सुप्रीम कोर्ट ने अनैतिक क्लिनिकल ट्रायल्स पर कड़ा रुख अपनाया

केंद्र सरकार को चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश

इंदौर, 9 जनवरी 2025: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने देशभर में हो रहे अनैतिक क्लिनिकल ट्रायल्स के मामलों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए केंद्र सरकार को कड़े निर्देश दिए हैं। स्वास्थ्य अधिकार मंच द्वारा वर्ष 2012 में दायर जनहित याचिका पर बुधवार, 8 जनवरी को न्यायमूर्ति ऋषिकेश रॉय और एस.वी.एन. भट्टी की पीठ ने सुनवाई की। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को “न्यू ड्रग एंड क्लिनिकल ट्रायल्स रुल्स 2019” पर आपत्तियाँ और सुझाव देने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है। यह याचिका उन मुद्दों पर केंद्रित है, जो मरीजों की सुरक्षा, उनके अधिकार और क्लिनिकल ट्रायल्स की पारदर्शिता से जुड़े हैं।

मामले की पृष्ठभूमि और याचिकाकर्ताओं की दलीलें

याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि 2013 में क्लिनिकल ट्रायल्स से संबंधित नियम बनाए गए थे, लेकिन उनका कार्यान्वयन कमजोर रहा है। नए नियमों में कई अहम बिंदुओं को नजरअंदाज कर दिया गया है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता संजय पारिख ने बताया कि अनैतिक क्लिनिकल ट्रायल्स के कारण हजारों मरीज गंभीर दुष्प्रभावों का सामना कर रहे हैं। उन्होंने अदालत को यह भी बताया कि 2019 के नियमों में मरीजों को मुआवजा देने, निगरानी तंत्र को मजबूत करने और जांचकर्ताओं की जवाबदेही तय करने जैसे मुद्दे अब भी हल नहीं किए गए हैं। पारिख ने यह भी कहा कि यदि एक प्रभावी निगरानी प्रणाली लागू की जाए और जांचकर्ताओं पर सख्त कार्रवाई हो, तो अनैतिक ट्रायल्स पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जा सकता है।

महत्वपूर्ण आंकड़े और रिपोर्ट

मामले की गंभीरता को समझाते हुए स्वास्थ्य अधिकार मंच ने कई चौंकाने वाले आंकड़े प्रस्तुत किए। वर्ष 2011 में आर्थिक अपराध ब्यूरो (EOW) द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, इंदौर के महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज और महाराजा यशवंतराव अस्पताल में 3307 मरीजों पर 77 क्लिनिकल ट्रायल्स किए गए थे। इन मरीजों को इन ट्रायल्स के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई थी। इन ट्रायल्स से 5.10 करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया गया, लेकिन इसके गंभीर परिणाम सामने आए। इन ट्रायल्स के कारण 32 मरीजों की मृत्यु हो गई और 49 अन्य को गंभीर दुष्प्रभावों का सामना करना पड़ा।

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इसी प्रकार, भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ित भी अनैतिक ट्रायल्स का शिकार बने। इन ट्रायल्स के दौरान 23 मरीजों की मृत्यु हो गई और 22 अन्य गंभीर दुष्प्रभावों से पीड़ित हुए। दुर्भाग्यवश, इन पीड़ितों को अब तक कोई मुआवजा नहीं मिला है, न ही उनके इलाज के लिए कोई सहायता प्रदान की गई है।

स्वास्थ्य अधिकार मंच का रुख

स्वास्थ्य अधिकार मंच के प्रतिनिधि अमूल्य निधि, अमितावा गुह/एस. आर. आज़ाद ने बताया कि अनैतिक क्लिनिकल ट्रायल्स के मामलों में अब तक कई अदालतों के आदेशों का पालन नहीं हुआ है। इसके अतिरिक्त, अपेक्स कमिटी, जिसे नियमित बैठक करनी चाहिए थी, निष्क्रिय बनी हुई है। उन्होंने यह भी कहा कि राजस्थान, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में भी एचपीवी वैक्सीन ट्रायल्स सहित कई अन्य अनैतिक ट्रायल्स के मामले सामने आए हैं।

अगली सुनवाई के निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि 2019 के नियमों पर याचिकाकर्ताओं की आपत्तियों और सुझावों को चार सप्ताह के भीतर दर्ज किया जाए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पीड़ितों को शीघ्र मुआवजा और राहत प्रदान की जाए।

सुनवाई के बाद, पीड़ितों और उनके समर्थन में काम कर रहे संगठनों ने उम्मीद जताई कि सुप्रीम कोर्ट का यह रुख अनैतिक क्लिनिकल ट्रायल्स पर रोक लगाने में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।

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