उत्तराखंड और हिमाचल : आपदा की आवाजाही

सुरेश भाई

हिमालय और उसके राज्यों की मौजूदा आपदाएं आत्महंता विकास के विकराल नमूने बनते जा रहे हैं। इंसान अपना अंत किस नासमझी से जानबूझकर रचता है इसे देखना-समझना हो तो हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड राज्यों की मौजूदा हालातों का जायजा लिया जा सकता है।

इस बार जितनी देर से बारिश शुरू हुई है, उतनी ही जल्दी जानलेवा आपदा आ गयी है। जुलाई के अंतिम सप्ताह से चारधाम की सड़कें ध्वस्त होने लगी थीं। आवागमन के पैदल रास्ते भी नदी में समा रहे थे। भगवान केदारनाथ इतना क्रोधित हैं कि वे भी स्वीकृति नहीं दे रहे हैं कि लोग बरसात के समय बेवजह यात्रा करें। थोड़ा इंतजार करें, लेकिन मनुष्य ने तो प्रकृति पर पूरी तरह विजय करने की सोची है। वह हर घाटी से लेकर ऊंचे-से-ऊंचे पर्वत पर प्रतिकूल मौसम में भी बिना सोचे-समझे जा रहा है। जहां-जहां मनुष्य के कदम पड़ रहे हैं वहां धरती इतनी संवेदनशील बन गयी है कि अब उसे कोई नहीं बचा सकता।  

ध्यान रहे कि चारधाम बरसात में सुरक्षित नहीं हैं। सुरक्षा के नाम पर जितनी भी घोषणाएं करें, वे मौसम के सामने बौनी पड़ रही हैं। यहां हर साल आपदा का आकार बढ़ता ही जा रहा है। 2013 की ‘केदारनाथ आपदा’ की तरह ही मंदाकिनी नदी में इस बार जल-प्रलय जैसा रूप लोगों ने देखा है। स्थिति इतनी विकराल बन गई थी कि 2 अगस्त तक केदारनाथ पैदल मार्ग पर फंसे लगभग 4000 यात्रियों को रेस्क्यू किया गया, जिसमें से लगभग 700 यात्रियों को ‘हेलीकॉप्टर-सेवा’ से सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया गया।

मन्दाकिनी नदी में जल-स्तर बढ़ने से पैदल मार्ग पर रामवाड़ा में दो पुल और भीम बली में 25 मीटर रास्ता क्षतिग्रस्त होकर बह गया। यहां से केदारनाथ जाने वाले यात्रियों को मुश्किल से बचाया जा सका है। पैदल मार्ग पर फंसे यात्रियों के लिए भोजन और पानी की व्यवस्था राज्य सरकार ने की है। यदि पहले मौसम के अलर्ट पर ऋषिकेश में ही यात्रियों को जाने से रोक देते तो समय और खर्च दोनों को रोका जा सकता था।

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उत्तराखंड और हिमाचल में 22 लोगों की मौतें हो चुकी हैं जिनमें से 16 लोग उत्तराखंड में मलबे में दबकर मरे हैं और पांच लोग लापता हैं। हिमाचल में 6 लोगों की मौत हो गई है और लगभग 53 लोग लापता बताए जा रहे हैं। अब तक वहां पर 300 करोड़ से अधिक के नुकसान का अनुमान लगाया जा रहा है। 2023 की आपदा में भी हिमाचल में 10,000 करोड़ का नुकसान हुआ था और लगभग 500 लोग मारे गए थे। इस बार अभी तक यहां दो पावर प्रोजेक्ट ध्वस्त हो गए हैं जिसके कारण दर्जनों लोग लापता है। आपदा की यह जानलेवा घटना कुल्लू, मंडी और रामपुर में अधिक हुई है।

हिमाचल की 445 सड़कें ठप्प पड़ी हैं जिनको खोलने के लिए राज्य सरकार युद्ध स्तर पर काम कर रही है। सूत्रों का कहना है कि हिमाचल प्रदेश में बाहर से आने वाले पर्यटकों ने आपदा की स्थिति को देखकर अपनी बुकिंग कैंसिल की है जिसके कारण पर्यटन कारोबार पिछले वर्ष की तरह प्रभावित हो गया है। कुल्लू-शिमला की सीमा पर समेजखड में आई बाढ़ में लगभग तीन दर्जन मकान बह गए हैं। यहां 6 बच्चों समेत 36 लोग लापता हैं। सात घंटे में सामान्य से 305 मिलीमीटर ज्यादा बारिश दर्ज की गई है। लगभग 7 पुल बह गए हैं। सतलुज और ब्यास नदियों का जलस्तर खतरे के करीब पहुंचने लगा है। यहां पर श्रीखंड महादेव मार्ग पर करीब 250 लोग फंसे रहे हैं। रामपुर में आई बाढ़ से पांच घर, तीन गाड़ियां, पुल भी बह गये हैं।

