समसामयिक स्थायी स्तम्भ

एक थी ‘घोषित इमरजेंसी’ और एक है ‘अघोषित आपातकाल’!

एक थी ‘घोषित इमरजेंसी’ और एक है ‘अघोषित आपातकाल’!
श्रवण गर्ग

पैंतालीस साल पहले के आपातकाल और आज की राजनीतिक परिस्थितियों के बीच एक और बात को लेकर फ़र्क़ किए जाने की ज़रूरत है। वह यह कि इंदिरा गांधी ने स्वयं को सत्ता में बनाए रखने के लिए सम्पूर्ण राजनीतिक विपक्ष और जे पी समर्थकों को जेलों में डाल दिया था पर आम नागरिक मोटे तौर पर बचे रहे। शायद यह कारण भी रहा हो कि जनता पार्टी सरकार का प्रयोग विफल होने के बाद जब 1980 में फिर से चुनाव हुए तो इंदिरा गांधी और भी बड़े बहुमत के साथ सत्ता में वापस आ गईं। इस समय स्थिति उलट है। विपक्ष जेलों से बाहर है और निशाने पर सिविल सोसाइटी से जुड़े नागरिक और मीडिया के लोग हैं।

राहुल गांधी के लिए ज़रूरी कर दिया गया था कि देश की वर्तमान में हालत पर कोई भी नई टिप्पणी करने या पुरानी को दोहराने से पहले वे उस घोषित ‘इमरजेंसी ’ को सार्वजनिक रूप से ज़लील करें जिसे इंदिरा गांधी ने कोई साढ़े चार दशक पूर्व देश पर थोपा था। राहुल गांधी ने सभी अपने-पराए विपक्षियों को भौचक्क करते हुए ऐसा करके दिखा भी दिया। ज्ञातव्य है कि राहुल बार-बार आरोप लगा रहे हैं कि देश इस समय ‘अघोषित आपातकाल’ से गुजर रहा है। राहुल ने बिना साँस रोके और पानी का घूँट पीए अर्थशास्त्री कौशिक बसु के साथ हुए इंटरव्यू में कह दिया कि उनकी दादी द्वारा 1975 में लगाई गई इमरजेंसी एक गलती थी। राहुल ने पाँच राज्यों में हो रहे चुनावों के ठीक पहले ऐसा कहकर अपने विरोधियों के लिए कुछ और नया सोचने का संकट पैदा कर दिया है।

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कुख्यात ‘इमरजेंसी या आपातकाल’ को लेकर राहुल की स्वीकारोक्ति बड़े साहस का काम है। ऐसा करके उन्होंने उच्च पदों पर बैठे लोगों के लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। वह यूँ कि अब वे भी अपनी कम से कम किसी एक गलती को तो स्वीकार करके खेद व्यक्त करें। और साहस का काम इसलिए कि जून 1975 में जब आपातकाल लगाया गया तब राहुल केवल पाँच साल के थे। उनके पिता राजीव गांधी विदेश से प्रशिक्षण लेकर लौटने के बाद उस एयर इंडिया का विमान चला रहे थे जिसे बेचने के लिए इस समय ख़रीदार तलाशे जा रहे हैं। राजीव की आज के जमाने के नेता-पुत्रों की तरह न तो राजनीति करने में कोई रुचि थी और न ही क्रिकेट की किसी सल्तनत पर क़ब्ज़ा करने में।

राहुल गांधी ने कौशिक बसु के साथ साक्षात्कार में और जो कुछ कहा है वह भी महत्वपूर्ण है। उनके इस मंतव्य का कि वर्तमान का आपातकाल ‘अघोषित’ है, यह अर्थ भी निकाला जा सकता है कि ‘घोषित आपातकाल’ के समाप्त होने की तो अनिश्चितकाल तक प्रतीक्षा की जा सकती है, लेकिन  ‘अघोषित’ कभी समाप्त ही नहीं होता। एक प्रतीक्षा के बाद वह ‘इच्छामृत्यु’ को प्राप्त हो जाता है। ‘महाभारत’ सीरियल वाले भीष्म पितामह की छवि याद करें तो उन्हें मिले ‘इच्छामृत्यु’ के वरदान का स्मरण स्वत: ही हो जाएगा।

