यह जानने के लिए कोई भारी–भरकम शोध की जरूरत नहीं है कि देशभर की तमाम छोटी-बडी नदियां बदहाल हैं और उनमें से अधिकांश अपने आखिरी दिन गिन रही हैं। सचराचर जगत की जीवनदायिनी नदियां आखिर क्यों इतनी बेहाल हैं? क्या इसकी एक वजह नदियों का समाज से टूटता और लगातार बिगड़ता सम्बंध भी है?
नीर, नारी, नदी के लिए काम करने वाला ‘तरुण भारत संघ’ अब नई तरह की चुनौतियों का सामना कर रहा है। नीर से जो नदियां बनती हैं, वे सब अब बीमार हैं। कुछ नदियां तो मरने की कगार पर हैं तो कुछ ‘आईसीयू’ में भर्ती हैं। कुछ नदियों की ‘डीसिल्टिंग’ के नाम पर चिकित्सा की जा रही है, लेकिन वे स्वस्थ्य नहीं होतीं। नदी की चिकित्सा उसकी गंदगी को हटाकर अविरल धारा में बदलकर की जाती है। इसे ‘ड्रेजिंग’ कहा जाता है। ‘सिल्ट’ या गाद नदी में फेफड़ों की तरह होती है, जो पानी का शुद्धीकरण करती है, उसे सूरज की तीखी गर्मी से बचाकर रखती है। इस ‘सिल्ट’ में नदी के बहुत सारे जीव और जैव-विविधता रहती है। नदी का जीवन केवल जल नहीं होता; जल में जो जैव-विविधता है, वह नदी के जल-चरित्र का निर्माण करती है। जल का चरित्र केवल ‘एचटूओ’ नहीं है, उसमें बहुत बड़ा जीव-जगत समाहित है। इसे सम्मान से समझे बिना नदी को नहीं बचाया जा सकता, लेकिन आजकल नदियों के प्रति इस दृष्टि से कोई काम नहीं करता।
आज लाखों करोड़ों रुपए खर्च हो रहे हैं, नदी के सौंदर्यीकरण के नाम पर और पूरे भारत में यही काम हो रहा है। जौनपुर में गोमती नदी के बीचों – बीच दो घाट बना दिए गए हैं। इसके एक भाग से सरकार जमीन बेचेगी। उससे नदी पर किए गए खर्च से ज्यादा कमाने की इच्छा है, लेकिन नदी तो मर गई, क्योंकि उसका क्षेत्र छोटा हो गया। बारिश आएगी तो यह नदी शहर को डुबो देगी। यह जो नदियों की अविरलता के नाम पर हो रहा है, बहुत ही खतरनाक है। जब यह सब हो जाएगा, तो कोई समझदार सरकार, समझदार नेता – जिनकी आंखों में नदी बहती होगी, जिनकी आंखों में जीव-जन्तुओं और गरीबों के लिए जल होगा – आकर उन्हें हटा देगा। तो अभी जो खर्च बनाने पर हो रहा है, फिर तुड़वाने पर होगा।
इस तरह से नदियों के स्वाभाविक, पर्यावरणीय प्रवाह में व्यवधान डालना उचित नहीं है। व्यवधान की थोड़ी जरूरत तो होती है; लेकिन जिस तरह से आज किया जा रहा है वह नदी के साथ बहुत बड़ा अपराध है। नदी को कहीं भी रोक देते हैं, उसकी धारा को कहीं भी मोड़ देते हैं जो ठीक नहीं होता। ‘तरूण भारत संघ’ ने भी नदी-पुनर्जीवन के लिए काम किया तो नदी को जीवन मिला। जो पानी रुका वह धरती के पेट में गया। नदी को ऐसी जगह रोका जहां से वर्षा का जल सीधा बाहर ना निकल जाए, बल्कि वह धरती के पेट में विविध प्रकार की दरारों को जान-समझकर नीचे चला जाए। उसको सूरज ‘चोरी’ ना कर सके, इस जल का वाष्पीकरण ना हो, बल्कि वह धरती के पेट में जाकर उसके भूजल भंडार को भर दे। ऐसे कार्य से ही 23 नदियां पुनर्जीवित हुई हैं।
