वर्ष 2025 के अंत और 2026 के आरंभ के साथ दुनिया एक गहरे संकट के दौर से गुजर रही है। बढ़ती असमानताएँ, गंभीर होता पर्यावरण संकट, निशस्त्रीकरण में पीछे हटना और एआई–आधारित हथियारों का प्रसार मानवता के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी कर रहा है। ऐसे समय में उम्मीद को बचाए रखना और उसे नए स्रोतों से मजबूत करना सबसे बड़ी आवश्यकता है।
हाल के घटना क्रमों के बीच विश्व की स्थिति कई संदर्भों में बहुत चिंताजनक हो गई है और अमन शान्ति के लिए खतरे बढ़ गए हैं। आर्थिक विषमताएँ भी विश्व स्तर पर बहुत तेजी से बढ़ रही है। पर्यावरण का संकट बहुत गंभीर होता जा रहा है और कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर प्रगति के बजाए पीछे हटने के संकेत मिल रहे हैं। निशस्त्रीकरण के अनेक महत्वपूर्ण मोर्चों पर भी मानवता पीछे हट रही है और महाविनाशक हथियारों के वास्तविक उपयोग की संभावना भी अधिक व्यक्त की जा रही है। शस्त्र उद्योग में एआई और रोबोट तकनीकी का उपयोग तथा अंतरिक्ष में बहुत खतरनाक हथियारों का प्रसार कई नई तरह की आफत बुला रहा है।
मानव जीवन व अन्य तरह के जीवन के बीच तरह-तरह के बढ़ते खतरों के बीच वर्ष 2025 का अंत हुआ है व नए वर्ष 2026 का आरंभ हो रहा है। अन्य वर्षों की तरह हम नए वर्ष के आगमन या स्वागत करने के लिए एकत्र होंगे व खुशियां मनाएगें, ऐसा होना भी चाहिए व आपस में मिलकर खुशियां मनानी और बांटनी चाहिए। पर साथ ही इस हकीकत से इंकार नहीं किया जा सकता है कि दुनिया में कुछ ऐसा हो रहा है जो बहुत चिंताजनक है। जो विद्वान दुनिया के बदलते महत्वपूर्ण संकेतकों का गहराई से अध्ययन करते हैं उनके दिल भारी हैं व वे अनमने मन से ही नए वर्ष की खुशियों में शामिल हो सकेंगे।
फिर भी चाहे स्थितियां कितनी भी विकट हों, हमें उम्मीद बनाई रखनी है क्योंकि उम्मीद बनी रहने से ही जटिल समस्याओं के समाधान में जुटे रहने की निष्ठा भी बनती है और उम्मीद के जिंदा रहने से ही सही चुनौतियों का सामना करने का साहस भी मिलता है। इस स्थिति में एक सवाल यह उठता है कि इस उम्मीद के स्त्रोत क्या हैं और विशेषकर नए वर्ष के अवसर पर यह विचारणीय है कि नए वर्ष में उम्मीद के स्त्रोत हम कहां खोजें या प्राप्तकरें।
दरअसल बात बने-बनाए उम्मीद के स्त्रोत खोज निकालने की नहीं है बल्कि बहुत हद तक बात तो यह है कि उम्मीद के नए स्त्रोतों को हम कैसे बनाएं और बढ़ाएं।
नए वर्ष 2026 में बहुत सार्थक उपलब्धि होगी यदि देश-दुनिया व हम सबके स्तर पर उम्मीद को दो स्त्रोतों को बनाया व बढ़ाया जाए।
इनमें से एक स्तर तो हम सबका स्तर है। एक भली-भांति स्थापित सच्चाई तो यह है कि दुनिया जब भी बेहतर और अधिक सुरक्षित बनेगी तो यह न्याय, समता, सामाजिक सदभावना, अमन-शांति, पर्यावरण, रक्षा व सभी जीवों की रक्षा के आधार पर बनेगी। अतः हमारे स्तर पर,आम लोगों के स्तर पर यह प्रयास निरंतरता से होना चाहिए कि इन जीवन-मूल्यों या सिद्धांतों के आधार पर हम अपना व अपने आस पास का जीवन, अपने मोहल्लों व गांव के जीवन को सुधारने के प्रयास निरंतरता से करते रहें। दरअसल जीवन की रचनात्मकता और सार्थकता की सबसे बड़ी अभिव्यक्ति यही है कि इस बारे में आपसी बातचीत से व अध्ययन-चिन्तन-मनन से एक समझ बन जाए व अपने आस पास के संदर्भ में न्याय, अमन-शांति व पर्यावरण रक्षाका एजेंडा कैसे बन सकताहै व इस समझ के आधार पर, आपस में एकता व सहयोग बनाकर इन उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के प्रयास करते रहें।
इसके साथ यदि एक ऐसा अभियानव शिक्षा कार्यक्रम चल सके कि देश व दुनिया स्तर पर अमन-शांति, न्याय व पर्यावरण रक्षा आधारित एजेंडा किस तरह अपनाया जा सकता है व इस सोच के लिए जनमत तैयार किया जाए तो यह ओरभी बेहतर होगा। इस तरह ऐसे एजेंडे के लिए धीरे-धीरे देश-दुनिया के स्तर पर जनमत मजबूत होता जाएगा।
एक दूसरे स्तर पर इसी दिशा में प्रयास जरूरी हैं व इस स्तर पर जरूरत इस बात की है कि अमन-शांति, पर्यावरण रक्षा व न्याय के लिए अपनी प्रतिबद्वता सिद्ध कर चुके जो प्रमुख विद्वान व विशेषज्ञ हैं, वे भी व्यक्तिगत व सामूहिक स्तर पर,देश-दुनिया के स्तर पर अमन-शांति, न्याय व पर्यावरण रक्षा पर आधारित वैकल्पिक मार्ग तैयार करने में सहायता दें।वे जो कहेंगे, उसे देश व दुनिया के नेतृत्व के लिए उपेक्षित करना कठिन होगा।
इस तरह सामान्य लोगों के स्तर पर व इन विद्वानों के स्तर पर इन दोनों स्तरों पर यदि अमन-शांति, न्याय व पर्यावरण रक्षा के उद्देश्यों को बढ़ाने के प्रयास होंगे तो वे एक-दूसरे के पूरक होंगे व उनसे नए वर्ष में नई उम्मीद उत्पन्न होने से बहुत मदद मिलेगी।(सप्रेस)