राहुल ने दूसरी बात यह कही कि कांग्रेस अगर भाजपा को हरा दे तब भी उससे मुक्त नहीं हो पाएगी। वह इसलिए कि संघ की विचारधारा वाले लोगों का पूरे व्यवस्था-तंत्र पर क़ब्ज़ा हो चुका है। राहुल के मुताबिक़, कांग्रेस ने न तो कभी संस्थागत ढाँचे (institutional framework) पर क़ब्ज़ा करने की कोशिश की और न ही उसके पास ऐसा कर पाने की क्षमता ही रही। राहुल के कथन की पुष्टि इस तरह के आरोपों से हो सकती है कि कांग्रेस की कतिपय भ्रष्ट सरकारों के समय भाजपा से जुड़े लोगों के काम आसानी से हो जाते थे जो कि इस वक़्त उनकी अपनी ही हुकूमतों में नहीं हो पा रहे हैं। राहुल का अभी यह स्वीकार करना बाक़ी है कि संघ समर्थकों ने अपनी शाखाएँ कांग्रेस संगठन के भीतर भी खोल ली हैं और उनके नेतृत्व को अब अंदर से भी चुनौती दी जा रही है।

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पैंतालीस साल पहले के आपातकाल और आज की राजनीतिक परिस्थितियों के बीच एक और बात को लेकर फ़र्क़ किए जाने की ज़रूरत है। वह यह कि इंदिरा गांधी ने स्वयं को सत्ता में बनाए रखने के लिए सम्पूर्ण राजनीतिक विपक्ष और जे पी समर्थकों को जेलों में डाल दिया था पर आम नागरिक मोटे तौर पर बचे रहे। शायद यह कारण भी रहा हो कि जनता पार्टी सरकार का प्रयोग विफल होने के बाद जब 1980 में फिर से चुनाव हुए तो इंदिरा गांधी और भी बड़े बहुमत के साथ सत्ता में वापस आ गईं। इस समय स्थिति उलट है। विपक्ष जेलों से बाहर है और निशाने पर सिविल सोसाइटी से जुड़े नागरिक और मीडिया के लोग हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो ‘देशद्रोह’ अथवा ‘राष्ट्र के ख़िलाफ़ युद्ध ‘ जैसे आरोपों के तहत सबसे ज़्यादा मुक़दमे और गिरफ़्तारियां राजनीतिक कार्यकर्ताओं की होतीं। सरकार के पास यह जानकारी निश्चित रूप से होगी कि इस समय सबसे ज़्यादा नाराज़गी नागरिकों के बीच ही है।

अगर अपनी माँ को कथित तौर पर ‘आपातकाल’ लगाने की सलाह देने वाले संजय गांधी की असमय मौत नहीं हुई होती तो सम्भव है राजीव गांधी को राजनीति में प्रवेश करना ही नहीं पड़ता। राहुल और प्रियंका भी कुछ और कामकाज कर रहे होते। तब देश का नक़्शा भी कुछ अलग ही होता। आपातकाल के दौरान हुई दिल्ली के तुर्कमान गेट की घटना और देश भर में की गई ज़बरिया नसबंदी के प्रयोगों के मद्देनजर यह अनुमान भी लगाया जा सकता है कि संजय गांधी की उपस्थिति में भारत काफ़ी कुछ हिंदू राष्ट्र बन चुका होता। राहुल गांधी को कठघरे में खड़ा करके जो सवाल आज पूछे जा रहे हैं और उन्हें जिनके जवाब देने पड़ रहे हैं, तब वही सवाल किसी और ‘युवा गांधी’ से किए जा रहे होते। कौशिक बसु अगर इस आशय का कोई सवाल राहुल गांधी से अपने इंटरव्यू में कर भी लेते तो निश्चित ही किसी तरह की स्वीकारोक्ति उन्हें प्राप्त नहीं होती और तब उनके साथ देश को भी निराश होना पड़ता। ( सप्रेस)

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लेखक का परिचय

श्रवण गर्ग

करीब चार दशक के पत्रकारीय जीवन में आपका अधिकांश पत्रकारीय जीवन हिन्दी जगत में ही बीता है। आप 1972 से 1977 तक लोकनायक जयप्रकाश नारायण के सानिध्य में रहे। वे बिहार में करीब सालभर जयप्रकाश नारायण के साथ रहे। विभिन्न अखबारों में विभिन्न पदों पर काम किया। जीवन के पत्रकारिता के सफर का प्रारंभिक दौर सर्वोदय प्रेस सर्विस (सप्रेस) से शुरू हुआ उसके बाद सर्वोदय प्रजानीति, आसपास, फायनेंशियल एक्सप्रेस, नईदुनिया, फ्री प्रेस जनरल, एमपी क्रॉनिकल, शनिवार दर्पण, दैनिक भास्कर, दिव्य भास्कर और फिर नईदुनिया के प्रधान सम्पादक पद तक पहुंचा। आजकल स्‍वतंत्र रूप से लेखन कर्म जारी है।

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