आज भी नारा वही ‘नदी पुनर्जीवन’ का ही है, लेकिन ऐसे कार्यों को देखकर चिंता बढ़ती है। हम जानते हैं कि सरकार का जो भी संदेश है, वह नदियों को अच्छा करने का ही है, लेकिन यह अच्छा हो नहीं रहा है। इस बात को ना तो कोई बोल रहा है और ना सरकार बोलने देना चाहती है। सरकार को इस काम का स्वतः अध्ययन करवाना चाहिए। अभी जो अध्ययन होते हैं, वे उन इंजीनियरों द्वारा करवाए जाते हैं जो नदी के पानी की केवल नाप-तोल जानते हैं, उनसे नहीं जो नदियों के सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, राजनीतिक और आर्थिक प्रवाहों को जानते हैं। नतीजे में जो रिपोर्ट आती है उसके आधार पर गलत काम होते हैं। ऐसे अध्ययनों के लिए स्व. प्रोफेसर जीडी अग्रवाल जैसे व्यक्ति होने चाहिए जिनके मन में ना कोई लालच था, ना लोभ। जो सच्ची बात है, उसे बिना डरे कह देते थे। ऐसे लोग अभी भी हैं, लेकिन उन लोगों को सरकार यह काम नहीं देना चाहती, क्योंकि उनसे सरकार को डर लगता है। भय का यह वातावरण अच्छे लोगों को नदियों से काट रहा है, जो लोग नदियों की आवाज बनना चाहते हैं, वो नहीं बन पा रहे हैं।
माना जाता है कि हमारी चुनी गई सरकार अच्छी ही होगी, लेकिन यदि वह अपने ही लोगों को डराएगी और अपने लोगों की सच्चाई का सम्मान नहीं करेगी तो देश का और नदियों का बहुत नुकसान होगा। इसलिए अब समय आ गया है कि नदी को जानने-समझने वाले लोगों से पर्यावरणीय अध्ययन कराके नदियों को बचाया जाए। नदियों पर जो फिजूल का बेतुका खर्च हो रहा है, उससे नदियों सहित पूरे पर्यावरण को नुकसान होता है। इस संकट से बचने के लिए जरूरी है कि सरकार नदी-पुनर्जीवन के नाम पर जो कर रही है, उसका स्वतंत्र लोगों से अध्ययन कराए और उसके आधार पर उसमें लगे।
नदियों के सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक पहलुओं पर काका कालेलकर ने बहुत अच्छा लिखा है। गांधीजी ने नेहरू को ‘आनंद भवन’ में समझाया था कि गंगा, यमुना मेरे लिए नहीं, बल्कि राज, समाज, संत, महाजन सबकी साझी है, इसलिए जरूरी है कि इस जल का सब सदुपयोग कर सकें। सुबह-सुबह मुंह धोते वक्त एक लोटा पानी से ज्यादा खर्च होने पर गांधी अफसोस करते हैं। यह घटना 20 दिसंबर 1932 की है जब महात्मा गांधी, नेहरू से कह रहे हैं कि नदियां सबकी हैं, सबके लिए हैं और सबको मिलकर ही इनका ठीक से ध्यान रखना होगा। गांधी खुद अपने को दोषी मानते हैं कि गंगा का एक लोटा से ज्यादा पानी यदि मैं मुंह धोने में खर्च किया तो यह मेरी गलती है। महात्मा गांधी जैसे लोग गलती स्वीकार लेते हैं, पर सरकार का मामूली कारिंदा अपनी गलती मानने को तैयार नहीं है। ऐसे में नीर, नारी, नदी और नारायण कैसे बचेंगे। जो देश यह नहीं मानता, वह कैसे अपनी नदियों को नारायण मानकर, उनकी रक्षा-सुरक्षा ठीक करेगा। इस व्यवस्था को ठीक करने के लिए हमें विचार करना होगा।
सोचना होगा कि हम कैसे नदियों के साथ सद्व्यवहार करें। जो देश अपनी नदियों को नाले में बदलता है, उस देश की सभ्यता और संस्कृति गिरने लगती है। जो देश नालों को नदी बनाता है, वह देश सदाचारी और अपने व्यवहार से अपनी संस्कृति – सभ्यता को पुनर्जीवित करके, ऊंचाइयों पर पहुंच जाता है। हम अपनी नदियों की चिंता करें। यदि यह नहीं करेंगे तो हमारा जीवन और हमारी नदियां दोनों ही संकट में होंगी। इससे हमारी संस्कृति और सभ्यता को भी ग्रहण लगेगा। हम अपनी सभ्यताओं को ऊंचाई पर लेकर जाना चाहते हैं तो नदियों को गंदा नाला ना बनने दें, अपनी नदियों को सूखने और मरने से बचाएं। (सप्रेस)


