नागरिकों की नाराज़गी शायद इस बात को लेकर ज़्यादा है कि उनके ‘तात्कालिक भय’ अब उन्हें एक ‘स्थायी भयावहता’ में तब्दील होते नज़र आ रहे हैं। बीतने वाले प्रत्येक क्षण के साथ नागरिकों को और ज़्यादा अकेला और निरीह महसूस…
ध्यान से देखें तो आजादी के बाद से ही गांधी और उनके बाद विनोबा ने लगातार हमारे विकास की बातें की हैं। ये बातें सम-सामयिक सत्ता-प्रतिष्ठानों को कभी नहीं सुहाई और नतीजे में अब हम विकास को विनाश की संज्ञा…
विनोबा भावे गांधीजी की परंपरा में आते हैं। विनोबाजी का जीवन अपने आप में त्याग और तपस्या की प्रतिमूर्ति था। उनके ’भूदान आंदोलन’ ने देश के हजारों लोगों को भूमि दिलाकर जीने का साधन उपलब्ध कराया। एक व्यक्ति से संपत्ति…