क्‍या गौरव करने लायक बचा है, लोकतंत्र?

रितिका गौर

हमारे समय का सर्वग्राही सवाल उस लोकतंत्र से है, जिसका नाम लेकर तरह-तरह के रंगों, झंडों वाली राजनीतिक जमातें सत्‍ता पर चढती-उतरती रहती हैं। क्‍या सचमुच हम जिसे सतत वापरते हैं, वह लोकतंत्र ही है?

दुनिया के लोकतांत्रिक देशों में भारत का सबसे बड़ा होना एक बहुत अहम बात है। गौरतलब है कि भारत में 70 से भी ज़्यादा वर्षो से लोकतंत्र है और हम सब इस लोकतंत्र का एक ज़रूरी हिस्सा हैं। लेकिन इसके बाद भी क्या हम इस लोकतांत्रिक देश में अपनी जिम्मेदारी ठीक तरह से निभा पा रहे हैं? क्या लोकतांत्रिक देश में सरकार को चुनने के अलावा हमारी और कोई जिम्मेदारी नहीं है? क्या सरकार जब गलत रास्ते पर जाने लगे तो उसे सही रास्ते पर लाना हमारी भूमिका का हिस्सा नहीं है?

पिछले कुछ समय से हम देख रहे हैं कि हमारे देश में क्या हो रहा है। अमूमन हम सब जानते हैं कि चीज़ें जैसी होनी चाहिए, वैसी नहीं हो रही हैं। कोरोना महामारी के चलते हमारे देश की व्यवस्था बिगड़ने लगी है। जब हम व्यवस्था के बिगड़ने की बात करते हैं तो हमें इस बात का खास ध्यान रखना चाहिए कि इस पूरे देश की ज़िम्मेदारी सरकार पर है, लेकिन क्या सरकार अपनी ज़िम्मेदारी ठीक तरह से निभा पा रही है? चारों ओर से अलग-अलग समस्याएं हमारे देश को घेर रही हैं और इन परिस्थितियों के बीच सरकार खुद भी कुछ समस्याएं खड़ी कर रही है। हम देख सकते हैं जिस तरह संसद में निर्णय लिए जा रहे हैं वो एक लोकतांत्रिक व्यवस्था के ख़िलाफ़ है। किसानी और किसानों के लिए जो बिल हाल ही में पारित किए गए हैं वे हमारी अपनी चुनी हुई सरकार के बारे में बहुत कुछ कहते हैं। 

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जब देश के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले इतने किसान महामारी के बावजूद अपनी जान की परवाह न करते हुए इन बिलों के विरोध में सड़क पर आए तो उनके ऊपर अत्याचार हुए और उनकी आवाज़ों को दबाने की कोशिशें की गईं। कुछ महीने पहले नागरिकता कानून (सीएए) में संशोधन के विरोध में उठे लाखों लोगों, जिनमें से अधिकांश विद्यार्थी थे, के ऊपर भी अत्याचार करके उनकी आवाज़ें दबाई गयी थीं। पिछले एक साल में हज़ारो-लाखों भारतीयों की आवाजों को दबाया गया है। उन्हें सवाल पूछने से रोका जा रहा है। सरकार का अपने ही देश के लोगों के साथ यह सब करना देश के लोकतंत्र पर एक बड़ा सवाल बनकर खड़ा हुआ है।

खासतौर पर उल्लेखनीय यह भी है कि इस बीच हमारे मीडिया का एक बहुत ज़रूरी भाग अपनी भूमिका निभा रहा है। दिक्कत सिर्फ इतनी है कि मीडिया सिक्के के दूसरी तरफ वहां खड़ा है जहाँ उसे खड़ा नहीं होना चाहिए था। हम जानते हैं कि मीडिया का जनता पर बहुत असर होता है। मीडिया जो भी दिखाता है, बताता है, समझाता है, यह सारी चीज़ें लोगों के मानस पर एक गहरा असर छोड़ जाती हैं। मीडिया के समाज को झकझोरने से जुड़े कई उदाहरण आप जानते ही होंगे। इसका एक ऐतिहासिक उदाहरण है जब सन् 1890 में दो पत्रकारों, जोसेफ पुलित्जर और रैंडोल्फ हर्स्ट के बीच अक्सर एक मुक़ाबला चलता रहता था। ऐसा कई इतिहासकारों का मानना है कि इस मुक़ाबले के चलते ही पुलित्ज़र और हर्स्ट ने खबरों को इतना बड़ा-चढ़ाकर जनता के सामने पेश किया कि उसकी वजह से स्पेनिश-अमेरिकन युद्ध की शुरुआत हो गयी।

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समाज में मीडिया की ताकत का यह इकलौता उदाहरण नहीं है। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि हिटलर ने जितने भी बुरे काम किये, उन सबको रोका जा सकता था, अगर मीडिया ने हिटलर के हिंसक व्यवहार की प्रशंसा न की होती और उसे इतने गौरवान्वित तरीके से जनता के सामने प्रस्तुत न किया होता। हमारे सामने ऐसे और भी कई उदाहरण हैं जिन्हें देखकर हमें समझ आता है कि मीडिया हमारे लोकतंत्र का वो हिस्सा है जो लोगों के अंदर धीरे-धीरे असर करता है और उन्हें बदल देता है।

इतने बड़े बदलाव लाने की ताकत एक ज़िम्मेदारी के साथ आती है, लेकिन सवाल ये खड़ा होता है कि क्या मीडिया अपनी ज़िम्मेदारी निभाता है? कौन देखता और नज़र रखता है इस बात पर की मीडिया अपनी ज़िम्मेदारी ठीक तरीके से निभा रहा है या नहीं? क्या हमारे देश का मीडिया अपनी ज़िम्मेदारी पर ध्यान दे रहा है? इन सवालों के जवाब शायद किसी के पास न हों या सबके जवाब अलग-अलग हों। शायद कहीं-न-कहीं हम सब अपने देश के मीडिया का बदलता स्वरूप देख सकते हैं। मुख्यधारा का मीडिया अभी बहुत से ज़रूरी मुद्दों पर से जनता का ध्यान हटाने की कोशिश में लगा हुआ है। वे ज़रूरी मुद्दे जो हमारे देश के भविष्य को आकार देंगे। ऐसे समय में हमें तय करना है कि आने वाले भविष्य में हम कहाँ खड़ें होंगे? लोकतंत्र शब्द हमें बहुत गौरवान्वित महसूस करने का मौका देता है, लेकिन जब यह केवल एक शब्द भर बनकर रह जाए और इस शब्द के पीछे की अवधारणा को हमारी जिम्मेदार सरकार और मीडिया नकार दे तो फिर हमें अपने लोकतांत्रिक देश पर कैसे गर्व करें? फिर भी एक उम्मीद की जा सकती है कि लोकतांत्रिक देश के नागरिक इस बारे में विचार करेंगे और इस देश को वास्‍तविक रूप से लोकतांत्रिक देश का दर्जा दिला पाएँगे।(सप्रेस)

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