विद्युत सुधार : निजीकरण के सौ बहाने

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करीब दो दशक पहले ‘टाटाराव कमेटी’ ने घाटे में चल रहे ‘मध्यप्रदेश विद्युत मंडल’ को ‘मध्यप्रदेश विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड’ में तब्दील करके दावा किया था कि अब इसके अंतर्गत बनी ‘मध्यक्षेत्र,’ ‘पूर्व क्षेत्र’ और ‘पश्चिम क्षेत्र’ की तीन कंपनियां न सिर्फ उपभोक्ताओं को सस्ती,आसान बिजली उपलब्ध करवाएंगी, बल्कि विद्युत मंडल को भी घाटे से खींच लाएंगी। आज इस दावे के ठीक उलट, न तो उपभोक्ता खुश है और न ही बिजली कंपनी घाटे से उबर पा रही हैं। इसमें सिर्फ निजी क्षेत्र की बिजली कंपनियां मुनाफा कूट रही हैं।


मध्यप्रदेश सरकार भविष्य की जरूरतों के लिए निजी कंपनियों से 25 वर्षों के लिए, चार हजार मेगावाट बिजली, 5.83 रुपए प्रति यूनिट की दर से खरीदी समझौता करने की तैयारी कर रही है। इसकी अंतिम मंजूरी के लिए ‘मध्यप्रदेश विद्युत नियामक आयोग’ को प्रस्ताव भेजा गया है। जानकार बताते हैं कि यदि प्रस्तावित दर को मंजूरी मिली तो प्रदेश को 25 साल में एक लाख करोड़ रुपए से अधिक का भुगतान करना होगा, जिसका भार उपभोक्ताओं पर पडेगा।

‘मध्यप्रदेश विद्युत मंडल’ के पूर्व अतिरिक्त मुख्य अभियंता राजेन्द्र अग्रवाल ने प्रस्तावित बिजली खरीदी पर ‘विद्युत नियामक आयोग’ के समक्ष आपत्ति दर्ज कराई है। उन्होंने कहा है कि इस वर्ष कोयले पर सरचार्ज की समाप्ति, ‘जीएसटी’ दर में कमी और पर्यावरण मंत्रालय द्वारा थर्मल पावर प्लांट में लगने वाले ‘फ्लू गैस डिसल्फराइजेशन’ (एफजीडी प्रणाली में उत्सर्जन से सल्फर यौगिकों को हटाया जाता है) तकनीक की अनिवार्यता के खत्म होने को बिजली खरीदी समझौते में शामिल नहीं किया गया है। अग्रवाल ने आयोग से मांग की है कि बिजली खरीदी प्रस्ताव व संबंधित पूंजीगत लागत की गहन समीक्षा के बाद ही प्रस्ताव को मंजूरी दें।

मध्यप्रदेश में बिजली की उपलब्धता और खरीदी एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। प्रस्तावित बिजली खरीदी और निजी कंपनियों से हुए महंगे बिजली खरीदी समझौतों को लेकर उपभोक्ताओं की परेशानी लगातार बढ़ती जा रही है। बिजली दरों में बढ़ोतरी और ‘डिस्कॉम’ (विद्युत वितरण कंपनी) पर बढ़ते वित्तीय दबाव ने राज्य में ऊर्जा प्रबंधन को नई बहस के केंद्र में ला दिया है। ऊंचे दामों पर की जा रही बिजली खरीदी से न सिर्फ घरेलू उपभोक्ताओं पर बोझ बढ़ा है, बल्कि उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता भी प्रभावित हो रही है।

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राज्य में पिछले कुछ वर्षों से बिजली दरों में लगातार बढ़ोतरी और बिलों में अनियमितताएं आम उपभोक्ताओं, किसानों और छोटे व्यवसायी के लिए बड़ी समस्या बन चुकी है। बिजली खरीद नीतियों, निजी कंपनियों से महंगे समझौतों और ‘डिस्कॉम’ की अक्षमताओं (लाइन लॉस, बिजली चोरी, प्रबंधन की कमियां और पुराना घाटा) का बोझ सीधे जनता पर पड़ रहा है। बिजली बिल में एनर्जी चार्ज, फिक्स चार्ज, फ्यूल कॉस्ट, ड्यूटी चार्ज जुड़ते हैं। बिजली की दरों में वृद्धि के अनुपात में ही बाकी सारे चार्ज बढ़ते-घटते हैं।

