सिर्फ सरकारों के भरोसे प्रकृति-पर्यावरण की रक्षा नहीं हो सकती, उसमें समाज को हाथ बंटाना पड़ता है। यह काम यदि किसी अच्छी, बरसों पुरानी सामाजिक परम्परा की मार्फत होने लगे तो जाहिर है, वे अधिक मजबूत और स्थायी होते हैं।…