“सबके लिए स्वास्थ्य, सभी नीतियों में स्वास्थ्य” की मांग के साथ जन स्वास्थ्य अभियान-इंडिया की कार्यशाला सम्‍पन्‍न

5 जुलाई, भोपाल। जन स्वास्थ्य अभियान-इंडिया ने भोपाल, मध्य प्रदेश में तीन दिवसीय कार्यशाला का आयोजन 1 से 3 जुलाई, 2025 किया गया, जिसमें  देश भर से 11 राज्यों के 43 प्रतिनिधियों समेत सार्वजनिक स्वास्थ्य की बेहतरी के लिए दशकों से कार्यरत बुद्धिजीवी, ग्रासरूट साथी, नेटवर्क एवं नागरिक सामाजिक संगठनों के 53 व्‍यक्ति सम्मिलित हुए। गुणवत्तापूर्ण, समावेशी एवं समतामूलक जनस्वास्थ्य तथा देखभाल सेवाओं की मजबूती और सार्वभौमीकरण से जुड़ी चिकित्सकीय सैद्धांतिक अवधारणाओं, ग्रासरूट प्रयासों और विविध व्यापक मुद्दों पर गहन चर्चा हुई।

कार्यशाला में तय किया गया कि इस वर्ष के अंत में जन स्वास्थ्य अभियान – इंडिया का राष्ट्रीय सम्मेलन और उसके पहले 10 राज्यों- उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, जम्मू कश्मीर, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, असम, गुजरात, राजस्थान आदि- में क्षेत्रीय सम्मेलन और राज्य स्तरीय कार्यशालाएं आयोजित की जाएगी। साथ ही विभिन्न मुद्दों पर कार्यरत सहमना संगठनों, नेटवर्कों और स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्यरत जमीनी संगठनों को जोड़ते हुए देशव्यापी अभियान चलाया जाएगा।

कार्यशाला के दौरान आगामी संसदीय मानसून सत्र 21 जुलाई, 2025 के मद्देनजर प्रतिनिधियों ने मांग की कि किसी भी नीति को बनाने में आम जनता की स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं को चिन्हित करते हुए उनके जीने के अधिकार और स्वास्थ्य अधिकार को संरक्षित-सुरक्षित रखने की दिशा में ठोस कदम उठाये जाएं। लेकिन यह सिर्फ सदिच्छाओं और खोखले वायदों से संभव नहीं है। वर्तमान नीतियों की गहन समीक्षा तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की मजबूती, सुचारु संचालन एवं उन तक लोगों की पहुंच बढ़ाने के लिए जनपक्षीय राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है।

कार्यशाला में विमर्श के दौरान पेश उदाहरणों, तथ्यों, सवालों और बहसों से स्पष्ट हुआ कि मौजूदा जन-विरोधी, कॉर्पोरेट, बाजार आधारित संचालित स्वास्थ्य नीतियां न केवल लोगों के बेहतर स्वास्थ्य के प्रति जरूरी संवेदनशीलता के अभाव से ग्रस्त हैं बल्कि वे हर कदम पर आर्थिक लूट-खसोट को अंजाम दे रही हैं। ये नीतियां लोगों की सेहत के प्रति कतई फिक्रमंद नहीं हैं और लोकतांत्रिक जिम्मेदारियों-जवाबदेहियों की भी अनदेखी कर रही हैं। इसका सबसे बुरा प्रभाव देश की करोड़ों करोड़ दलित-वंचित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, विकलांग एवं आर्थिक रूप से कमजोर समुदायों को झेलना पड़ रहा है।

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जन स्वास्थ्य के एजेंडे की इस निरंतर अनदेखी का भयावह परिणाम कोविड-19 महामारी के दौरान बड़े पैमाने पर दिखा जब सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र की कमजोरी, अक्षमता और नियमित एवं आकस्मिक चुनौतियों से कुशलतापूर्वक निबटने में घोर कमी और अव्यवस्था स्पष्ट रूप से सामने आई। सरकार द्वारा अपने नागरिकों को समय पर पर्याप्त सहायता मुहैया कराने में विफलता और ऐसे कठिन संकट के दौर में भी निजी क्षेत्र की महंगी, मुनाफा केंद्रित, गैर-संवेदनशील एवं लापरवाह स्वास्थ्य सेवाओं और कमजोर बुनियादी ढांचे के कारण इलाज के अभाव में बड़ी संख्या में लोगों की जानें गईं।

अभूतपूर्व स्वास्थ्य संकट और मेडिकल इमरजेंसी के वक्त भी निजी क्षेत्र द्वारा अवांछित मुनाफे के लिए तत्कालीन हालात का फायदा उठाना निजी क्षेत्र की परोपकारी स्वास्थ्य नीति की कलई खोल देती है और सरकारी-निजी गठजोड़ (पीपीपी) को बढ़ावा देने वाली सरकारी नीतियों के स्वाभाविक परिणाम की तरफ इशारा करती है।