शिमला में भी कई जगह भूस्खलन और भू-धंसाव की घटनाएं हो रही हैं। हिमाचल प्रदेश में जल विद्युत परियोजनाएं सबसे अधिक विनाश का कारण बन रही हैं। 2013 की केदारनाथ आपदा के समय भी 24 जल-विद्युत परियोजनाओं ने मंदाकिनी और अलकनंदा घाटी का जन-जीवन बुरी तरह प्रभावित किया था जिसमें हजारों लोग मारे गए थे। इसकी पुनरावृति फिर से देखी जा रही है।

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जिला टिहरी गढ़वाल में बालगंगा और धर्मगंगा पर 26- 27 जुलाई की भीषण बाढ़ ने जो विनाश लीला रची है उसने केदारनाथ आपदा की याद ताजा कर दी है। यहां पर तीर्थ यात्रियों के लिए प्रसिद्ध बूढ़ा-केदारनाथ मंदिर भी है जिसके दोनों तरफ ये नदी बहती है। यहां 20 किमी के क्षेत्र में नदी तटों पर निर्माण कार्यों से एकत्रित मलवे के बहने से पैदा हुए भीषण जल-प्रलय से हजारों हेक्टेयर कृषि भूमि नष्ट हुई है। लोगों के होटल, मकान, गौशालाएं नदी में समा गये हैं।

यहां प्रसिद्ध समाजसेवी स्व०बिहारीलाल द्वारा बड़े बांध के विकल्प के रूप में 50 किलोवाट की एक छोटी पनबिजली परियोजना बनायी गई थी जो पूरी तरह मलवे में दब गई है। इससे आगे भी तीन मेगावाट की एक लघु जलविद्युत योजना भी ध्वस्त हो गई है। क्षेत्र के एक दर्जन पुल जर्जर हो चुके हैं। आवागमन के रास्ते टूट गए हैं। यहां पर तोली गांव में मां और बेटी की भूस्खलन में दबाकर मौत हुई है। इसी के पास तिनगढ़ गांव के घरों में मलबा जमा हुआ है। प्रशासन ने एक इंटर कॉलेज में राहत शिविर लगाया है जहां बाढ़ प्रभावितों को भोजन, पानी, रात्रि विश्राम की व्यवस्था की जा रही है।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी बाढ़ पीड़ितों से मिल रहे हैं और राहत और पुनर्वास का आश्वासन दे रहे हैं, लेकिन इन नदियों के दोनों तरफ पूर्व में आपदा से प्रभावित हुए लोग श्रीनगर, उत्तरकाशी और केदारनाथ की तर्ज पर पुनर्निर्माण की मांग कर रहे हैं। यहां हालात बहुत चिंताजनक हैं। भारी बारिश के चलते डरे हुए माहौल में लोग रात गुजार रहे हैं, लेकिन इस क्षेत्र के पुनर्निर्माण के लिए जिस तरह की न्यूनतम राशि की घोषणाएं अब तक हुई हैं उसके कारण लोगों में रोष है।

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वहीं भिलंगना नदी की सहायक नैलचामी गाड के किनारे बसे हुए जखन्याली नौताड गांव में मिलने वाले एक गदेरे में रात को आई भीषण बाढ़ ने पति-पत्नी और उनके बेटे की जान ले ली। गांव की खेती, पशु और घरों को बुरी तरह नुकसान हुआ है। यहां पर 10 साल पहले भी बाढ़ आई थी। तब छह लोग मारे गए थे। गांव के घर मलबे में दब गये थे। इसके बावजूद शेष गांव के हिस्से को बचाने के प्रयास नहीं होने से वही पुनरावृत्ति हुई है। उत्तरकाशी में भागीरथी और यमुना नदी के उद्गम पर भी भीषण बाढ़ के दृश्य सामने आये हैं, लेकिन बाढ़-नियंत्रण के उपायों पर गंभीरतापूर्ण विचार नहीं हो रहा है।

हिमालय की भौगोलिक संरचना की अनदेखी करके अमल किए जा रहे विकास के तरीके विनाश के रास्ते पर ले जा रहे हैं। हर साल जल-प्रलय की बढती घटनाओं में बह रही मिट्टी, पानी, पत्थर, पेड़, लोग आदि की चिंता बरसात पूरी होने पर समाप्त हो जाती है। इसके बाद धरती-तोड़ विकास अनवरत चलता रहता है। फिर उसकी पुनरावृत्ति होती है जो भोगवादी विलासिता पूर्ण विकास का परिणाम है।(सप्रेस)

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