प्रकृति के चितेरे सुंदरलाल बहुगुणाजी के मौन होने पर प्रबुद्धजनों की शब्‍दाजंलियां

प्रकृति के चितेरे, सौम्‍यता, सादगी की मूर्ति सुन्दरलाल बहुगुणा के अवसान पर देशभर से अनेक संस्थाओं, व्‍यक्तियों, संगठनों की ओर से स्‍मृति स्‍वरूप भावांजलि संदेश प्राप्‍त हो रहे हैं। श्री बहुगुणा का देश – दुनिया में फैला विशाल संसार उनकी स्‍मृतियों में डूबा हुआ है। उनका प्रकृति, पर्यावरण और समाज के लिए किया गया योगदान अविस्मरणीय है। पेड़ों, जंगलों और पहाडों को बचाने के लिए वे पर्यावरण संरक्षण के पर्याय बन गए थे। उल्‍लेखनीय है कि 21 मई को देापहर 12.30 बजे चिरनिद्रा में लीन हो गए। सुंदरलाल बहुगुणाजी के दुनिया से अंतिम प्रस्‍थान करने पर देश के कई लब्‍ध प्रतिष्ठित सामाजिक कार्यकर्त्‍ताओं, पत्रकारों, पर्यावरण से सरोकार रखने वाले प्रबुद्ध जनों ने सोशल मीडिया पर जाहिर की गई श्रध्‍दांजलि बतौर ‘शब्‍दाजंलि’ प्रस्‍तुत है।

सुंदरलाल बहुगुणा जी का पर्यावरणीय नजरिया था- जीवनदायी।  

नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेत्री एवं ख्‍यात सामाजिक कार्यकर्त्‍ता सुश्री मेधा पाटकर ने कहा कि  पर्यावरण रक्षा के साथ जीवनरक्षा को समर्पित सुंदरलाल बहुगुणाजी का जीवन कोरोनाग्रस्त होकर समाप्त होना बहुत दुखद घटना है। उनके विचार और आचार आज की परिस्थिति में बेहद जरूरी होते हुए उनकी यात्रा इसी पर्यावरण के विध्वंस से ही खत्म हुई है।

सुश्री पाटकर ने कहा कि सुंदरलालजी पर्यावरण के प्रति प्रेम ही नहीं आदर रखने वाले व्‍यक्तियों में थे। बिशनोई समाज से प्रेरणा लेकर चिपको आंदोलन चलाने वाले बहुगुणाजी आखिरी दम तक सत्याग्रही रहे। वे केवल उत्तराखंड ही नहीं प्रकृति का हर खंड बचाने के संघर्षरत थे। उनकी सात्विकता, नैतिकता और जीवटता उनकी शक्ति थी। टिहरी के साथ गंगा की पूरी नदी घाटियां उध्वस्त न करने देते बहुगुणा जी; लेकिन शासन ने उनके आग्रह को धिक्कारा । वे मानवीयता बचाने के साथ नर्मदा जैसी नदी तथा पर्यावरण बचाने के हर कार्य, आंदोलन के समर्थक थे। उनके  देहांत से  एक बड़ी खाई  पैदा हो गयी है।

‘जीवन की जय, मृत्यु का क्षय’  दर्शन वाले बहुगुणाजी

गोविंद वल्‍लभ पंत कृषि विश्‍वविद्यालय, देहरादून से सम्‍बद्ध रहे डॉ. वीरसिंह ने क‍हा कि पर्यावरण दर्शनिक और मेरे गुरु सुंदरलाल बहुगुणाजी का देहावसान देश और दुनिया के लिए एक अपूरणीय क्षति हैं। जीवन की जय, मृत्यु का क्षय, यह दर्शन उन्होंने दिया था। आज उनके जीवन की जय अपने उत्कर्ष पर पहुंच गई।

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जब तक प्रकृति है, तब तक वे भी हमारी स्मृतियों में रहेंगे

वरिष्‍ठ पत्रकार एवं गांधी विचारक देवप्रिय अवस्‍थी ने कहा कि सुंदरलाल बहुगुणाजी कहीं नहीं गए हैं। बस उस प्रकृति का हिस्सा बन गए हैं जिसके लिए जीवन भर संघर्ष किया। हिमालय दर्शन की यात्रा कभी किसी ने नहीं की, जो हिमालय के प्रति उनकी समझ और प्रेम को दर्शाती है l जब तक प्रकृति है, जंगल हैं, पहाड़ हैं, तब तक वे भी हमारी स्मृतियों में बने रहेंगे।