फिलहाल सरकार द्वारा स्वास्थ्य के लिए आवंटित बजट खर्च नाकाफी है। बुनियादी सुविधाओं के अभाव और जर्जर स्वास्थ्य ढांचे के बावजूद स्वास्थ्य बजट के आवंटन में कमी आम जनता के स्वास्थ्य के प्रति सरकार की अदूरदर्शी सोच को जाहिर करती है। दूसरी तरफ, स्वास्थ्य सेवाओं में निजी क्षेत्र  की व्यापक घुसपैठ और बेलगाम वसूली जाने वाली मोटी मेडिकल फीस और आसमान छूती दवाओं के दाम भी कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचायक है। बिना सख्त नियामक निगरानी तंत्र के हालात और भी बदतर होने की तरफ जा रहे हैं। जिस बीमा आधारित स्वास्थ्य मॉडल का प्रचार जोर-शोर से किया जा रहा है, उसने भी सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं और ढांचे को तहस-नहस करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। राज्य द्वारा संचालित अस्पतालों को मजबूत करने की बजाय उन्हें बीमा-आधारित संस्थाओं में बदला जा रहा है।

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नीति आयोग द्वारा जिला अस्पतालों के निजीकरण संबंधी निर्देश और सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र में लगातार बजट कटौती, सरकार की प्राथमिकताओं को स्पष्ट करते हैं। दूसरी ओर, इन योजनाओं की जमीनी प्रभावशीलता, विशेष रूप से वंचित और दूरदराज के समुदायों तक उनकी पहुंच, अभी भी संदेह के घेरे में है। इन सबके बीच, व्यापक सामाजिक अंकेक्षण, कठोर नियामक व्यवस्था और सार्वजनिक ढांचे की मजबूती ही इस संकट से बाहर निकलने का रास्ता दिखा सकते हैं।

राष्ट्रीय कार्यशाला में सबके लिए स्वास्थ्य, सभी नीतियों में स्वास्थ्य की अपरिहार्य आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के अत्यंत महत्वपूर्ण घटक, फ्रंटलाइन वर्कर्स और योजनाकर्मियों को हमेशा ही उपेक्षा, उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है। उनके पास बुनियादी अधिकार नहीं हैं और अकसर उन्हें काम-काज के लिए आवश्यक उचित सुविधाओं एवं कार्य-स्थितियों से वंचित रखा जाता है। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सेल्स प्रमोशन कर्मचारी (एसपीई) भी इसी तरह की समस्याओं का सामना करते हैं। एसपीई समेत इन सभी स्वास्थ्यकर्मियों के साथ भी निष्पक्ष व्यवहार और बेहतर विनियमन की मांग की गई।

सरकार द्वारा आवश्यक एवं जीवनरक्षक दवाओं पर मूल्य नियंत्रण की लगातार उपेक्षा की सख्त आलोचना की गई और बताया गया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन वैक्सीन संधि और विश्व व्यापार संगठन पेटेंट संशोधन जैसी वैश्विक नीतियों को आगे बढ़ाने की नीति राष्ट्रीय संप्रभुता और सार्वजनिक स्वास्थ्य हितों को किस तरह कमजोर कर सकती हैं। इस कार्यक्रम में 15 हेल्थ एक्सपर्ट ने अलग- अलग सत्रों में अपने अनुभव रखे।

इन मुद्दों के मद्देनजर, कार्यशाला ने कुछ अहम प्रस्ताव पारित किए : –

1.    सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की जवाबदेही, मजबूती और संरक्षण सुनिश्चित की जाए।

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2.    सार्वजनिक अस्पतालों और सेवाओं के निजीकरण या आउट सोर्सिंग पर रोक लगाई जाए।

3.    श्रमिकों की व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा और अन्य प्रासंगिक श्रम अधिकारों पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) सम्मेलनों में पारित प्रस्तावों का पालन सुनिश्चित हो।

4.    स्वास्थ्य देखभाल के सभी स्तरों के लिए “सभी के लिए स्वास्थ्य” का दृष्टिकोण अपनाया जाए।

5.    सभी क्षेत्रों की नीतियों में स्वास्थ्य संबंधी विचारों को एकीकृत करने के लिए संस्थागत व्यवस्था को सशक्त किया जाए और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा की मजबूती के लिए आवश्यक बजट का आवंटन किया जाए।

6.    स्वास्थ्य नीतियों में हाशिए पर पड़े और वंचित समुदायों को प्राथमिकता दी जाए।

7.    पर्यावरण और आम लोगों की स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति का केंद्र बनाया जाए। 

कार्यशाला में रिसोर्स पर्सन के रूप में जेएनयू के रिटायर्ड प्रोफेसर प्रो रितु प्रिया, डॉ. वीना शत्रुघ्‍न, एक्सपर्ट ड्रग इश्यू अमितावा गुहा,  चाइल्ड हेल्थ एक्सपर्ट डॉ वंदना प्रसाद , ईश्वर जोशी, रेमा नागराजन, सर्वोदय प्रेस सर्विस के संपादक राकेश दीवान, जगदीश पटेल, प्रबीर चटर्जी,  टीबी पर डब्ल्यूएचओ समिति के सदस्य डॉ. अनुराग भार्गव, डॉ संजय नागरल, डॉ अनंत फड़के, इनायत, जया वेलेंकर, चंद्र कुमारी, मुकुट लोचन, वी पी सूर्यवंशी, महजबीन भट्ट, अमूल्य निधि, एस. आर. आजाद, गौरांगो महापात्र, मित्ररंजन, चंद्रकांत, राही रियाज़, पुनीता, प्रशांत, राकेश चंदौरे , मंती सिंह एवं संजीव सिन्हा ने प्रतिभाग किया।

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