समसामयिक

बदलाव को बरकाता वामपंथ

बदलाव को बरकाता वामपंथ

आज के राजनीतिक फलक को देखें तो विकास की मौजूदा अवधारणाओं और उसे लेकर की जाने वाली राजनीति ने भी कम्‍युनिस्‍टों को कमजोर किया है। तरह-तरह के विस्‍थापन-पलायन, जल-जंगल-जमीन की बदहाली और पर्यावरण-प्रदूषण के बुनियादी और सर्वग्राही सवाल आज भी...

राकेश दीवान

आज के राजनीतिक फलक को देखें तो विकास की मौजूदा अवधारणाओं और उसे लेकर की जाने वाली राजनीति ने भी कम्‍युनिस्‍टों को कमजोर किया है। तरह-तरह के विस्‍थापन-पलायन, जल-जंगल-जमीन की बदहाली और पर्यावरण-प्रदूषण के बुनियादी और सर्वग्राही सवाल आज भी वामपंथियों के संघर्षों से दूर हैं। वे आज भी पूंजीवादी विकास को केवल मिलकियत का सवाल भर मानते हैं। यानि उनके लिए बडे बांधों की तकनीक से तब तक कोई असहमति नहीं है, जब तक बांध से होने वाले विस्‍थापन-पुनर्वास, डूब और पर्यावरणीय नुकसानों को काबू में रखा जा सके।

एक दिन पहले दस लाख नौकरियों के वायदे को हवा-हवाई बताकर खिल्‍ली उडाने वाली पार्टी चुनावी घोषणा-पत्र में अगले ही दिन 19 लाख नौकरियों का वायदा करने लगे और चुनाव में फंसे एकमात्र बिहार राज्‍य के हरेक नागरिक को खुल्‍लमखुल्‍ला कोविड-19 महामारी से निपटने के लिए फोकट में वैक्‍सीन उपलब्‍ध करवाने का वायदा कर दे तो इसे भारतीय राजनीति की कौन-सी अदा कहा जाएगा? चुनावों की बेला में बिहार और मध्‍यप्रदेश विधानसभा की 28 सीटों पर अहर्निश हो रहे ऐसे ही राजनीतिक धतकरम आखिर क्‍या दर्शाते हैं? चुनाव में जीतने की हवस में हर दिन लगातार उछाले जा रहे भांति-भांति के गोरखधंधों से क्‍या वोटर यानि नागरिक की घटती हैसियत का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता? क्‍या राजनेताओं और उनकी पार्टियों की नजरों में वोटरों का दर्जा इतना भी नहीं बचा है कि वे उन्‍हें मामूली समझदार, पुचकारे जाने की असलियत समझने वाले और झूठे वायदों पर ठेंगा दिखाने वाले तक नहीं मानते? ऐसा क्‍यों होता है?

देश के राजनीतिक अनुभवों को देखें तो आजादी के बाद से हमारे देश में लोकतंत्र का जो प्रयोग हुआ है उसने नागरिकों की हैसियत सतत गिराई है। अपने आदर्श रूप में लोकतंत्र नागरिकों का, नागरिकों द्वारा, नागरिकों के लिए माना जाता है, लेकिन भारत सरीखे तीसरी दुनिया के देशों में इसे जिस तरह वापरा जाता है उससे नागरिकों की हैसियत धीरे-धीरे कम होते-‍होते समाप्‍त हो जाती है और लोकतंत्र केवल सत्‍ता प्राप्‍त करने का एक नायाब तरीका भर बनकर रह जाता है। दूसरी तरफ, भारत और दक्षिण-एशिया के देशों में व्‍यापक रूप से मौजूद वर्गों, जातियों, रंगों, लिंगों आदि की विविधता केवल लोकतंत्र में ही चलाई, बचाई और बरकरार रखी जा सकती है इसलिए इन देशों में बिना लोकतंत्र के कोई चारा भी नहीं होता। जाहिर है, ऐसे में राजनीतिक पार्टियां किसी-न-किसी तरह लोकतांत्रिक देशों की सत्‍ता पर काबिज हो जाना ही अपना राजनीतिक धर्म मानने लगती हैं और चुनाव एकमात्र राजनीतिक गतिविधि बनते जाते हैं।         

