‘फैशनेबल’ गांधी : टाई-सूट से लंगोट तक

ननाओ राजकुमारी

अपने समय की जरूरतों के मुताबिक विशिष्ट रहन-सहन को फैशन माना जाए तो महात्मा गांधी सर्वाधिक प्रासंगिक दिखाई देते हैं। इंग्लेंड, दक्षिण-अफ्रीका और भारत के अपने भिन्न-भिन्न जीवन काल में वहां की जरूरतों के अनुसार अपना वस्त्र-विन्यास बदलने वाले गांधी इस बात का खास खयाल रखते हैं कि उनके वस्त्रों से किसी तरह का शोषण न होने पाए। खादी को एक आंदोलन की तरह खडा करने वाले गांधी की वस्त्रों के मामले में आखिर क्या खासियत थी?

साधारण-सी लंगोट पहने किसी व्यक्ति को टिकाऊ फैशन का नायक कहा जाना नामी-गिरामी स्तंभकारों की दुनिया में आज बेतुका लग सकता है, लेकिन महात्मा गांधी ने पहनावे में स्वस्थ प्रथाओं को अपना कर आम जन के प्रति एक उदार दर्शन को आगे बढ़ाया और एक पूरे राष्ट्र के पहनावे के तरीके को बदल डाला। गांधी ने अपनी पूरी राजनीतिक और सामाजिक यात्रा के दौरान इस बात का बराबर ख्याल रखा कि उनके कपड़ों में शुचिता हो। रोम विश्वविद्यालय के पीटर गोंसाल्वेस ने अपने एक लेख में ऐसी स्थिति का जिक्र किया है, जहां किसी व्यक्ति की नैतिकता उसके पहनावे और दूसरों के सामने उसके हाव-भाव को प्रभावित करती है।

पहनावे में शुचिता को लेकर गांधी की यात्रा के विभिन्न चरण हैं। गांधी 18 साल की उम्र में जब लंदन गए तो उन्हें लगा कि एक पढ़े-लिखे अंग्रेज की तरह कपड़े पहनना जरूरी है, क्योंकि ऐसे कपड़े पहनने से उन्हें वहां के समाज में उचित सम्मान मिलेगा। गांधी जब 24 साल के एक वकील के रूप में दक्षिण-अफ्रीका पहुंचे तो वहां भी उन्हें एक बैरिस्टर के रूप में उसी सम्मान की अपेक्षा थी जो उन्हें इंग्लैंड में मिला था, लेकिन दक्षिण-अफ्रीकी समाज में रंग-भेद गहरे तक पैठ बनाए हुए था। अंग्रेजी पहनावे से भारतीयों को समाज में सम्मान मिलेगा, गांधी की इस धारणा को यहां तब गहरा धक्का लगा, जब 1893 में उन्हें एक रेलगाड़ी से नीचे फेंक दिया गया, जबकि उनके पास प्रथम श्रेणी का टिकट था और वे यूरोपीय पहनावे में भी थे।

गांधी अपने जीवन के इस मोड़ पर भी इस बात को नहीं समझ पाए कि दक्षिण-अफ्रीका की गोरी सरकार सुशिक्षित भारतीयों और मजदूरी करने वाले भारतीयों के बीच अंतर क्यों नहीं कर पाई। गांधी अपने सामान्य अधिकार के बारे में जागरूक तब हुए, जब पिटाई का शिकार हुए बालासुंदरम नामक एक भारतीय मजदूर से उनकी मुलाकात हुई। उनके अंतःकरण पर इसका गहरा असर हुआ। उन्होंने दक्षिण-अफ्रीका में अपने 21 सालों के प्रवास के दौरान गरीब मजदूरों की पीड़ा को जाना-समझा और तय किया कि उनके लिए उसी तरह के कपड़े पहनना उचित है, जिनसे उनकी प्रतिबद्धताएं प्रदर्शित होती हों। इस तरह उन्होंने सफेद कुर्ता-धोती पहनना शुरू किया।

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गांधी जब 1915 में भारत लौटे तो उन्हें महसूस हुआ कि भारतीय मजदूरों की स्थिति दयनीय है। किसान कच्चा माल पैदा करते थे और उसे इंग्लैंड के लंकाशायर स्थित कपड़ा मिलों को भेज दिया जाता था। वहां से महंगा, तैयार कपड़ा भारत आयात किया जाता था। वही कपड़ा आज के तेजी से बदलते फैशन का मूल आधार तैयार करता है। इस प्रक्रिया में एक तो स्थानीय आबादी काम के अवसर से वंचित रह जाती थी, दूसरे इंग्लैंड भेजे जाने वाले कच्चे माल पर मजदूरों को जो मुनाफा मिलना चाहिए था, वह नहीं मिल पाता था। मजदूरों के मुनाफे का बड़ा हिस्सा अंग्रेज अपने पास रख लेते थे और उन्हें मामूली मजदूरी दे देते थे। इस तरह वे मजदूरों का शोषण करते थे।

गांधी ने 1918 में अपना ‘खादी आंदोलन’ शुरू किया और उन्होंने मजदूरों के शोषण के खिलाफ पूरे देश को उठ खड़ा होने के लिए कहा। गांधी ने प्रत्येक भारतीय से सूत कातने और अपना कपड़ा खुद बुनने का आह्वान किया। गांधी ने खादी को एक राष्ट्रीय कपड़े का दर्जा प्रदान कर दिया और सभी वर्ग के लोग इस अभियान से जुड़ गए। गांधी के लिए खादी एकरूपता, सादगी का प्रतीक थी और इसमें न कोई बड़ा था, न कोई छोटा। तरह-तरह की पृष्ठभूमि के लोगों ने अपने तरीके से अपनी आर्थिक आजादी का ताना-बाना बुना।

