Manoj Misra : विदा हुए, ‘यमुना जिए अभियान’ के संयोजक मनोज मिश्रा

कौशल किशोर

पर्यावरण, प्रकृति और नदियों की साज-संभाल में कई ऐसे लोग प्राणपण से जुटे हैं जिन्हें समाज उनकी अपेक्षित हैसियत नहीं दे पाता। पूर्व वन-अधिकारी मनोज मिश्रा इसी जीवट के व्यक्ति थे। पिछले दिनों वे हम सबसे सदा के लिए विदा हो गए हैं। प्रस्तुत है, श्रद्धांजलि-स्वरूप कौशल किशोर का यह लेख।

सुबह कम-से-कम एक लाख लोग लंबी मानव श्रृंखला बनाने के लिए यमुना के तट पर राष्ट्रीय राजधानी में जमा हुए थे। यमुना कछार 22 किलोमीटर लंबी मानव श्रृंखला का गवाह हुआ। यह प्रयास ‘यमुना संसद’ कहलाता है। इसमें सभी क्षेत्र के लोग और राजनीतिक दलों के नेता और कार्यकर्ता यमुना बचाने के लिए एकत्रित हुए थे। यमुना को बचाने के लिए हुआ यह विशाल जमावडा ‘यमुना जिए अभियान’ का सूत्रपात करने वाले मनोज मिश्रा की अगुआई में हुआ था

उस शाम वे ‘राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र’ में ‘आश्रय के अधिकार’ के लिए सत्याग्रह करने वाले विमल भाई के दुर्भाग्यपूर्ण अंत के बारे में बात कर रहे थे। ऐसा भी नहीं लग रहा था कि कल की ही बात हो। विमल भाई की एक दशक लंबी बीमारी के बारे में सिलसिलेवार विवरण उन्होंने प्रस्तुत किया था। रविवार को ‘यमुना संसद’ से जुड़ी जानकारी एकत्र करने की कोशिश करते हुए उनके निधन का पता चला तो यकीन नहीं हो रहा था। उनको फोन लगाने पर उनकी छोटी बहन श्रद्धा बक्सी ने इसकी पुष्टि की। अविरल और निर्मल यमुना का स्वप्न साकार करने हेतु उनके जीवन और कार्यों में छिपे महत्वपूर्ण संदेशों पर गौर करना चाहिए।

उनका जन्म मथुरा-आगरा क्षेत्र के एक कवि के परिवार में 7 अक्टूबर 1954 को हुआ था। पच्चीस की अवस्था में ‘भारतीय वन सेवा’ (आईएफएस) में शामिल हुए। करियर के चरम पर वे ‘ट्रैफिक’ (‘डबल्यूडबल्यूएफ इंडिया’ का एक उपक्रम) के निदेशक और मध्यप्रदेश में ‘मुख्य वन संरक्षक’ के रूप में सक्रिय रहे। बाइस साल लंबी सेवा के बाद 2001 में उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का विकल्प चुना। यह यमुना की सेवा में समर्पित होने से पहले की कहानी है। ड्यूटी और कर्त्तव्य का मार्मिक प्रसंग इस कड़ी में प्रकट होता है।

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दो साल बाद 2003 में उन्होंने दिल्ली में ‘पीस इंस्टीट्यूट’ शुरु किया और 2007 से ‘यमुना जिए अभियान’ के संयोजक भी रहे। मनोज मिश्रा न केवल यमुना में औद्योगिक और घरेलू कचरा प्रवाहित करने के विरुद्ध सक्रिय रहे, बल्कि इबादत घरों से पहुंचने वाले कचरे को प्रवाहित करने के भी वे खिलाफ थे। इसके लिए उन्होंने कोर्ट में याचिका भी दायर की थी। 13 जनवरी 2015 को ‘राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण’ (एनजीटी) की पीठ ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया था। इसमें कहा गया था कि “हम किसी भी व्यक्ति को निर्दिष्ट स्थल को छोड़कर यमुना में पूजा सामग्री या किसी भी अन्य सामग्री, जैसे-खाद्यान्न, तेल आदि को फेंकने से रोकते हैं। कोई भी व्यक्ति इस निर्देश की अवहेलना करने पर जुर्माने के तौर पर 5000 रुपये का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी होगा।” 

