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हिमालयीय प्राकृतिक असंतुलन की वजह बांधों से बनी झीलों से उत्सर्जित हानिकारक गैसें तो नहीं?

हिमालयीय प्राकृतिक असंतुलन की वजह बांधों से बनी झीलों से उत्सर्जित हानिकारक गैसें तो नहीं?

आईआईटी रूड़की के वैज्ञानिकों ने शुरू किया अध्ययन spsmedia.in वैश्विक स्तर पर हुए अध्ययन में यह साबित हुआ है कि पिछले 20 वर्षों में मीथेन, कार्बन डाई ऑक्साइड के मुकाबले जलवायु परिवर्तन में 86 गुना ज्यादा नुकसान पहुंचा रही है।...

आईआईटी रूड़की के वैज्ञानिकों ने शुरू किया अध्ययन

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वैश्विक स्तर पर हुए अध्ययन में यह साबित हुआ है कि पिछले 20 वर्षों में मीथेन, कार्बन डाई ऑक्साइड के मुकाबले जलवायु परिवर्तन में 86 गुना ज्यादा नुकसान पहुंचा रही है। ऐसे में देशभर में बनी पांच हजार से अधिक झीलों का अध्ययन और मीथेन के उत्सर्जन को कम करने के उपायों को अमल में लाया जाना जरूरी है। गौरतलब है कि मीथेन एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है। इसमें कार्बन डाई ऑक्साइड से 25 गुना ज्यादा वैश्विक ताप बढ़ाने की क्षमता है।

इस संबंध में नेशनल हाईड्रो पावर कॉरपोरशन, नई दिल्ली की ओर से आईआईटी रुड़की और संस्थान के एक स्टार्ट अप इनोवेंट वाटर सोल्यूशन प्राइवेट लिमिटेड को एक प्रोजेक्ट सौंपा गया है। जिसमें प्राकृतिकअसंतुलन की वजह पर रुड़की आईआईटी के वैज्ञानिक शोध कर रहे हैं। जल विद्युत परियोजना के लिए बन रहे बांध और इनसे बनी कई किलोमीटर लंबी झीलों के पानी से उत्सर्जित होने वाली गैसें ग्लोबल वार्मिंग की वजह बन रही हैं। इसके तहत संस्थान के पूर्व वैज्ञानिक डॉ नयन शर्मा, डॉ बीआर गुर्जर बांधों से बनी झीलों से उत्सर्जित होने वाली मीथेन, कार्बन डाईऑक्साइड और नाइट्रस ऑक्साइड की मात्रा और इसके दुष्प्रभाव का अध्ययन कर रहे हैं।

अध्ययन के लिए हिमाचल प्रदेश की रावी नदी पर डलहौजी के पास बने चमेरा डैम को चुना गया है। यहां कई किलोमीटर लंबी झील बनी है। डॉ. नयन शर्मा के अनुसार माइक्रो क्लाइमेट की वजह से उत्तराखंड में टिहरी झील व अन्‍य झीलों में मीथेन और अन्य हानिकारक गैसों के उत्सर्जन से हिमालयीय क्षेत्र को भी नुकसान पहुंच रहा है। इससे तेजी से बर्फ पिघलना, एवलांच आदि की घटनाएं बढ़ रही हैं। लेकिन यह प्रभाव कितना है, इसका अध्ययन के बाद ही आकलन किया जा सकेगा।

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वैज्ञानिक डॉ. नयन शर्मा ने बताया कि वायुमंडल में मौजूद हवा में ऑक्सीजन होती है, लेकिन झील आदि में यह ऑक्सीजन पानी की सतह पर जमा सेडीमेंट तक नहीं पहुंच पाती। इसके कारण यहां बैक्टीरिया पनपने लगते हैं जो मीथेन के साथ ही कार्बन डाई ऑक्साइड और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी हानिकारक गैसें उत्सर्जित करते हैं। 

डॉ. नयन शर्मा ने बताया कि मीथेन उत्सर्जन को रोकने के लिए कई उपाय अमल में लाए जाते हैं। जैसे जम्मू कश्मीर की डल झील में पानी को अन्य जगह पर निकासी करने से इस समस्या को कम किया गया। इसके अलावा कुछ केमिकल का भी प्रयोग किया जाता है। झीलों की तलहटी में जमा सेडीमेंट को कम कर गैसों के उत्सर्जन को रोका जा सकता है।

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