कोरोना का कहर झेलते आदिवासी

मनीष भट्ट मनु

पिछले कुछ दिनों से कोविड-19 की दूसरी लहर के हल्की पडने की खबरें आ रही हैं और तमाम सरकारी, गैर-सरकारी लवाजमा अब तीसरी लहर की तैयारी में जुट गया है, लेकिन क्या हमारे सुदूर गांव-देहातों और आदिवासी इलाकों में भी ऐसा ही है? खासकर तब, जब संसाधनों के आभाव में इन इलाकों में ठीक से जांच तक नहीं हो पाई है?

कोविड-19 की दूसरी लहर सरकारी आंकड़ों में भले ही कमजोर पड़ रही हो, इसने भारत के महानगरों और शहरों में तबाही की एक ना भुलाई जा सकने वाली दास्तान छोड़ दी है। ख्यात मेडिकल जर्नल ‘लांसेट’ अगस्त तक इस महामारी के चलते भारत में दस लाख मौतों का अंदेशा जता रहा है। ‘यूनिवर्सिटी ऑफ वॉशिंगटन’ के ‘इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्यूशन’ द्वारा किए गए एक वि‍श्‍लेषण के अनुसार तीन मई 2021 तक इस महामारी के चलते मुल्क में 6,54,395 मौतें हो चुकी हैं जो इसी अवधि के सरकारी आंकड़ों 2,21,181 से कहीं अधिक हैं।

अब कुछ विशेषज्ञ इस महामारी के गांवों में फैलने की बात कह रहे हैं। ग्रामीण स्वास्थ सेवाओं की बदहाल स्थिति के चलते आने वाले दिन और भी बदतर साबित हो सकते हैं, खासतौर से सुदूर आदिवासी इलाकों में। ऐसे में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और इनकी सीमाओं को छूते महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान के आदिवासी अंचलों में महामारी की आहट और सरकारी इंतजामात महज नाउम्मीदी ही जगाते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि टाइफाईड और कोविड-19 के लक्षणों में बहुत ज्यादा फर्क नहीं है। इस वायरस द्वारा जिस प्रकार से अपनी संरचना में लगातार परिवर्तन किया जा रहा है उसमें यह और भी जरुरी हो जाता है कि बिना रिपोर्ट का इंतजार किये डॉक्टरी सलाह से कोविड-19 का उपचार प्रारंभ कर दिया जावे। मध्यप्रदेश के महाकौशल और विंध्य अंचल के साथ ही छत्तीसगढ़ के बिलासपुर संभाग के आदिवासी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर बुखार से लोगों के प्रभावित होने के समाचार हैं। आदिवासी बहुल बस्तर संभाग भी इससे अछूता नहीं है। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली, गोंदिया और अमरावती जिलों में भी इसकी मौजूदगी है। कुछ ऐसा ही हाल राजस्थान के सवाई-माधोपुर और बारां तथा गुजरात के दाहोद और नर्मदा जिलों की मध्यप्रदेश से लगती सीमाओं का भी है। निमाड़ के आदिवासी अंचलों से भी मरीजों की खबरें आ रही हैं।

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मगर, इन अंचलों के आदिवासी क्षेत्रों में किसी भी सरकार ने पर्याप्त चिकित्सीय संसाधन उपलब्ध करवाना जरुरी नहीं समझा। यहां पूरा दारोमदार ‘आशा’ अथवा आंगनबाड़ी कार्यकर्ता पर है, जिनके पास यह जानने का कोई भी साधन नहीं है कि कौन कोविड-19 से ग्रसित है। यहां तक कि चिकित्सक भी ऐसे प्रकरणों में गलफत में पड़ रहे हैं। मध्यप्रदेश के अलीराजपुर जिले की सोंडवा तहसील निवासी बोलसिंह खरत का इलाज भी प्रारंभ में टायफाईड का ही चला। मगर बाद में उन्हें कोविड-19 संक्रमित पाया गया। नाम न जाहिर करने की शर्त पर छिंदवाड़ा जिले के एक पत्रकार भी बताते हैं कि उनके यहां कई ऐसे प्रकरण सामने आए हैं जिनमें लोगों का प्रारंभिक इलाज टाइफाईड के लक्ष्णों के आधार पर किया गया, मगर सीटी स्कैन अथवा आरटी-पीसीआर टेस्ट के बाद उनमें कोविड-19 की पुष्टि हो गई। वे कहते हैं कि ऐसे मरीजों ने कितने अन्य लोगों को संक्रमित किया होगा, इसका अंदाजा लगा पाना मुश्किल है।

मंडला जिले की नारायणगंज तहसील के निवासी मुन्ना बर्मन, सिवनी जिले की घंसौर तहसील के गुलाब झारिया, बालाघाट जिले की लांजी तहसील के आनंद मरावी के अनुसार विगत कई दिनों से उनके क्षेत्र में टाइफाईड, सर्दी, खांसी और जुकाम के मरीजों की संख्या में वृद्धि देखने को मिल रही है। मगर, इसके बाद भी स्वास्थ्य विभाग की ओर से कोई भी आवश्यक कदम नहीं उठाए गए। छत्तीसगढ़ के मरवाही जिला निवासी मनीष धुर्वे, बिलासपुर के यशवंत सिंह कुर्राम और दंतेवाड़ा के मनोज कुंजाम भी अपने यहां टाइफाईड, सर्दी, खांसी और जुकाम के मरीजों की वृद्धि की बात स्वीकारते हैं।