हालांकि ‘एनजीटी’ को इस वास्तविकता का पता था कि अधिकारियों में ईमानदारी और प्रभावी ढंग से योजनाएं और आदेशों को लागू करने के लिए जरुरी इच्छाशक्ति की कमी है। इसके बावजूद उन्हें ऐसी सामग्री चढ़ाने अथवा विसर्जित करने के लिए नदी के किनारों पर विशेष व्यवस्था करने का निर्देश दिया। इसी कड़ी में मनोज मिश्रा ‘पुष्पांजलि कलश’ जैसी परियोजना शुरू करने वाले ‘यूथ फ्रेटरनिटी फाउंडेशन’ से संपर्क साधते हैं और इसके संस्थापक और अध्यक्ष गोपीदत्त आकाश के साथ मिलकर जागरूकता कार्यक्रम शुरू करते हैं। आम और खास जनता का आह्वान करते हुए वे टीवी चैनलों पर भी खूब दिखे थे।

पिछले दो दशकों में दिल्ली में उनकी पहचान ‘पब्लिक इंटेलेक्चुअल’ के तौर पर कायम हुई थी। सही मायनों में मेरी व्यक्तिगत बातचीत उनके साथ 2012 में शुरू हुई। ‘इंडिया इंटरनेशनल सेंटर’ में हम “गंगा की व्यथा” पर दो दिनों के गोलमेज सम्मेलन में थे। इसके एक सत्र में मनोज मिश्रा हमारे मुख्य अतिथि रहे। तभी से विचार साझा करने का क्रम जारी रहा। यमुना सरंक्षण से जुड़े मोर्चे पर हम एक साथ सक्रिय भी रहे।

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उन्हें जनहित याचिका दायर करने के लिए जाना जाता है। गंगा और यमुना जैसी नदियों के मामलों में न्यूनतम पारिस्थितिक प्रवाह सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने एक व्यापक अभियान चलाया। अफसोस की बात है कि आईआईटी और विशेषज्ञों का समूह यह न्यूनतम प्रवाह सुनिश्चित करने में सफल नहीं हो सका। यमुना उनको आकर्षित करती रही। श्री श्री रविशंकर व उनकी आध्यात्मिक संस्था ‘दी आर्ट ऑफ लिविंग’ के खिलाफ ‘एनजीटी’ के फैसले से भी यह परिलक्षित होता है।

स्वामी सानंद (प्रो.जीडी अग्रवाल) और मनोज मिश्रा के जीवन एवं कार्य में निहित संदेश राजनेताओं और नौकरशाहों के लिए भी प्रासंगिक हैं। आधुनिक भारत को शीघ्र ही उनका संदेश समझना होगा। नदियों में आवश्यक प्रवाह को बहाल रखने के लिए नहर से सिंचाई की व्यवस्था को भी बदलने की जरूरत है। जलस्रोतों को रिचार्ज कर कृषि कार्य हेतु आवश्यक होने पर जल की निकासी की प्रौद्योगिकी देश के तमाम हिस्सों में पहुंच चुकी है।

औद्योगिक और घरेलू सीवर की समस्या एक अहम मुद्दा है। इसमें विभिन्न क्षेत्रों के सहयोग की आवश्यकता है। विशाल ‘सीवर ट्रीटमेंट प्लांट्स’ (एसटीपी) ने तरल कचरे को ले जाने के लिए खूब लंबी सीवर लाइनों की मांग पैदा की। साथ ही धरती माता को प्रदूषित करने का काम किया है। आज इस संकट से निपटने के लिए बेहतर तकनीकी उपलब्ध है। इसकी चर्चा कुछ दिनों पहले “कचरा प्रबंधन का राजनीतिक अर्थशास्त्र और राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण” की भूमिका पर केंद्रित उनके आलेख में हुई है। अपने अंतिम प्रहर में मनोज मिश्रा कोरोना वायरस के नए वैरिएंट के संक्रमण से ग्रस्त हो गए थे। जिस दिन हमें छोड़कर गए वह यमुना के मामले में निश्चय ही ऐतिहासिक दिन है। उस दिन सभी राजनीतिक दलों और विचार के विभिन्न विद्यालयों ने यमुना की संतान के तौर पर अपनी पहचान उजागर करने का सामूहिक प्रयास किया था। गौरतलब है कि हमारे पूर्वजों ने इस भावना को मुख्य आधार मानकर प्राकृतिक रूप से बहने वाली नदियों की स्वच्छता और पवित्रता को बरकरार रखा। आज जल के अन्य स्रोतों की सुरक्षा इसी का नतीजा है। इन सबके बावजूद अतीत की मूर्खता जारी रखने से ‘यमुना संसद’ और मनोज मिश्रा के होने का उद्देश्य प्राप्त नहीं होगा। (सप्रेस)

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