वे अपने काम में मगन रहे, एक सच्चे गांधीवादी की तरह

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल ने अपने संस्‍मरण साझा करते हुए कहा कि वर्ष 1993 में मैं टिहरी गया था, तब भागीरथी के दूसरे किनारे पर सुंदरलाल जी बहुगुणा टिहरी बांध के ख़िलाफ़ अनशन पर बैठे थे। नदी से कुछ ऊँचाई पर उनकी छोटी-सी कुटिया थी, उसी में वे रह रहे थे। मैं गंगोत्री मार्ग के दूसरी तरफ़ नदी पार कर उनकी कुटिया में मिला था। उस समय तक वे चिपको आंदोलन के कारण देश-विदेश में विख्यात हो चुके थे। उन्होंने और चंडी प्रसाद भट्ट ने इस पर्वतीय इलाक़े की हरियाली को बचाया। वे चुपचाप अपना काम करते रहे, एक सच्चे गांधीवादी की तरह। ऐसे लोग कभी-कभार ही जन्म लेते हैं। चिपको आंदोलन के वक्त उनका नारा बहुत प्रसिध्‍द हुआ था- क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार। मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार।।

पर्यावरण के प्रति ईमानदार सरोकार, गांधीवादी जीवन-शैली से ओतप्रोत व्‍यक्तित्‍व

जाने-माने संपादक, सम्मानित बौद्धिक शख़्सियत एवं महर्षि दयानंद सरस्‍वती विश्‍वविद्यालय, अजमेर के कुलपति श्री ओम थानवी ने लिखा कि सुंदरलाल बहुगुणा सुंदर शख़्सियत थे। छरहरे बदन, रजत दाढ़ी, मृदुभाषा या उनकी पहचान बने सफ़ेद पटके भर के कारण नहीं, पर्यावरण के प्रति ईमानदार सरोकार, गांधीवादी जीवन-शैली, यायावर मन और लेखन के प्रति सतत लगाव के कारण। चिपको आंदोलन से उनका संसार में नाम हुआ। चण्डीप्रसाद भट्ट ने भी उस आंदोलन को जिया। लोगों ने दोनों के बीच दीवार खींचनी चाही। जबकि दोनों का काम बड़ा था। पूरक था।

बहुगुणाजी में भी ग्रामसुलभ विनय बहुत थी। एक दफ़ा जोधपुर आए। खेजड़ली गए। अमृतादेवी और पेड़ों के लिए लड़ने वाली अन्य स्त्रियों की दास्तान सुनी। निस्संकोच बोले — हमारा नाम लिया जाता है; पर असल चिपको आंदोलन तो यहाँ (खेजड़ली) से शुरू होता है। उनका बड़प्पन था। वे स्वाधीनता सेनानी थे। पत्रकार भी थे। हिंदुस्तान के बरसों स्ट्रिंगर रहे। मुझे उनकी बड़े-बड़े अक्षरों वाली पर्वत-रेखा सी ग़ैर-समतल लिखावट बख़ूबी याद है। वे 94 की वय में गए हैं। कोरोना काल में शतायु ही समझिए। उनके जीवन और काम को स्मरण करने का वक़्त है। विदा कहने का नहीं।

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वे नदियों पर बांध न बंधने देने के हिमायती थे

सर्वोदय विचारक रामधीरज भाई ने अपनी अमिट स्‍मृतियों का जिक्र करते हुए कहा कि टिहरी बांध विरोधी आन्दोलन के समय उनके सानिध्य में दो महीने तक रहा। उसके बाद भी अनेक यात्राओं और कार्यक्रमों में हम साथ रहे। सर्व सेवा संघ ( राजघाट वाराणसी ) के साथ भी उनकी अनेक स्मृतियां जुड़ी हुई हैं। वे लंबे समय तक सर्व सेवा संघ परिसर में भी रहे है।