आदिवासी अंचलों में सामाजिक कार्य कर रहे संगठनों और व्यक्तियों का कहना है कि बेहद कम संख्या में हो रही टेस्टिंग भी आरटी-पीसीआर न होकर ‘रैपिड एंटीजन’ पद्धति के माध्यम से की जा रही है। पूर्व में अनेक बार उक्त पद्धति के परिणामों को संदेहास्पद करार दिया जा चुका है। मगर, इसके बाद भी सरकारें गंभीर नहीं हैं। स्वास्थ्य अधिकार पर लंबे समय से काम कर रहे ‘जन स्वास्थ्य अभियान’ (जेएसए) के अमूल्य निधि बताते हैं कि मार्च के दूसरे पखवाड़े और अप्रैल में मध्यप्रदेश के विभिन्न आदिवासी अंचलों में टाइफाईड, सर्दी, खांसी और जुकाम के मरीजों की संख्या में वृद्धि के समाचार आए थे, मगर पर्याप्त संख्या में टेस्टिंग नहीं होने से कुछ भी कह पाना मुश्किल हैं।

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अमूल्य निधि के मुताबिक एक साल गुजर जाने के बाद भी राज्य सरकारें आरटी-पीसीआर की पर्याप्त सुविधा विकसित नहीं कर पाई हैं। ‘इंडियन काऊंसिल आफ मेडिकल रिसर्च’ (आईसीएमआर) के हवाले से वे बतलाते हैं कि मध्यप्रदेश के महज 19 शासकीय और 22 निजी संस्थानों में यह सुविधा है। छत्तीसगढ़, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान में इनकी संख्या क्रमश 11 व छह, 35 व 47, 74 व 112 तथा 40 एवं 28 है।

मुन्ना बर्मन, गुलाब झारिया, आनंद मरावी, मनीष धुर्वे, यषवंत सिंह कुर्राम, मनोज कुंजाम के साथ ही गोंदिया के नीलेश और फिलवक्त गुजरात में सक्रिय अमरनाथ का कहना है कि उनकी जानकारी में इन दिनों सामान्य से अधिक मौतें होने के समाचार आ रहे हैं। मगर टेस्टिंग न होने के चलते यह कह पाना मुष्किल है कि इनका कारण कोविड-19 ही है अथवा कुछ और।

अमूल्य निधि के अनुसार अभी तक इस बाबत कोई शोध नहीं किया गया है कि सिलिकोसिस और टीबी के मरीजों पर कोविड-19 का वायरस किस प्रकार असर डालता है। झाबुआ जिले की मेघनगर तहसील में सक्रिय ‘सिलिकोसिसि पीड़ित संघ’ के दिनेश राय बतलाते हैं कि अप्रैल माह में उनके पास बड़ी संख्या में नागरिकों के टाइफाईड पीड़ित होने के समाचार आए थे। मगर, पर्याप्त टेस्टिंग के अभाव में यह कह पाना मुष्किल है कि उनमें से कितने कोविड-19 से संक्रमित हुए थे। सिंगरौली में कार्यरत एक समाजिक कार्यकर्ता गोपनीयता की शर्त पर कहते हैं कि इस अंचल में एक बड़ी आबादी उत्खनन के चलते प्रदूषण से प्रभावित हैं। सांस लेने में तकलीफ यहां एक आम शिकायत है।

सरकार का सारा जोर टीकाकरण पर होने के बाद भी आदिवासी अंचलों में इसे सफल नहीं कहा जा सकता। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि आदिवासियों में जहां एक ओर यह अफवाह खासी मजबूत है कि टीका लगाने से वे बीमार पड़ जाएंगे, वहीं टीकाकरण होने के बाद हुई मौतों की खबरों ने भी उन्हें डरा दिया है। मुन्ना बर्मन, गुलाब झारिया, हनीफ, नीलेश और मनीष भी यह स्वीकारते हैं कि उनके यहां टीकाकरण के बाद हुई मौतों को लेकर लोग आपस में बात कर रहे हैं।

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अमरनाथ को आशका है कि आदिवासी क्षेत्रों में कोविड-19 के चलते बड़ी संख्या में मौतें हो सकती हैं। वे कहते हैं कि कोविड-19 से हुई मौतों की अधिकांश जानकारी शहरी व अर्ध-शहरी क्षेत्रों से ही आ रही है। गांवों, खासकर आदिवासी अंचलों में न तो कोई सिस्टम है और न ही टेस्टिंग आदि की सुविधाएं। यदि वहां महामारी के चलते मौतें भी हो रही हैं तो उनका पता नहीं चल पा रहा है। शहरों में भी जब इस महामारी से हुई मौतें सरकार द्वारा जारी किए जा रहे आंकड़ों से कहीं अधिक बताई जा रही हैं तो आदिवासी अंचलों का अंदाजा लगाया जा सकता है। अमरनाथ की बात की पुष्टि मनीष भी करते हैं। उनके अनुसार आदिवासी अंचलों में वैसे भी जन्म और मृत्यु सही संख्या में दर्ज नहीं की जाती। ऐसे में आंकड़ों को कम दिखने के लिए सरकार के इशारे पर मौतों का कारण कुछ और दर्ज किया जाने से इंकार नहीं किया जा सकता।(सप्रेस)

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