खादी स्वतंत्रता व स्वावलंबन की प्रतीक है, राष्ट्र की आत्मनिर्भरता इसी पर टिकी है-  डॉ. संजय सिंह

भोपाल के गांधी भवन में राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर विचार गोष्ठी का आयेाजन

भोपाल, 8 अगस्‍त। राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर विचार गोष्ठी में मुख्य अतिथि के तौर पर बात रखते हुए केंद्रीय गांधी स्‍मारक निधि के मंत्री एवं गांधी भवन न्यास के अध्यक्ष डॉ. संजय सिंह ने कहा कि भारत के कारीगरों में हुनर की कोई कमी नहीं है बल्कि उनके संरक्षण एवं प्रोत्साहन की आवश्यकता है। खादी के माध्यम से गांधीजी ने आम जनता को स्वाधीनता आंदोलन से जोड़ा, जिसने लाखों लोगों को रोज़गार दिया, पर आज उसी खादी को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है। बुनकर गहरे संकट में हैं— यह राष्ट्र के आत्मनिर्भर स्वभाव पर सीधा आघात है।

श्री सिंह गांधी की खादी : वर्तमान और भविषय विषय पर आयोजित विचार गोष्ठी में बेाल रहे थे। गोष्‍ठी का आयोजन गांधी भवन न्यास एवं केंद्रीय संचार ब्यूरो, भोपाल के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।

श्री सिंह ने कहा कि खादी अब मिशन नहीं कमीशन का खेल बन गया है। प्रमाण – पत्र वितरण में भारी धांधली है। देश में दूध इतना है नहीं जितनी कि उससे बनी चीजें बाजार में मिल रही हैं। वही हाल खादी और हैंडलूम का कर दिया गया है। गांधीजी जिस खादी का प्रचार करते थे उसे हेरीटेज की श्रेणी में डालकर दुर्लभ बना दिया गया है। दिल्ली के भारत मंडपम में जब खादी और हैंडलूम का मेला लगा तो वहां वितृष्णा भरा कर्कश संगीत बज रहा था। महात्मा गांधी ने जिस खादी को पवित्रता के भाव से जोड़ा था क्या उसके मेलों में कोई शास्त्रीय संगीत नहीं बज सकता?

संजय सिंह ने यह भी कहा कि खादी और हैंडलूम में व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि इसका सीधा लाभ बुनकरों को मिले। बनारस की साड़ी बनारसी तभी होगी जब वह बनारस में बने और उसका जीआई टैग हो। लेकिन ऐसा हो नहीं रहा। हैंडलूम और खादी के नाम पर बड़ा घालमेल है। डॉ संजय सिंह ने कहा कि खादी और हैंडलूम के वस्त्रों को लोग मंहगा बताते हैं। हाथ का काम धीमा होगा तो मंहगा भी होगा। देश के तेतीस लाख परिवारों की रोजी रोटी इससे चलती है। अगर बुनकरों को देश के लोगों और सरकार का समर्थन नहीं मिला तो खादी- ग्रामोद्योग की संस्थाएं  एक दिन कार्पोरेट घरानों के सुपुर्द भी हो सकती हैं।

See also  खादी खड़ी बाजार में

इस मौके पर लेखक व संपादक राजेश बादल ने कहा कि महात्मा गांधी ने खादी के जरिए एक ऐसा आंदोलन खड़ा किया जो लोगों को देश प्रेम से भरकर आजादी के लिए प्रेरित करता था। उन्होंने खादी वस्त्र को इतना लोकप्रिय बनाया कि हमारे ऊपर राज करने वाली ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का पहिया थम गया। खादी ने भारत के लोगों को स्वदेशी एवं स्वावलंबन के प्रति जागरूक किया।

नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी की प्राध्यापिका डॉ विशाखा अग्रवाल ने हस्तशिल्प व हथकरघा पर विस्तार से बात रखी।  उन्होंने भारत के विविध हस्तशिल्प कला प्रारूपों में महिलाओं के अहम योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने जी आई टैग जैसे पेटेंट से स्थानीयता को मिल रहे संरक्षण एवं उसके महत्व पर प्रकाश डाला।

