्ती इलाकों में जहाजों से भेजते हैं। इन देशों में अमेरिका, चीन, ब्राजील, आस्ट्रेलिया, जर्मनी और ब्रिटेन प्रमुख हैं।

नेशनल एनवायरमेंट इंजीनियारिंग रिसर्च इंस्टीयूट के एक शोध पत्र के अनुसार वर्ष 1997 से 2005 के बीच भारत में प्लास्टिक कचरे के आयात में 82 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। ये आयात देश में पुनर्शोधन व्यापार को बढ़ावा देने के बहाने किया जाता है। इस क्रम में विचारणीय पहलू यह है कि इस आयातित कचरे में खतरनाक माने जाने वाले ऑर्गेनो-मरक्यूरिक यौगिक निर्धारित मात्रा से 1500 गुना अधिक पाए गए हैं, जो कैंसर जैसी लाइजाज और भयानक बीमारी को जन्म देते हैं।

सर्वोच्च न्यायालय की मूल्यांकन समीति के अनुसार देश में हर साल 44 लाख टन कचरा पैदा होता है। ऑर्गेनाइजेशन फॉर कॉरपोरेशन एंड डेवलपमेंट ने इस मात्रा को 50 लाख टन बताया है। इसमें से केवल 38.3 प्रतिशत कचरे का ही पुनर्शोधन किया जा सकता है, जबकि 4.3 प्रतिशत कचरे को जलाकर नष्ट किया जा सकता है। लेकिन इस कचरे को औद्योगिक इकाईयों द्वारा ईमानदारी से पुनर्शोधित न किया जाकर ज्यादातर जल स्रोतों में धकेल दिया जाताहै।

कचरा भण्डारों को नष्‍ट करने के ऐसे ही फौरी उपायों के चलते एक सर्वे में पर्यावरण नियोजन एवं समन्वय संगठन ने पाया है कि हमारे देश के पेयजल में 750 से 1000 मिलिग्राम प्रति लीटर तक नाइट्रेट पानी में मिला हुआ है और अधिकांश आबादी को बिना किसी रासायनिक उपचार के पानी प्रदाय किया जा रहा है, जो लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा असर डालता है। एप्को के अनुसार नाइट्रेट बढ़ने का प्रमुख कारण औद्योगिक कचरा, मानव व पशु मल है।

ऐसे ही कारणों से लैंडफिल गैंसों का उत्सर्जन बढ़ रहा है। नतीजतन बच्चों में ब्लू बेबी सिंड्रोम जैसी बीमारी फैल रही है। इन गैसों के आंख, गले और नाक में स्थित श्‍लेष्‍मा परत के संपर्क में आने से दमा, सांस, त्वचा और एलर्जी की बिमारियां बढ़ रही हैं। कचरा मैदानों के ऊपर बने भवनों में रहने वाले लोगों में से, खास तौर से महिलाओं में मूत्राशय का कैंसर होने की आशंका बढ़ जाती है। लैंडिफल गैंसें इन खतरों को चार गुना बढ़ा देती हैं। यह प्रदूषण गर्भ में पल रहे शिशु को भी प्रभावित करता है।

नियमानुसार कचरा मैदानों में भवन निर्माण का सिलसिला 15 साल बाद होना चाहिए। इस लंबी अवधि में कचरे के सड़ने की प्रक्रिया पूर्ण होकर लैंडफिल गैसों का उत्सर्जन भी समाप्त हो जाता है और जल में घुलनशील तरल पदार्थ का बनना भी बंद हो जाता है। लेकिन प्रकृति की इस नैसर्गिक प्रक्रिया के पूर्ण होने से पहले ही हमारे यहां जमीन के समतल होने के तत्काल बाद ही आलीशान इमारतें खड़ी करने का सिलसिला शुरू कर देते हैं। जिसका नतीजा उस क्षेत्र में रहने वाली आबादी और इलेक्ट्रोनिक उपकरणों को भुगतना होता है।

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अब इस औद्योगिक व घरेलू कचरे को नष्‍ट करने के प्राकृतिक उपाय भी सामने आ रहे है। हालांकि हमारे देश के ग्रामीण अंचलों में घरेलू कचरे व मानव एवं पशु मल-मूत्र को घर के बाहर ही घरों में प्रसंस्करण करके खाद बनाने की परंपरा रही है। इसके चलते कचरा महामारी का रूप धारण कर जानलेवा बीमारियों का पर्याय न बनते हुए खेत की जरूरत के लिए ऐसी खाद में परिवर्तित होता है, जो फसल की उत्पादकता व पौि‍ष्‍टकता बढ़ाता है। अब एक ऐसा ही अद्वितीय व अनूठा प्रयोग औद्योगिक व घरेलू जहरीले कचरे को नष्‍ट करने में सामने आया है। अभी तक हम केंचुओं का इस्तेमाल खेतों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए वर्मी कंपोस्ट खाद कें निर्माण में करते रहे हैं। हालांकि खेतों की उर्वरा क्षमता बढ़ाने में केंचुओं की उपयोगिता सर्वविदित है, पर अब औद्योगिक कचरे को केंचुओं से निर्मित वर्मी कल्चर से ठिकाने लगाने का सफल प्रयोग हुआ है। अहमदाबाद के निकट मुथिया गांव में एक पायलट परियोजना शुरू की गई है। इसके तहत जमा 60 हजार टन कचरे में 50 हजार केंचुए छोड़े गए थे। चमत्कारिक ढंग से केंचुओं ने इस कचरे का सफाया कर दिया। फलस्वरूप यह स्थल पूरी तरह प्राकृतिक ढंग से जहर के प्रदूषण से मुक्त हो गया। लैंडफिल गैसों से सुरक्षा के लिए कचरे को नष्ट करने के कुछ ऐसे ही प्राकृतिक उपाय अमल में लाने होंगे, जिससे कचरा मैदानों में बसी आबादी के लोग और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण सुरक्षित रहें।

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