‘वोग’ पत्रिका की पूर्व संपादक और एक सामाजिक कार्यकर्ता वंदना तिवारी का मानना है कि भारत में ‘खादी आंदोलन’ तेजी से बदलते फैशन के खिलाफ पहला विद्रोह था, जिसके कारण इंग्लैंड की कपड़ा मिलें ठप हो गईं थीं। गरीबों के प्रति विनम्रता और अपनी एकजुटता दिखाने के लिए गांधी ने खुद लंगोट धारण कर लिया, जो आज उनकी पहचान बन चुकी है। समाज के सबसे गरीब व्यक्ति से जरा भी ऊंची जीवनशैली को स्वीकारना उनके लिए समझ से परे की बात थी।

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अहिंसा और सभी को सम्मान का गांधी का दर्शन आज भी प्रासंगिक है, क्योंकि आधुनिक फैशन उद्योग भी आज उसी तरीके से काम कर रहा है। आज की तारीख में खुदरा ब्रांड्स उत्पादन का काम आपूर्ति श्रृंखलाओं को दिया जाता है, जो विभिन्न देशों के कारखाना श्रमिकों को कम पैसे देकर काम कराते हैं। इन देशों में भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, चीन और थाईलैंड शामिल हैं, जहां श्रमिकों की सुरक्षा करने वाले कानून न के बराबर हैं और गरीबी समाज का एक अभिन्न हिस्सा है। परिधान उद्योग के नियोक्ता अच्छे वेतन, भोजन और बच्चों व महिलाओं के लिए स्कूल और छुट्टी के वादे तो करते हैं, लेकिन वास्तविकता कुछ और ही होती है। कई श्रमिक जिन परिस्थितियों में काम करते हैं, उसे आधुनिक समय की गुलामी ही कहा जा सकता है।

भारत में परिधान बनाने वाले श्रमिकों को 10 से 12 हजार रुपये मिलते हैं, जबकि ‘एशिया फ्लोर वेज अलायंस’ (एएफडब्ल्यूए) ने एक मजदूर की आवश्यक मजदूरी 29,323 रुपये जोड़ी है। चूंकि इस तरह की कई महिला श्रमिक न तो किसी श्रमिक संगठन से जुड़ी होती हैं और न उनके पास कोई लिखित करारनामा ही होता है, लिहाजा अन्यायपूर्ण और अनुचित आचरण के खिलाफ शिकायत करने का उनके पास कोई रास्ता नहीं होता। कई मामलों में तो श्रमिकों को भारत में निर्धारित न्यूनतम-मजदूरी का 10वां हिस्सा ही मिल पाता है, लेकिन फैशन रिटेलर्स को अपनी घटिया श्रम परंपराओं के नाते शायद ही कोई नुकसान उठाना पड़ता है, क्योंकि उपभोक्ता आमतौर पर उन लोगों और प्रक्रियाओं को नजरअंदाज करते हैं, जिनके बनाए कपड़े वे पहनते हैं।

कुछ लोग दावा करते हैं कि टिकाऊ ब्रांड ज्यादातर खर्चीले और समय खपाऊ होते हैं और इस तरह की किसी जीवनशैली को अपनाना समाज के संपन्न वर्ग के लिए उपलब्ध एक विकल्प है। उपभोक्ता उन बड़े ब्रांड के उत्पाद खरीदने को भी न्यायोजित ठहराते हैं, जो अनैतिक रूप से बनाए गए होते हैं और उनके बारे में बताया भी गया रहता है कि ये ब्रांड दूसरों से उत्पादन के काम कराते हैं। इससे उन्हें उत्पाद बनाने के दौरान अपनाई गई अनियमितताओं से अलग करने की सुविधा मिल जाती है।

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आज के समय में परिधानों की शुचिता का गांधी का दर्शन धीमे फैशन के एक आंदोलन का रूप ले रहा है, जहां कपड़ों का उपयोग सामाजिक-आर्थिक हालात सुधारने के लिए होता है। गांधी ने उपभोक्तावाद पर निर्भर बाजार आधारित अर्थव्यवस्था के परिणाम का अंदाजा बहुत पहले ही लगा लिया था। यह अर्थव्यवस्था नैतिक विचारों से आर्थिक नैतिकता को अलग कर देती है और संपत्ति अर्जित करना आदमी का अंतिम लक्ष्य बन जाता है। गांधी ने इसीलिए अपनी जरूरतें कम-से-कम करने की वकालत की थी और इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया था कि आदमी जितना उत्पादन कर सके, उतना ही उपभोग करे।

गांधी ने कहा था, ’’बेहतरीन कपड़ों में कोई सुंदरता नहीं है, अगर वह भूख और दुख देता है।’’ डिजिटलीकरण के युग में इसका संबंध संपन्नता से कम और कर्तव्यनिष्ठा से अधिक है। डिजिटलीकरण ने कम कीमत वाले उन ब्रांड को तलाशने का काम आसान कर दिया है, जिन्हें तैयार करने में श्रमिकों का शोषण नहीं किया जाता। ब्रांड यदि कीमत के बारे में पारदर्शी नहीं होते हैं, तो समाज के पास यह ताकत है कि वह उन्हें जवाबदेह ठहराए और ईमानदार व्यापार प्रथाओं को अपनाने के लिए उन पर दबाव डाले। एक जन-केंद्रित तरीका अपनाया जाना चाहिए, क्योंकि अब लोगों के पास खरीदने के लिए बहुत सारे ब्रांड के विकल्प मौजूद हैं। हम जो कपड़े पहनते हैं, उसे बनाने वालों और उसे बनाने की प्रक्रियाओं के बारे में जानना आज समय की मांग है। (अनुवाद सरोज मिश्र) (सप्रेस)

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