थोडे ध्‍यान और धीरज से देखें तो आसानी से पता चल सकता है कि वोटरों को ठेंगे पर मारने की इस कारस्‍तानी में लगभग सभी पार्टियां एकमत हैं। कुछ साल पहले तक खुद को सामाजिक, सांस्‍कृतिक संगठन कहते हुए ठेठ मुख्‍यधारा की राजनीति में हस्‍तक्षेप करने वाले दक्षिणपंथी ‘राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ’ (आरएसएस) से सिद्धान्‍तों की राजनीति करने की थोडी-बहुत उम्‍मीद थी, लेकिन उसके राजनीतिक मुखौटे ‘भारतीय जनता पार्टी’ के सत्‍ता में आने के बाद उसकी ‘शुचिता’  की पोल भी खुल गई है। अब यह साफ हो गया है कि सत्‍ता के सामने सिद्धांत केवल पानी भर सकते हैं।    

ऐसे में कोई चाहे, न चाहे, आज भी संकट में वामपंथी पार्टियों को गुहार लगाना आम बात है, हालांकि इसमें व्‍यापक रूप से केन्‍द्र और राज्‍यों की सत्‍ता में उसकी अनुपस्थिति भी एक कारण हो सकती है। भारतीय समाज को वामपंथियों के कामकाज का अनुभव देश के केवल तीन राज्‍यों भर का है और यह अजनबियत वामपंथियों के पक्ष में जाती है। भारतीय राजनीति के मौजूदा परिदृष्‍य में सभी को किसी ‘सीधी रीढ’ वाली ऐसी पार्टी की दरकार है जो सत्‍ताकांक्षी पार्टियों से भिन्‍न कामकाज करती हो और ऐसे में अब तक वापरी नहीं गई वामपंथी जमातें ललचाती हैं। देशभर के विशाल राजनीतिक फलक पर ‘धुर दक्षिण,’ ‘मध्‍य,’ ‘बांयी’ और ‘बांयी’ या ‘दायीं’ तरफ हल्‍की-सी झुकी ‘मध्‍य’ वाली राजनीतिक जमातों ने अपने-अपने तौर-तरीकों से देश, प्रदेश में गद्दी संभाली है। बंगाल, त्रिपुरा और केरल की राज्‍य सरकारों पर काबिज रहकर वामपंथी भी इसमें शामिल रहे हैं, लेकिन सत्‍ता संभालने में उनका बर्ताव वैसा नहीं रहा जैसा अन्‍य पार्टियों का।

मसलन – पिछले कुछ सालों से लगातार बाढ झेलता, ‘मार्क्‍सवादी कम्‍युनिस्‍ट पार्टी’ की अगुआई वाले वामपंथी गठबंधन की सरकार वाला राज्‍य केरल सर्वाधिक बेहतरीन तरीकों से कोविड-19 से निपट रहा है। अभी हाल में आए ‘भारतीय रिजर्व बेंक’ (आरबीआई) के मजदूरी के आंकडों ने इस सरकार की बेहतरी की तस्‍दीक कर दी है। वामपंथियों के मजदूरों के प्रति उदार रवैय्ये को उजागर करते हुए बताया गया है कि केरल में कृषि क्षेत्र में दैनिक मजदूरी देशभर में सर्वाधिक, 707.7 रुपए दैनिक और गैर-कृषि क्षेत्र में 670.1 रुपए दैनिक है। इससे बहुत नीचे, देश में दूसरे नंबर पर आने वाला राज्‍य जम्‍मू-कश्‍मीर है जहां इन्‍हीं क्षेत्रों में केरल से बहुत कम, क्रमश: 452.9 रुपए दैनिक और 453 रुपए दैनिक मजदूरी मिलती है। मार्च में कोरोना की चपेट में आने के बाद थोक में हुई मजदूरों की अफरा-तफरी में भी ‘प्रवासियों’ की बजाए ‘अतिथि’ मानकर केरल सरकार ने सभी मजदूरों को उदार मदद उपलब्‍ध करवाई थी। इन तरह-तरह के ईमानदार सामाजिक-राजनीतिक सद्कार्यों के वावजूद, सवाल है कि कम्‍युनिस्‍ट राष्‍ट्रीय राजनीति के फलक पर दिखाई क्‍यों नहीं देते?