कार्यक्रम का शुभारंभ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के छायाचित्र पर सूतांजलि एवं दीप प्रज्जवलन से हुआ। केंद्रीय संचार ब्यूरो प्रादेशिक कार्यालय भोपाल के अपर महानिदेशक प्रशांत पाठराबे ने अतिथियों का स्वागत करते हुए उन्हें खादी वस्त्र एवं पौधा भेंट किया।

केन्द्रीय संचार ब्यूरो के सहायक निदेशक श्री शारिक नूर ने केन्द्र सरकार के इस विभाग के स्वरूप व गतिविधियों से परिचित कराया। अतिथियों का परिचय भगवती कड़वे ने दिया। कार्यक्रम में स्कूल फॉर प्लानिंग एंड आर्किटेक्ट के प्रोफेसर डॉ. सौरभ पोपली, महारानी लक्ष्मीबाई महाविद्यालय की राष्ट्रीय सेवा योजना प्रभारी डॉ भावना ठाकुर भी विशेष रूप से शामिल रहे। कार्यक्रम का संचालन पराग मांदले एवं आभार प्रदर्शन करिश्मा पंथ ने किया।

कार्यक्रम की शुरुआत में खादी एवं स्वतंत्रता संग्राम विषय पर क्विज का आयोजन किया गया। क्विज में स्कूल फॉर प्लानिंग एंड आर्किटेक्ट एवं महारानी लक्ष्मीबाई महाविद्यालय के विद्यार्थियों ने भाग लिया। प्रतियोगिता में प्रथम, द्वितीय व तृतीय स्थान प्राप्त विद्यार्थियों को प्रशस्ति पत्र व खादी वस्त्र से पुरस्कृत किया गया।

See also  जमीन पैसे की नहीं, प्राण की चीज

कार्यक्रम में गांधी भवन न्यास के वरिष्ठ न्यासी महेश सक्सेना, वरिष्ठ समाजसेवी महेंद्र जोशी,  जयंत तोमर, रवि सक्सेना, कैलाश आदमी, शशि भूषण यादव, मोहन दीक्षित, प्रज्ञा फिलिप्स, राहुल यादव, अपूर्वा, अचयुत, निपुण, संदीप, अंकित, सुनील शेट्टी, पवन दुबे, सुभाष गीद, अहमद असगर, सुनील मालवीय, मुकेश, चिमन, तुलसी व वीरेंद्र सहित महारानी लक्ष्मीबाई कालेज व स्कूल आफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर की छात्राएं विशेष रूप से उपस्थित थीं।

Table of Contents

सागर से अंतरिक्ष तक : रक्षा विमर्श को नई दिशा देती शोधपरक कृति

भारत की सुरक्षा, संप्रभुता और वैश्विक प्रतिष्ठा से जुड़ा रक्षा विमर्श केवल सैन्य शक्ति का वर्णन नहीं, बल्कि राष्ट्र की सामरिक चेतना का दर्पण होता है। ऐसे समय में वरिष्ठ पत्रकार योगेश कुमार गोयल की पुस्तक ‘सागर से अंतरिक्ष तक:

Read More »

अपने जैसा ‘एआई’

‘आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस’ उर्फ ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ के कसीदे बांचते हुए हम अक्सर इस मामूली सी बात को भूल जाते हैं कि ‘एआई’ आखिरकार एक व्यक्ति और समाज की तरह हमारा ही प्रतिरूप है। यानि हम उस मशीन में जैसा और जितना

Read More »

मध्यप्रदेश का बजट : ग्रीन फ्रेमवर्क का दावा, जलवायु संकट की अनदेखी

हाल के मध्यप्रदेश के बजट में तरह-तरह की लोक-लुभावन घोषणाओं के बावजूद पर्यावरण-प्रदूषण से निपटने की कोई तजबीज जाहिर नहीं हुई है। यहां तक कि पर्यावरण के लिए आवंटित राशि भी पिछले साल के मुकाबले घटा दी गई है। आखिर

Read More »