झुलसती धरती : संवेदनशीलता ही इस धरती को बचा सकती है

चैतन्य नागर

हमारे इस्तेमालवादी असंवेदनशील रवैये ने इस धरती का जितना नुकसान किया है, उतना शायद ही किसी आकस्मिक आपदा ने किया हो। गौरतलब है कि महान वैज्ञानिक स्टीवन हॉकिंग इंसान की हिंसक और आक्रामक प्रकृति को ही धरती के विनाश का सबसे बड़ा कारण मानते थे| और जैसा कि एक नवम्बर को अपने उद्घाटन भाषण में प्रकृति प्रेमी और एक्टिविस्ट डेविड एटेनबोरो ने कहा कि क्लाइमेट चेंज की वजह से जो दुर्दशा हुई है वह बस इसलिए है कि हम आदतन एक वृहत्तर तस्वीर को नहीं देख पाते| तुरंत मिलने वाले फायदे के पीछे भागते हैं|

हाल ही में ग्लासगो में 31 अक्टूबर से 12 नवंबर तक आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (कोप-26) शिखर सम्मेलन का मकसद पेरिस समझौते और जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन के लक्ष्यों की दिशा में कार्रवाई में तेजी लाने के लिए देशों को एक साथ लाना रहा| धरती पर लगातार बढ़ते कार्बन उत्सर्जन, असंतुलित विकास की बढती मांग और गर्म होती धरती के दर्द पर इस शिखर वार्ता में दुनिया के 180 देशों के करीब 30000 नुमाइंदों ने हिस्‍सेदारी की, जिनमें राष्ट्र प्रमुख, मंत्री, सचिव, पर्यावरणविद और वैज्ञानिक और मीडिया के प्रतिनिधि शामिल थे।  कई पहलुओं से इन मुद्दों पर गहन विचार विमर्श किया गया। उनके बहुराष्ट्रीय प्रयासों के पीछे छिपी है एक आखिरी उम्मीद; सबसे कीमती अवसर है यह कि जलवायु में होने वाले बदलाव को, गर्म होती धरती के दुष्परिणामों को रोकने के उपायों पर वे सभी सहमत हो जायेंगें।

हालात बहुत बुरे हैं| कहीं बारिश रुकती ही नहीं, और कहीं पीने के पानी की बूंद भी नहीं मिलती| पर्वत थर्रा कर अपनी जगह से सरक रहे हैं, समुद्रों का पानी बढ़ रहा है| सैकड़ों की संख्या में पशु पक्षियों की प्रजातियाँ रोज़ गायब होती जा रही हैं| ये बातें सूचना और ज्ञान के रूप में हम पहले ही जानते हैं। सिर्फ एक अद्भुत वस्तु जिसकी सुरभि हमने खो दी है वह है संवेदनशीलता। संवेदनशीलता ही इस धरती को बचा सकती है और इसपर लगातार पड़ते जा रहे कार्बन में लिपटे हमारे क़दमों के निशान मिटा सकती है। हमारे इस्तेमालवादी असंवेदनशील रवैये ने इस धरती का जितना नुकसान किया है, उतना शायद ही किसी आकस्मिक आपदा ने किया हो। गौरतलब है कि महान वैज्ञानिक स्टीवन हॉकिंग इंसान की हिंसक और आक्रामक प्रकृति को ही धरती के विनाश का सबसे बड़ा कारण मानते थे| और जैसा कि एक नवम्बर को अपने उद्घाटन भाषण में प्रकृति प्रेमी और एक्टिविस्ट डेविड एटेनबोरो ने कहा कि क्लाइमेट चेंज की वजह से जो दुर्दशा हुई है वह बस इसलिए है कि हम आदतन एक वृहत्तर तस्वीर को नहीं देख पाते| तुरंत मिलने वाले फायदे के पीछे भागते हैं|  