इस सवाल का एक जबाव तो अभी हाल में ‘सीपीएम’ द्वारा पार्टी के स्‍थापना वर्ष के भोपाल में हुए कार्यक्रम से समझा जा सकता है। पार्टी के राज्‍य मुख्‍यालय में हुए इस कार्यक्रम में केवल वे और उनके मित्र ही शामिल हुए थे जिन्‍हें 1920 में पार्टी की स्‍थापना पर भरोसा था। ‘कम्‍युनिस्‍ट पार्टी ऑफ इंडिया’ यानि ‘सीपीआई’ इस सहभोज सहित मित्रवत समारोह में इसलिए शामिल नहीं हुई क्‍योंकि उनके मुताबिक पार्टी की स्‍थापना 1925 में हुई थी। इस बेहद मामूली वजह से दोस्‍तों के समारोह से दूरी आखिर क्‍या बताती है? हो सकता है, 1920 और 1925 के सालों में कम्‍युनिस्‍ट पार्टी की स्‍थापना को लेकर गहरा वैचारिक मतभेद हो, लेकिन किसी दोस्‍त और वह भी समानधर्मी, समविचारी दोस्‍तों के मिलन समारोह में छोला-भटूरा खाने तक नहीं जाना क्‍या बताता है? साठ के दशक से शुरु हुई विचार की बजाए पार्टी के प्रति गहन निष्‍ठा की इस राजनीति ने कम्‍युनिस्‍टों को घर-घर में विभाजित और कमजोर कर दिया है।

आज के राजनीतिक फलक को देखें तो विकास की मौजूदा अवधारणाओं और उसे लेकर की जाने वाली राजनीति ने भी कम्‍युनिस्‍टों को कमजोर किया है। तरह-तरह के विस्‍थापन-पलायन, जल-जंगल-जमीन की बदहाली और पर्यावरण-प्रदूषण के बुनियादी और सर्वग्राही सवाल आज भी वामपंथियों के संघर्षों से दूर हैं। वे आज भी पूंजीवादी विकास को केवल मिलकियत का सवाल भर मानते हैं। यानि उनके लिए बडे बांधों की तकनीक से तब तक कोई असहमति नहीं है, जब तक बांध से होने वाले विस्‍थापन-पुनर्वास, डूब और पर्यावरणीय नुकसानों को काबू में रखा जा सके। पूंजीवादी तकनीक सिर्फ विज्ञान नहीं होती, वह भी उतनी ही मानव-विरोधी होती है जितनी पूंजी की दूसरी तमाम हरकतें। इसलिए वर्ग संघर्ष में उस तकनीक का विरोध भी शामिल किया जाना चाहिए जिसके चलते शोषण के अनंत रास्‍ते खुलते, फैलते और बरकरार रहते हैं।

एक जमाने में वामपंथी पार्टियों के ‘परिधि’ के संगठन बेहद सक्रिय रहते थे और उन्‍हीं की मार्फत पार्टी में रंगरूटों की भर्ती की जाती थी। शांति एवं एकजुटता, भारत-रूस मैत्री, साहित्‍य जैसे अनेक मुद्दों पर सक्रिय संगठन रहते थे जिनमें शामिल होने वाला सामान्‍य नागरिक धीरे-धीरे वामपंथी विचारों से अवगत होता जाता था। ऐसे रुचि लेने वाले नौसिखियों के लिए वामपंथी पार्टियों में ‘पार्टी क्‍लास’ होती थी जिनमें विचार और रणनीति की शिक्षा दी जाती थी। भूमंडलीकरण के बाद के दौर में वामपंथी पार्टियों को ऐसे ढांचों की खास जरूरत थी, लेकिन इन्‍हीं दिनों में वे इन सबसे मुंह फेरकर बैठी हैं। पिछले साल ‘शैलेन्‍द्र शैली स्‍मृति व्‍याख्‍यान’ देने भोपाल आए अर्थशास्‍त्री प्रभात पटनायक ने कहा था कि कम्‍युनिस्‍टों को अब गांधी और आंम्‍बेडकर की विरासत भी संभालनी होगी। याद रखिए, इन दोनों को मंजूर करने के पहले खुद और खुद की सोच में कई बुनियादी बदलाव करना जरूरी होगा। क्‍या कॉमरेड इसके लिए तैयार होंगे?

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