गंगा नदी के प्रति उनकी श्रद्धा,  समझ और समर्पण अदभुत था। वे गंगा के जल को पवित्र और स्वास्थकारी मानते थे । वे दुनिया की  सभी नदियों के जल से गंगा जल को अधिक पवित्र और दैवीय गुण ( औषधि ) वाला मानते थे, वो कहते थे कि गंगा पर कोई बांध नहीं बनना चाहिए और गंगा को अविरल बहने देना चाहिए। गंगा को बचाने के लिए और टिहरी बांध को बनने से रोकने के लिए उन्होंने अथक प्रयास किया, लेकिन विकास की पागल दौड़ में शामिल सरकारों के लिए न तो गंगा नदी का महत्व है,  न पर्यावरण का ही। आज जब दुनिया पर्यावरण के संकट से जूझ रही है तब उनका जाना केवल भारत के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए अपूरणीय क्षति है। 

वे इस धरा के सुंदर-लाल थे

गुजराती विज्ञान महाविद्यालय, इंदौर की प्रोफेसर डॉ.  जयश्री सिक्‍का ने कहा कि वास्तव में वे इस धरा के सुंदर-लाल ही थे। गुणों की खान थे। हमने एक सच्चे पर्यावरण संरक्षक और धरती पुत्र को खो दिया।

तुम्हारी क़ब्र में मैं दफ़्न हूँ, तुम मुझमें ज़िंदा हो

सुंदरलाल बहुगुणा के सुपुत्र राजीव नयन बहुगुणा (वरिष्‍ठ पत्रकार एवं पूर्व सूचना आयुक्‍त, उत्‍तराखंड) ने अपने पिता के देहांत के बाद फेसबुक पर लिखा कि उनकी अनुपस्थिति का आभास मुझे तभी हो रहा है, जब मुझे हितैषियों के फोन आ रहे हैं। लेकिन यह अनुपस्थिति सिर्फ भौतिक और महत्वहीन है ।

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एक बार महामहिम दलाई लामाजी ने, उनके सबसे लंबे 72 दिन के उपवास के समय, 1996 में उन्हें सन्देश भिजवाया – मृत्यु अवश्यम्भावी है, लेकिन देहांत स्वाभाविक होना चाहिए, जैसे कोई परिपक्व फल टहनी से गिरता है।

उनकी प्रवृत्ति के अनुरूप मैं इस राष्ट्रीय महाआपदा में उनके निधन को स्वाभाविक मानता हूं। कैसे ?

एक बार वह बस में बैठ कर गांव आ रहे थे। अधबनी और संकरी सड़क पर बस का अगला एक पहिया सड़क से उतर गया और बस खाई में झूल गयी । यात्रियों में कोलाहल पड़ गया और खिड़कियों से कूदने लगे । जो नहीं कूद पाए उनमें क्रंदन मच गया । किंकर्तव्यविमूढ़ ड्राइवर भी अपनी सीट पर बैठा बिसूरने लगा। तब उन्होंने सबको ढाढस बंधा कर बाहर निकाला, और फिर ड्राइवर को रेस्क्यू करने के बाद स्वयं उतरे।

उन्हें अपनी नियति को आम जन के साथ सम्बद्ध कर ली थी। सम्भवतः इसी लिए महामारी काल मे कलवित होते लाखों भारत वासियों जैसी मृत्यु ही उन्हें रास आयी।

पूरा जीवन कष्ट और संघर्षों में बीता। 9 साल की उम्र में पिता और 16 की वय में मां का साया उठ गया । फिर भी स्वतंत्रता संग्राम में कैद से छूटने के बाद लाहौर पहुंचे, और ग्रेजुएशन किया। लेकिन एक दिन, बल्कि एक पल भी कभी किसी की चाकरी न की।

स्वाधीनता संग्राम में 17 साल की उम्र में पहली बार और स्वाधीन भारत मे 2001 में अंतिम बार ज़ेल गए । इस बीच निरन्तर रेल और ज़ेल यात्रा लगी रही।

यह थपेड़ों का मार्ग उन्होंने स्वयं ही अंगीकार किया । अपने कैरियर के पीक पर 1955 में राजनीति से सन्यास ले लिया, और एक दूरस्थ गांव में झोपड़ी बना कर रहने लगे।

मुझे उनके साथ सर्वाधिक देश – विदेश घूमने का अवसर मिला। अब लंबे समय बाद मैं 13 दिन के लिए अपने कमरे के दरवाजे के बाहर न जाने हेतु आबद्ध हूँ। स्वयं के साथ कुछ वक़्त बिताने का सुनहरी अवसर।

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