चेन्नई इन दिनों फिर से बाढ़ से आतंकित हो रहा है| बरसों बाद इस साल अक्टूबर से ही हल्की ठंड शुरू हो गई है| कैलिफ़ोर्निया के जंगलों की आग, भारत में पहाड़ों पर बड़े पैमाने में भूस्खलन! कुदरत के मिजाज के बारे में अब कुछ भी कहना अब मुश्किल लगता है। नेपाल में आये भूकम्प की यादें अभी भी ताज़ा हैं। क्या धरती के सामने खड़ा विराट संकट दर्शा रहा है कि हम कहीं भी रह रहे हों, किसी भी देश और धर्म से जुड़े हों, हमारे गहरे अंतर्संबंध हैं| भौगोलिक दूरी एक भ्रम साबित हो रही है| क्या क्लाइमेट चेंज हमें कोविड-19 की तरह बता रहा है कि हम ही विश्व हैं, व्यक्ति और समष्टि के बीच का फर्क बस एक भ्रम है| कहीं दूर उठी सुनामी, किसी और देश में हडकंप मचा देती है; नेपाल के पोखरा में उठा जलजला पटना में हमारी चाय की प्याली को झकझोर कर रख देता है। इंसान की बनायी सरहदें कृत्रिम और सियासी हैं। कुदरत उनका सम्मान नहीं करती|  

शायद ही कुछ लोग इस बात को न जानते हों कि ग्लोबल वॉर्मिंग से धरती की सतह का औसत तापमान बढ़ जाता है। ग्रीनहाउस गैसें धरती के वातावरण में को एक बड़े चादर की तरह ढंक लेती हैं और सूर्य से आने वाली ऊष्मा उसमें कैद हो जाती है जिसके कारण धरती गर्म होती जाती है। ये ग्रीन हाउस गैसें ही धरती की सतह के तापमान को इस स्तर पर बनाये रखती हैं कि उस पर जीवन संभव हो सके पर इनके स्तर में बढ़ोत्तरी के कारण इनका उत्सर्जन बढ़ता जाता है और तापमान आवश्यकता से अधिक बढ़ जाता है। प्राकृतिक गैस, पेट्रोल आदि के जलने से भी तापमान में भरी वृद्धि होती है। सन् 1700 में उद्योगों की स्थापना के साथ ही हमने कोयला और पेट्रोल वगैरह का उपयोग बड़े पैमाने पर शुरू किया है। पिछले 80000 वर्षों में कभी भी वातावरण में इतनी अधिक मात्रा में कार्बन डाइ ऑक्साइड नहीं रही है।

See also  वैश्विक पर्यावरण : जलवायु परिवर्तन से बढ़ेंगे चक्रवात

अमेरिकी दुनिया की आबादी का सिर्फ चार फीसदी हैं पर ईंधन के उपयोग के कारण दुनिया में 25 फ़ीसदी प्रदूषण को जन्म देते हैं। तापमान में वृद्धि के कारण 1870 के बाद से समुद्र के स्तर में करीब आठ इंच की वृद्धि हुई है। ग्लेशियर्स या हिमखंड पिघले हैं, नदियों और झीलों पर बर्फ पहले की तुलना में जल्दी पिघल रही है, पेड़ पौधे और पशु पक्षियों ने अपने स्थान बदल दिए हैं और वृक्षों पर समय से पहले फल फूल आने शुरू हो गए हैं। अमेरिका में पिछले पचास वर्षों में तापमान दो डिग्री बढ़ा है। कनाडा में इस साल तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा हो गया|  भारत के सुदंरबन इलाके में ग्लोबल वार्मिंग का असर बहुत पहले से नजर आने लगा है। इसकी वजह से बंगाल की खाड़ी का जलस्तर बढ़ने के कारण इलाके के कई द्वीप पानी में समा चुके हैं और दूसरों पर इसका खतरा मंडरा रहा है। बदलते मौसम का असर सुंदरबन के मैंग्रोव जंगल पर भी हो रहा है। मौसम के इस तेजी से बदलते मिजाज की वजह से देश की कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंच रहा है। पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में इस जंगल की भूमिका बेहद अहम है। जलवायु परिवर्तन के मुख्य प्रभाव हैं बढ़ता हुआ अधिकतम तापमान, बढ़ता हुआ न्यूनतम तापमान, समुद्र के स्तर में वृद्धि, समुद्र के तापमान में वृद्धि, ज्यादा बारिश होना, हिमखंडों का सिकुड़ना, परमाफ्रॉस्ट (सदियों से अन्टार्क्टिका में जमी कई किमी ऊंची बर्फ) का पिघलना|

हाल के वर्षों में पर्वतों का अंधाधुंध शोषण भी देखा गया। विकास और पर्यटन के नाम पर पहाड़ों को निचोड़ लिया जा रहा है। कुदरत ने हर वस्तु हमे मुफ्त दी है और हमने हर चीज़ को खरीदने और बेचने वाले ‘माल’ में तब्दील कर दिया है। पेड़ पौधों, खूबसूरत पशु पक्षियों और फल फूलों से बिछी इस धरती को हमने एक विशाल मंडी में बदल दिया| और इसका परिणाम हम भुगत रहे हैं| जितना नाश हमने धरती का खुद किया है, उतना प्रकृति के प्रकोप से नहीं हुआ। हमारी त्वचा की बाहरी सतह ने हमारी एक झूठी सीमा परिभाषित कर दी है, और हम समझने लगे हैं कि हम अलग हैं।

