पंचायत चुनाव के लिए गांधीवादी संगठनों का मशविरा, दलों में बंटे बगैर मतदाता उम्मीदवार खुद चुने

भुवनेश्वर : ओडिशा में होने वाले पंचायत चुनाव की अधिसूचना जारी होते ही वार्ड मेम्बर से लेकर जिला पंचायत सदस्यों तक के प्रत्याशी चुनाव में उतरने की तैयारी में जुट गए हैं। संविधान के अनुसार वार्ड सदस्य, सरपंच, पंचायत समिति के सदस्य और ब्लॉक अध्यक्ष तक के उम्मीदवारों को निर्दलीय रूप से चुनाव लड़ना होता है, यहां तक की पार्टी के प्रतीकों का भी उपयोग नहीं हो सकता। जिसका मकसद गांव के लोग दलों में ना बंटे और अपने ही बीच से अच्छे और सच्चे उम्मीदवारों को चुने। लेकिन संविधान का यह दिशा निर्देश अब खो चुका है। ओडिशा में पंचायत चुनावों की घोषणा के कई महीनों पहले से, सम्भावित उम्मीदवारों की  विभिन्न पार्टियों के नेताओं की प्रतीक चिह्नों के साथ तस्वीरें चौराहों और हाट बाजारों में लग गयी थी। यहां तक कि कई उम्मीदवारों के बैनर, पोस्टर और प्रचार पत्र में पार्टियों का खुले आम समर्थन भी छपता रहा है।

देश की गांधीवादी संस्‍थाओं – उत्कल गांधी स्मारक निधि, गांधी शान्ति प्रतिष्ठान, राष्ट्रीय युवा संगठन, सर्व सेवा संघ की ओर से श्रीमती कृष्णा मोहंती, शैलज रवि, मनोरंजन मोहंती, डॉ बिस्वजीत, जयंत कुमार दास, बिरुपाक्ष त्रिपाठी, तुषारकांति मोहंती,सूर्य नारायण नाथ, मानस पटनायक, आद्यशोल्क मिश्र ने एक प्रेस बयान जारी करके कहा कि वैसे तो बहुत देर तो हो चुकी है, लेकिन देश की वर्तमान स्थिति को देखते हुए आमजन जागृत हो और इस पंचायत चुनाव में अपने उम्मीदवार को संगठित होकर एक मत से चुनाव करें। अपना मत बांट कर ख़त्म न होने दें और जागृत नागरिक का एक उदाहरण पेश करते हुए पूरे देश और दुनिया को लोकतंत्र का सही मतलब समझायें।

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गांधीवादी संस्‍थाओं के प्रबुद्धजनों ने कहा कि आजादी के 75 साल के बाद भी देश बुनियादी ज़रूरतें – भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए संघर्ष कर रहा है। इन वर्षों में हमने हर छोटे-बड़े राजनीतिक दल की सत्ता देखी है। फिर भी हमें हमारी बुनियादी समस्याओं के कोई समाधान नहीं मिले हैं और नयी-नयी समस्याएं उत्पन्न हुईं हैं। इस अनुभव ने दलीय राजनीति का मुखौटा खोल कर रख दिया है। इसलिए, गांधीवादी संगठन समूह की तरफ से हम लोगों से आगामी पंचायत चुनावों में पार्टी के उम्मीदवारों का बहिष्कार करने का आव्हान करते हैं।

उन्‍होंने अपील की कि मतदाता अपने-अपने वार्ड में सभी को साथ लेकर मतदाता परिषद का गठन करें। हर मतदाता परिषद अपने वार्ड से एक प्रतिनिधि को चुने और इन प्रतिनिधियों की मिला कर एक पंचायत स्तरीय समिति बने। जरूरी यह है कि इन प्रतिनिधियों को खुद चुनाव न लड़ते हुए पंचायतों से योग्य उम्मीवार को खोजना होगा। यदि एक से ज्यादा योग्य व्यक्ति हों तो लोगों के प्रतिनिधियों से बनीं यह पंचायत समिति योग्यता, सत्यनिष्ठा और चरित्र के आधार पर उनमें से एक को सरपंच उम्मीदवार के रूप में मनोनीत करे। इसी प्रक्रिया के तहत वार्ड सदस्यों से लेकर पंचायत समिति के सदस्यों तक के उम्मीदवारों का चयन किया जा सकता है। पार्टी आधारित जिला पंचायत के चुनावों में भी लोग इसी तरह से अपने उम्मीदवार का चयन कर सकते हैं।

उन्‍होंने कहा कि आज तक तो यही होता आया है कि हर तरह के चुनाव के लिए प्रत्याशी का चयन पार्टी करती है इसलिए वह उम्मीदवार भी अपनी पार्टी के प्रति वफ़ादार होता है न कि जनता के प्रति। लेकिन जनता के प्रतिनिधि का चुनाव यदि एक व्यवस्था द्वारा खुद जनता ही कर सके तो फिर तो वह उम्मीदवार जनता के प्रति वफ़ादार होगा।

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यदि वह उम्मीदवार जनता की कसौटी पर खरा न उतरे तो यह जरूरी है कि मतदाता परिषद अपने नालायक उम्मीदवार को वापिस बुला सके। जब तक संविधान में राइट टू रिकॉल को मान्यता नहीं मिलती तब तक मतदाता परिषद को अपने नैतिक बल से ही यह करना होगा। चुना हुआ प्रतिनिधि यदि अपने कर्तव्य से चूकता हो या फिर अपने नैतिक वादे से भी मुकर जाता हो तो अगले चुनाव में लोगों की बनी मतदाता परिषद के हाथ में यह ताक़त होगी कि वे दूसरे किसी सही व्यक्ति को इस काम के लिए चुने। एक ही दो प्रयोग में संगठित मतदाता को अपनी ताक़त का अहसास होने लगेगा और कोई भी उम्मीदवार भ्रष्ट व्यवहार से बचेगा। महात्मा गांधी, विनोबा भावे, जयप्रकाश नारायण, गोपबंधु चौधरी, रमादेवी, नवकृष्ण चौधरी, मालती देवी ने ग्राम स्वराज स्थापना के लिये ऐसी चुनावी प्रणाली की पैरवी की थी।     

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