प्रभु जोशी के बिछुड़ने से प्रसारण, साहित्य और संस्कृति की दुनिया को एक और भीषण क्षति

प्रभु जोशी / श्रध्‍दा सुमन

नीरजा जैन

इस कठिन समय में एक के बाद एक महत्वपूर्ण करीबी व्यक्तित्व हमसे बिछुड़ रहे है। यह हमारे समय का सबसे भीषणतम दौर है…। प्रभु जोशी जी का जाना हमारे लिए अपूरणीय व्यक्तिगत पारिवारिक क्षति है। प्रभु जोशी के बिछुड़ने से प्रसारण, साहित्य और संस्कृति की दुनिया को एक और भीषण क्षति है।

मोबाइल की घंटी बजते ही, मैसेज का नोटिफिकेशन मिलते ही, मन आशंकित हो जाता है आजकल। कहीं कोई शोक समाचार ना हो। आज शाम मन फिर व्यथित हो गया । कला, साहित्य, संस्कृति, चित्रकला, पत्रकारिता और सामाजिक सरोकारों की महत्वपूर्ण शख्सियत वरिष्ठ कथाकार प्रभु जोशी जी नहीं रहे। वे कला व साहित्य जगत में रिक्तता छोड़ गए।

कुछ वर्ष पहले तक इंदौर का 4, संवाद नगर उनका निवास स्थान रहा। मैं ब्याह कर जब इस कॉलोनी में आई तो बहुत गर्व होता था कि ऐसे उच्च श्रेणी के कलाकार और इतनी बड़ी हस्तियां आस पड़ोस में रहती हैं । संयोग से मुझे प्रभु जोशी जी के साथ काम करने का मौका भी मिला। जब वे दूरदर्शन, इंदौर के निदेशक थे। तब मैं प्रोग्राम एंकर के रूप में वहां जुड़ी थी। बहुत विशेषज्ञता थी उनकी हर कार्य में और ज्ञान अपार। उनकी खासियत थी कि वे सभी को अत्यंत धैर्यपूर्वक सिखाते भी थे। वे मिनटों में स्क्रिप्ट लिख देते। फिर पूछते। मेरे अक्षर पढ़ तो लोगी? गलत उच्चारण पर हर बार टोकते और सही पिच और टोन जब तक पकड़ में ना आए रिहर्सल करवाते थे।

भाषा शैली, उच्चारण, शब्द चयन यहां तक कि लाइटिंग और कैमरा एंगल पर भी बहुत बारीकी से नजर रखते थे। वे हमेशा प्रोत्साहित करते रहते। अच्छा पढ़ो ,अच्छा सुनो। कई बार ऐसा हुआ कि तुरंत किसी रिकॉर्डिंग के लिए उनका कॉल आ जाता और मैं घर की तमाम व्यस्तताओं के बावजूद उन्हें कभी नकार नहीं पाती थी। एक ही मोहल्‍ले में रहने की वहज से उनके घर पर भी कई बार भेंट हुई। उनका रंग और कूची, कागज और कलम का संसार दिखाते। हमेशा सृजन में व्यस्त रहते। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे, वास्तव में।

सौम्य, सरल, सहज एवं मृदुभाषी व्यक्तित्व के धनी प्रभु जोशी के दुखद निधन से समूचा कला साहित्य, सांस्कृतिक जगत स्तब्ध है। प्रभु जोशी जी के रचनाकर्म से हिंदी कथा साहित्य जगत में उनकी एक गंभीर और आवश्यक उपस्थिति हमेशा बनी रहेंगी। आपकी कहानियां जीवन व समाज का सच कहती है जो इस चकाचौंध भरी दुनिया के विकास के दावों पर सवाल खड़े करती है। आपके लेखन में एक ऐसे सौंदर्य की सृष्टि है जो असुंदर कठोर यथार्थ को भी सुंदर और मर्मस्पर्शी बनाती है।

12 दिसंबर 1950 को देवास मध्यप्रदेश में जन्मे प्रभु जोशी के पांच कथा संग्रह– ‘किस हाथ से’, ‘उत्तम पुरुष’, ‘प्रभु जोशी की लंबी कहानियां’, ‘कमींगाह’, और ‘पितृऋण’ प्रकाशित व चर्चित रहे हैं।

आपकी कहानियों में चित्रकला सहित अन्य कई ललित कलाओं की आवाजाही लगातार बनी रहती है जिसके चलते एक भिन्न तरह का सौंदर्य रूप आपके यहां मिलता है। आपकी कहानियों का मूल स्वर अभाव और संघर्ष से आता है। कहां जाना चाहिए कि अभाव के सौंदर्यबोध को आपकी कहानियां प्रमुखता से रूपायित करती है।

प्रभु जोशी करीब तीन दशक तक नईदुनिया से भी जुड़े रहे। उनके व्यक्तित्व में एक चित्रकार, कहानीकार, संपादक, आकाशवाणी अधिकारी और टेलीफिल्म निर्माता समाहित था। इनके चित्र लिंसिस्टोन तथा हरबर्ट में आस्ट्रेलिया के त्रिनाले में प्रदर्शित हुए थे। प्रभु जोशी को गैलरी फॉर केलिफोर्निया (यूएसए) का जलरंग हेतु थामस मोरान अवार्ड मिला। ट्वेंटी फर्स्ट सैचुरी गैलरी, न्यूयार्क के टॉप सेवैंटी में वे शामिल रहे। वनमाली सृजन पीठ का ‘वनमाली कथा सम्मान’, भारत भवन का चित्रकला तथा मध्य प्रदेश साहित्य परिषद का कथा-कहानी के लिए अखिल भारतीय सम्मान भी उन्हें प्राप्त हुआ। साहित्य के लिए मध्य प्रदेश संस्कृति विभाग द्वारा गजानन माधव मुक्तिबोध फेलोशिप दिया गया था।

बर्लिन में संपन्न जनसंचार के अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धा में उनके ‘आफ्टर आल हाउ लांग’ रेडियो कार्यक्रम को ‘जूरी का विशेष पुरस्कार’ दिया गया था। ‘इम्पैक्ट ऑफ इलेक्ट्रानिक मीडिया ऑन ट्रायबल सोसायटी’ विषय पर किए गए अध्ययन को ‘आडियंस रिसर्च विंग’ का राष्ट्रीय पुरस्कार प्रभु जोशी को मिला था।

इस कठिन समय में एक के बाद एक महत्वपूर्ण करीबी व्यक्तित्व हमसे बिछुड़ रहे है। यह हमारे समय का सबसे भीषणतम दौर है…। प्रभु जोशी जी का जाना हमारे लिए अपूरणीय व्यक्तिगत पारिवारिक क्षति है। प्रभु जोशी के बिछुड़ने से प्रसारण, साहित्य और संस्कृति की दुनिया को एक और भीषण क्षति है।

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