सैरनी : नायाब है, एक नदी का लौटना

पर्यावरणविद् राजेन्द्र सिंह से कुमार सिद्धार्थ की बातचीत

कुमार सिद्धार्थ

मध्यप्रदेश–राजस्थान की सीमा पर एक आमफहम-सी, साल के अधिकांश समय सूखी रहने वाली नदी थी–सैरनी। यह इलाका डकैती के अलावा भीषण गरीबी की चपेट में है, इतनी गरीबी कि वहां बसी सहरिया जनजाति, मध्यप्रदेश की तीन ‘पीवीटीजी’ (विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों)–बैगा, भारिया,सहरिया-में एक है। इसी समाज और इलाके ने अपनी सूखती नदी को वापस पुनर्जीवित करने का कमाल किया है।

कुमार सिद्धार्थ : सैरनी नदी के जलग्रहण क्षेत्र में आए व्यापक बदलाव की शुरुआत कहाँ से मानी जाए?

राजेन्द्र सिंह : सैरनी नदी का इलाका कभी बहुत समृद्ध था—पानी, जंगल, खेती सब कुछ था, लेकिन फिर जंगल कटे, खनन बढ़ा, लापरवाही हुई और नदी सूख गई। ज़मीन बंजर हो गई, लोग गांव छोड़ने लगे। यह इलाका बुंदेलखंड की सीमा पर है और बरसों डकैती के लिए बदनाम रहा है।

बदलाव तब शुरू हुआ जब आत्मसमर्पण कर चुके कुछ पूर्व डकैत आए और बोले कि वे अब धरती मां की सेवा करना चाहते हैं। हमने कहा — यही सबसे बड़ा प्रायश्चित है। 1992 में हमने जल-संरक्षण का काम शुरू किया, लेकिन असली बदलाव 2019 के बाद दिखा जब लोगों ने जल-जंगल-ज़मीन की अहमियत समझी।

छोटे-छोटे कामों से शुरुआत हुई और धीरे-धीरे जंगल लौटे, पानी जमा होने लगा और नदी ने फिर से बहना शुरू किया। लोगों ने कुल्हाड़ी छोड़कर पेड़ बचाने शुरू किए। पहले यहां सहरिया जनजाति रहती थी,  जिनका जीवन नदी और जंगल से जुड़ा था। संभवत: उन्हीं के कारण इस नदी का नाम सैरनी पड़ा।

कुमार सिद्धार्थ : इस काम में लोगों की भूमिका कैसी रही? और किस तरह के पानी के काम किए गए?

राजेन्द्र सिंह : इस पूरे प्रयास की आत्मा लोगों की सक्रिय भागीदारी रही है। शुरुआत हमने सामूहिक श्रमदान से की — परंपरागत जल-संरचनाएं, जैसे – जोहड़, चेक-डैम और आहर-पाइन को फिर से जीवित किया गया। सैरनी नदी से जुड़े पहाड़ी नालों को चिन्हित किया और उन पर छोटे-छोटे चेक-डैम बनाए, ताकि वर्षा का पानी धीरे-धीरे जमीन में समाकर भूजल वापस ला सके।

एक उदाहरण है, सिरसी गांव का — वहां एक बंजर पहाड़ी नाला था, जहां बरसात का पानी कुछ ही मिनटों में बहकर निकल जाता था। वहां छह फीट ऊंचा और बीस मीटर लंबा चेक-डैम बनाकर पानी रोका गया। आज वही इलाका हरियाली से आच्छादित है और वहां के कुएं बारहों महीने पानी से भरे रहते हैं।

जंगलों के पुनर्जीवन के लिए ग्रामीणों ने चारा-बंदी अपनाई — यानी कुछ क्षेत्रों में पशुओं की चराई पर रोक लगाई गई और उनके लिए अलग चराई क्षेत्र तय किया गया। इससे वनस्पति पुनर्जीवित हुई और वर्षा-जल संचयन बढ़ा।

इसमें महिलाओं की भूमिका विशेष रही। उन्होंने जल-समितियों का गठन किया, पानी की निगरानी शुरू की और अपने-अपने मोहल्लों में जल उपयोग को लेकर संवाद और अनुशासन कायम किया। एक महिला समूह ने तो बारिश मापने के लिए प्लास्टिक की बोतलों से ‘वर्षा मापक यंत्र’ बनाए — यह नवाचार था, आत्मनिर्भरता का सशक्त उदाहरण।

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सच कहें तो यह सिर्फ जल-संरचना निर्माण नहीं, बल्कि एक जन-आंदोलन था — जिसमें हर व्यक्ति ने अपना छोटा-बड़ा योगदान दिया और मिलकर एक सूखी नदी को फिर से जीवित कर दिया।

कुमार सिद्धार्थ : इस सबका समाज और अर्थव्यवस्था पर क्या असर हुआ?

