पेंडुलम (लोलक) के सिद्धांत को लागू करके नई सकारात्मक आदतों के विकास के बारे में सोचे : प्रो. आर्थर इसेनक्राफ्ट

इंदौर, 9 जनवरी। पेंडुलम pendulum के सिद्धांत को नियमित रूप से लागू करके, कोई भी नई सकारात्मक आदतें बना सकता है जो उन्हें व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन दोनों में अच्छी तरह से काम आएगी। विज्ञान शिक्षण के अंतर्गत पेंडुलम (लोलक) की प्रक्रिया आम जनों को दैनिक जीवन में गुरुत्वाकर्षण के कारण, लंबाई, आयतन, द्रव्यमान के लिए मानक, पृथ्वी का आकार, पृथ्वी का घूर्णन, गति का संरक्षण, ऊर्जा का संरक्षण और पृथ्वी का घनत्व जैसे पहलुओं को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलती है। आप लोलक के बारे में चमकदार, रहस्यमय और गहरा सोच सकते हैं।

ये विज्ञान शिक्षण की बातें यूनिवर्सिटी ऑफ मेसाच्यूसेट्स, बोस्टन विश्वविद्यालय, अमेरिका में भौतिक विज्ञान के प्रोफेसर आर्थर इसेनक्राफ्ट Arthur Eisenkraft ने कहीं। वे आज पेंडुलम स्विंग: मॉडल और रूपक विषय पर मुख्य वक्ता बतौर पर बेाल रहे थे। कार्यक्रम का आयोजन Azim Premji University अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी, भोपाल के पब्लिक लेक्चर सीरीज के तहत इंदौर प्रेस क्लब के राजेंद्र माथुर सभागार में किया था।

प्रो. आर्थर ने पॉवर पॉइंट के माध्यम से भौतिक विज्ञान के सिद्धांतों की रेखांकित करते हुए आगे कहा कि गेलिलियो ने जो सिद्धांत विश्व को दिये उसकी चर्चा समाज में आज भी होती है। उनके सामने अंतिम समस्या के रूप में उन्हें गोले से गेंद गिराकर पूर्णत क्षेतिज तल पर क्या अंनत काल तक चलती रहेगी। इस सिद्धांत को आने वाले समय में वैज्ञानिकों ने हल किया।

गैलीलियो ने चर्च में झूमर के झूले को देखा और देखा कि समय अवधि समान रहती है। उनके दिमाग में झूमर पेंडुलम बन जाता है, और पेंडुलम घड़ी बन जाता है और उनके पास उस समय घड़ियां नहीं थीं, इसलिए सवाल यह है कि अरस्तू ने अध्ययन करते समय ऐसा क्यों नहीं किया। शायद इसलिए कि समय काल सही नहीं है और अरस्तू ने शायद देखा कि इसके बारे में कोई नियम नहीं है। इसलिए गैलीलियो ने कहा कि मैं आपको बताता हूं कि दुनिया क्या होनी चाहिए और वास्तव में यह कैसी नहीं है। और यह उस तरह की अंतर्दृष्टि थी, जिसने विज्ञान को प्रगति करने की अनुमति दी।

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उन्होंने न्यूटन के पालने के बारे में भी बात की। एक खिलौना, जो हमें गति का संरक्षण सिखाता है, द्रव्यमान समय की गति पेंडुलम की हर टक्कर के लिए समान होती है। और यह एक बहुत बड़ी बात है क्योंकि विज्ञान में बहुत कम चीजें समान रहती हैं, गति समान रहती है। लोग इसे 1700 के दशक में खेला करते थे, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कब खेलते हैं, एक को दो नहीं, एक को आउट किया जाता था, जब वे टकराते थे और अगर ऐसा कभी नहीं होता है तो प्रकृति हमें कुछ ऐसा बता रही है जिसके बारे में आपको कुछ और पता होना चाहिए।

प्रो. आर्थर के व्याख्या को सुनने के बाद डॉ. ए. के. बजाज ने कहा कि उन तरीकों और परिणामों को ध्यान में रखते हुए हर विद्यार्थियों से पेंडुलम संबंधित प्रयोग कराते थे, परंतु आपके विचार से यह जाना कि इसका विस्तार कितना अच्छा हो सकता है।

क्या वैज्ञानिक आविष्कार का उपयोग धनार्जन में भी किया जा सकता है, के जवाब में प्रो. आर्थर ने कहा कि एक वैज्ञानिक का काम नई-नई खोजें करना होता है और उसमें उसे कुछ धनार्जन भी हो सकता है।

इस मौके पर छात्रों द्वारा पूछे गए विभिन्न प्रश्नों के संतोषजनक जवाब प्रो. आर्थर ने दिये। कार्यक्रम में विशेष रूप से देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ केमिस्ट्री के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ.  अमृत बजाज, डाइट, इंदौर की वंदना पानवलकर, अजीम प्रेमजी फाउंडेशन के सिद्धार्थ कुमार जैन, चंद्रकांत, अर्शदीप, नीरज दुबे, राजीव शर्मा शर्मा विशेष रूप से  उपस्थित थे। 

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कार्यक्रम का संचालन और आभार अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के फाल्गुनी सारंगी ने किया। इस मौके पर  होल्कर कॉलेज की डॉ. निधि परमार, डॉ. संजीदा इकबाल, प्रवीण जोशी, रूपल अजबे, डॉ, सम्यक जैन और अजीज प्रेमजी फाउंडेशन के धार, खरगोन, दमोह, भोपाल के संदर्भ व्‍यक्तियों के अलावा शहर के शिक्षाविद् एवं सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधि बड़ी संख्या में उपस्थित थे।

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