समूची मानवता की कल्पना एक विराट भूखे दैत्याकार मानव के रूप में करें, और उस दैत्य के रोज़ के मेन्यू को देखें। उसके ‘ब्रेकफास्ट’ में जंगल, ‘लंच’ में पर्वत और ‘डिनर’ में समुद्र होता है। बीच-बीच में ‘स्नैक्स’ के नाम पर पशु-पक्षियों की अगिनत प्रजातियाँ उसके उदर में समाती जा रही हैं। बौद्ध भिक्खु थिच नात हान्ह का एक कीमती वाक्य याद आ रहा है: “असली चमत्कार इस बात में नहीं कि आप नंगे पाँव पानी पर चल पा रहे हैं; वास्तविक चमत्कार तो इसमें है कि इस धरती पर हम साथ-साथ शांति के साथ चलें।” एक बार ईमानदारी के साथ बस हम पूछ लें कि कैसे चलें इस धरती पर कि हमारे स्वार्थी कार्बन में सने पदचिन्ह इसे मैला न करें, कैसे चलें कि हमारे बच्चों के मार्ग साफ़ सुथरे बने रहें|

See also  जलवायु परिवर्तन से सर्वाधिक प्रभावित हो रहे हाशिए के समुदाय

शिखर सम्मेलन की शुरुआत में प्रकृति प्रेमी और एक्टिविस्ट डेविड एटेनबोरो ने अंत की और फिसलती धरती की एक वास्तववादी तस्वीर भी पेश की और साथ ही यह उम्मीद भी जताई कि भविष्य की कोई काल्पनिक पीढ़ी नहीं, बल्कि जो पीढी फिलहाल मौजूद है, वह हमारी हार और विफलता को जीत में तब्दील कर के दिखाएगी| और इसी बीच स्वीडन की पर्यावरण एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग ने ट्विटर पर लिखा, “समय समाप्त हो रहा है| ग्लासगो जैसे सम्मेलनों से परिवर्तन तब तक नहीं आएगा जब तक कि इन पर बाहर से कोई बड़ा सार्वजनिक दबाव न हो|  लंदन में एक रैली में इको-एक्टिविस्ट ने कहा कि ग्लासगो शिखर सम्मेलन में भाग लेने वाले विश्व नेता केवल जलवायु परिवर्तन को गंभीरता से लेने का नाटक कर रहे हैं| क्या ग्रेटा यह नहीं बता रही कि उसकी पीढी जिस पर डेविड एटेनबोरो इतना गहरा और मासूम भरोसा जता रहे हैं, क्या सोचती है? 

Table of Contents

सागर से अंतरिक्ष तक : रक्षा विमर्श को नई दिशा देती शोधपरक कृति

भारत की सुरक्षा, संप्रभुता और वैश्विक प्रतिष्ठा से जुड़ा रक्षा विमर्श केवल सैन्य शक्ति का वर्णन नहीं, बल्कि राष्ट्र की सामरिक चेतना का दर्पण होता है। ऐसे समय में वरिष्ठ पत्रकार योगेश कुमार गोयल की पुस्तक ‘सागर से अंतरिक्ष तक:

Read More »

अपने जैसा ‘एआई’

‘आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस’ उर्फ ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ के कसीदे बांचते हुए हम अक्सर इस मामूली सी बात को भूल जाते हैं कि ‘एआई’ आखिरकार एक व्यक्ति और समाज की तरह हमारा ही प्रतिरूप है। यानि हम उस मशीन में जैसा और जितना

Read More »

मध्यप्रदेश का बजट : ग्रीन फ्रेमवर्क का दावा, जलवायु संकट की अनदेखी

हाल के मध्यप्रदेश के बजट में तरह-तरह की लोक-लुभावन घोषणाओं के बावजूद पर्यावरण-प्रदूषण से निपटने की कोई तजबीज जाहिर नहीं हुई है। यहां तक कि पर्यावरण के लिए आवंटित राशि भी पिछले साल के मुकाबले घटा दी गई है। आखिर

Read More »