राजेन्द्र सिंह : इस प्रयास का सामाजिक और आर्थिक असर बहुत गहरा और व्यापक रहा है। जहां पहले मुश्किल से एक फसल होती थी, अब दो से तीन फसलें ली जा रही हैं। सिंचाई की उपलब्धता से लोग जैविक खेती की ओर बढ़े हैं और बागवानी भी शुरू की है—आंवला, नींबू और सहजन जैसे पौधे अब आम हो गए हैं।

जहां कभी डकैतों के भय का साया था, वहां अब बच्चे मैदानों में खेलते हैं। जो गांव कभी वीरान हो रहे थे, वहां अब रौनक लौट आई है। पलायन लगभग रुक गया है—जो लोग पहले मजदूरी के लिए शहरों की ओर भागते थे, वे अब अपनी ही जमीन पर खेती कर रहे हैं।

सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि बदलाव केवल खेतों तक सीमित नहीं रहा—यह लोगों के सोचने और निर्णय लेने के तरीके में भी आया है। अब गांव के युवा ‘जल-संरक्षण समितियों’ में नेतृत्व कर रहे हैं और ग्रामीण अपनी योजनाएं खुद बना रहे हैं। यह आत्मनिर्भरता का संकेत है।

एक उदाहरण देना चाहूँगा—ललितपुर जिले के बक्सा गाँव का रामप्रसाद, जो पहले जंगल से अवैध लकड़ी काटता था, लेकिन जब गांव में जल-कार्य शुरू हुआ, तो वह श्रमदान में सबसे आगे रहा। आज वह गांव की जल-समिति का संयोजक है और पूरे गांव में जल-संरक्षण की गतिविधियों को दिशा दे रहा है।

खेती में भी विविधता आई है। पहले केवल बाजरा, तिल, सरसों जैसी पारंपरिक फसलें होती थीं, अब सब्ज़ियाँ, गेहूं, मटर, यहाँ तक कि सिंघाड़ा भी उगाया जा रहा है। जहां पहले पांच मन बाजरा भी मुश्किल था, अब 100 से 300 मन तक हो रहा है। जल-प्रबंधन ने फसल-चक्र को वर्षा-चक्र से जोड़ा है, जिससे खेती अब मौसम के अनुरूप और टिकाऊ बन गई है।

कुमार सिद्धार्थ ‘हिंसक जीवन से अहिंसक बदलाव’ के कुछ उदाहरण साझा करेंगे, जहाँ इसे महसूस किया गया है?

राजेन्द्र सिंह : बिल्कुल, सैरनी नदी क्षेत्र की ऐसी कई कहानियाँ हैं जो दिल को छू जाती हैं। एक समय था जब यहाँ के गांवों में कोई भी अपनी बेटी का विवाह नहीं करना चाहता था। इलाके में डकैतों और हथियारबंद गिरोहों का बोलबाला था। शादी-ब्याह जबरन या भय के आधार पर होते थे। अधिकतर रिश्तेदारियाँ अलवर के गुर्जरों से जुड़ी थीं।

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जब वहाँ ब्याही गई लड़कियों ने करौली, सवाईमाधोपुर, धौलपुर और दौसा जैसे क्षेत्रों में ‘तरुण भारत संघ’ के जल-संरक्षण कार्यों की चर्चा की, तो तीन बुजुर्ग मिलने आए और हमें लेकर गाँव पहुँचे। वहाँ भगवती नाम की एक महिला ने अपना खेत दिखाया, जहाँ संस्था ने तालाब बनवाया था। उसी तालाब की वजह से खेत में पहली बार अच्छी फसल हुई थी।

भगवती का पति एक नामी डकैत था – जिसने कभी अपनी पत्नी के लिए कुछ नहीं किया था। इस बार, पहली फसल से मिली आमदनी से भगवती ने अपने पति के लिए साफ़ा और धोती-कुर्ता खरीदा और मेरे हाथों उसे भेंट करवाया। उसका पति भावुक होकर रो पड़ा और बोला—“बंदूक ने मुझे बदनाम किया, लेकिन खेती ने मुझे सम्मान दिया। आज से मैं हिंसा छोड़ता हूँ और खेती करता हूँ।” उसने वाकई बंदूक छोड़ दी, अदालत से फरारी खत्म करवाई और आज वह सिर्फ किसानी करता है।

ऐसी ही एक और कहानी है लज्जा सिंह की – भूड़खेड़ा का एक कुख्यात व्यक्ति, जिस पर 40 मुकदमे थे। जब उसने अपनी जमीन पर पानी देखा, तो हिंसा और अपराध छोड़कर खेती में लग गया। आज अदालत से मुक्त होकर वह पूरी तरह समाज के निर्माण में लगा है।

नाहरपुरा के जगदीश की कहानी भी ऐसी ही है। कभी लूट-पाट और हिंसा में लिप्त रहा, आज जंगल के भीतर रहकर, अपनी ज़मीन पर खेती करता है। फर्क यह है कि पहले वह जंगल को शिकार की तरह देखता था, अब उसी जंगल को आस्था और आजीविका का स्रोत मानता है।

इन लोगों के जीवन में ‘धराड़ी’ की परंपरा फिर से जीवित हुई है। ‘धराड़ी’ शब्द ‘धरोहर’ और ‘धारणा’ – दोनों से जुड़कर बना है। इस क्षेत्र के लोग किसी विशेष जलस्रोत, पेड़, जीव या प्राकृतिक तत्व को अपने गोत्र से जोड़कर पूजते हैं। उनके लिए प्रकृति केवल संसाधन नहीं, आत्मीय रिश्ते की तरह है।

कुमार सिद्धार्थ : आपने जल संरक्षण के काम को गाँवों, पंचायतों और महिलाओं से जोड़ा। इसका क्या असर पड़ा?

राजेन्द्र सिंह: असली परिवर्तन तब आया जब पंचायतों और महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित हुई। पहले जहाँ एक फसल भी मुश्किल से होती थी, अब साल में दो फसलें ली जा रही हैं। महिलाएं अब घंटों पानी ढोने से मुक्त हो चुकी हैं, जिससे उन्हें अपने घर, खेती और बच्चों के लिए समय मिला। बेटियाँ स्कूल जाने लगीं, और पोषण से जुड़ी समस्याएं, जैसे रतौंधी, खत्म होने लगीं।

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यह एक तरह से सामाजिक और पारिस्थितिक पुनर्जन्म है। जल संरक्षण का कार्य महिलाओं के लिए बिना किसी नारे या अभियान के सशक्तिकरण का माध्यम बन गया है।

जहाँ पहले पर्दा प्रथा सामाजिक दबाव के कारण हर जगह लागू थी, अब वही होता है जहाँ वास्तव में ज़रूरत हो। समाज में पारदर्शिता बढ़ी है—जो पहले छिपाते थे, अब वही लोग अपने अनुभव साझा करते हैं।

पहले लोग यह कहने से भी डरते थे कि वे बाग़ी हैं। अब वे न सिर्फ बग़ावत छोड़ चुके हैं, बल्कि भयमुक्त होकर सत्य बोलने और अहिंसा के रास्ते पर चलने का साहस भी पा चुके हैं। यह बदलाव पानी से ही संभव हुआ है—पानी ने उन्हें आत्मसम्मान और नया जीवन दिया है।

कुमार सिद्धार्थ : क्या पानी शांति और पुनरुत्थान का माध्यम बन सकता है?

राजेंद्र सिंह: निःसंदेह, पानी सिर्फ जीवन का स्रोत नहीं, बल्कि सामाजिक शांति और आत्मसम्मान का आधार भी है। जहां पानी होता है, वहां खेती होती है, रोजगार होता है, और सबसे बढ़कर—स्वाभिमान होता है। जब गांव का स्वाभिमान लौट आता है, तब हिंसा, अपराध और डर अपनी जगह खुद छोड़ देते हैं। सैरनी नदी का पुनर्जीवन यही संदेश देता है कि जल संरक्षण केवल एक पर्यावरणीय प्रयास नहीं है, यह सामाजिक पुनर्निर्माण और शांति स्थापना का सशक्त माध्यम भी है। जल अगर लोक के साथ जुड़ जाए, तो उसका असर केवल धरती पर नहीं, मनुष्यता पर भी पड़ता है। 

कुमार सिद्धार्थ: इस सामाजिक व पर्यावरणीय परिवर्तन में किन लोगों और संगठनों की प्रमुख भूमिका रही?

राजेन्द्र सिंह : इस बदलाव की शुरुआत लोगों ने खुद की। चमन सिंह, मौलिक सिसोदिया, जगदीश, रणवीर सिंह और छाजूराम जैसे साथियों ने समय, श्रम और समर्पण दिया। इंदिरा खुराना ने इस पूरी यात्रा को दस्तावेजीकृत कर व्यापक समाज तक पहुँचाया। कई संस्थाएं भी जुड़ीं, लेकिन असली ताकत लोगों की अपनी पहल में थी—उन्होंने न कोई सिफारिश मांगी, न कोई सुविधा—बस पानी मांगा और उसी में अपना भविष्य देखा।

मैंने कभी नहीं सोचा था कि सैरनी नदी के बहने से इतना गहरा बदलाव आएगा—हिंसा और भय की जगह विश्वास और अपनापन फैल गया। जो लोग पहले बाहरी दुनिया से डरते थे, अब खुले दिल से स्वागत करते हैं। यह बदलाव मेरे लिए अत्यंत प्रेरक है।

रास्ता आसान नहीं था। कई साथी अपहरण जैसी स्थितियों का भी शिकार हुए। मैं स्वयं गांव-गांव गया, लेकिन जल्दबाज़ी नहीं की। धैर्य रखा और समाधान अपने आप निकलते गए।

प्रशासन और पुलिस से भी सहयोग मिला। विशेषकर डीजीपी शांतनुकुमार और एसपी मित्तल ने हमारी बात न सिर्फ समझी, बल्कि लोगों के साथ भी खड़े रहे। (सप्रेस)

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