मध्यप्रदेश में निजी बिजली कंपनियों से महंगी दरों पर बिजली खरीदी का मुद्दा विभिन्न ‘कैग’ (सीएजी) रिपोर्टों, अध्ययनों और सार्वजनिक बहसों में उठता रहा है। यह पुराने ‘पावर पर्चेज एग्रीमेंट,’ महंगे फिक्स्ड चार्ज और पारदर्शिता की कमी से अधिक जुड़ा हुआ है। राज्य में बिजली उत्पादन और खरीदी का काम तीन मुख्य स्तरों पर होता है। ‘मध्यप्रदेश पावर मैनेजमेंट कंपनी’ राज्य की ‘डिस्कॉम’ के लिए बिजली खरीदने की नोडल एजेंसी है। ‘कैग’ की रिपोर्टों में ‘पावर मैनेजमेंट कंपनी’ की नीतियों पर सवाल उठते रहे हैं, जैसे – महंगी दरों पर निजी कंपनियों से बिजली खरीदी अनुबंध किया जाना आदि।

कुछ निजी कंपनियों से बाजार भाव से अधिक में बिजली खरीदी गई। वहां खरीदी अनुबंध के ‘फिक्स्ड चार्ज’ के कारण बिजली महंगी पड़ी। ‘टेक ऑर पे’ प्रावधान के कारण कई निजी कंपनियों के साथ ऐसे समझौते हैं कि बिजली लो या मत लो, फिर भी भुगतान करना पड़ता है। एक जानकारी के अनुसार सन् 2020  से 2022 के बीच मध्यप्रदेश सरकार ने निजी बिजली कंपनियों को 1,773 करोड़ रूपए का भुगतान किया, जबकि उनसे एक यूनिट बिजली नहीं खरीदी गई। यह लागत उपभोक्ताओं के बिलों में जुड़ती रही।

कुछ बिजली खरीदी अनुबंधों में ऐसे प्रावधान हैं, जिनसे निजी कंपनियों ने ईंधन की बढी हुई लागत भी राज्य पर डाल दी। मैनेजमेंट कंपनी ने इस महंगे कोयले या ईंधन का पैसा उपभोक्ताओं से वसूला। ‘कैप्टिव प्राइवेट प्लांटों’ से मध्यप्रदेश ने 4.50 से 6 रूपए प्रति यूनिट तक बिजली खरीदी, जबकि बाजार में यह दर 2  से 3 रूपए प्रति यूनिट थी।

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सरकारी कंपनियों की पर्याप्त क्षमता होने के बावजूद निजी कंपनियों से बड़ी मात्रा में बिजली खरीदने पर सवाल खड़ा होना स्वाभाविक है। ऊर्जा अर्थशास्त्रियों के अनुसार यह बिजली खरीदी समझौता 2010 से 2015 के दौरान हुआ था, जब कोयले की कीमतें अधिक थीं। आज बाजार सस्ता हो गया है, लेकिन पुराने अनुबंधों ने मध्यप्रदेश को महंगी बिजली खरीदने के लिए बाध्य किया है। नियामक आयोग की निगरानी पर्याप्त मजबूत नहीं है। मूल्य निर्धारण और खरीद में अधिक पारदर्शिता होना चाहिए।

एक रिपोर्ट के अनुसार, 200 यूनिट मासिक खपत पर मध्यप्रदेश में बिल करीब 1,425 रूपए है, जबकि छत्तीसगढ़ में 900 रूपए और गुजरात में 785 रूपए है। वहीं 300 यूनिट खपत पर मध्यप्रदेश में 2,342  रूपए, जबकि छत्तीसगढ़ में 1,450 और गुजरात में 1,253 रूपए बताया गया है। प्रति यूनिट दरों में वर्ष-दर-वर्ष वृद्धि देखी जा रही है। कई घरों में औसत घरेलू बिल 15 से 25 प्रतिशत तक बढ़े हैं। बिजली बिल घर के मासिक खर्च का बड़ा हिस्सा खा जाता है जिससे रसोई बजट में कटौती हो रही है। ईएमआई, स्कूल फीस, किराया और रसोई खर्च पहले से ही महंगा है और बिजली बिल बढ़ने से मध्यम वर्ग की मासिक बचत लगभग खत्म हो गई है। कई परिवार अवकाश, यात्रा और अन्य खर्च रोक रहे हैं।

उपभोक्ता बिजली बिल का भुगतान किश्तों में कर रहे हैं। राहत की बात है कि सरकार ने ‘समाधान योजना’ 2025-26 में शुरू की है, जिसके तहत बकाया बिलों पर छूट और भुगतान के आसान विकल्प दिए जा रहे हैं। स्मार्ट मीटर लगने के बाद कई उपभोक्ताओं के बिल पहले के मुकाबले कई गुना ज़्यादा आ रहे हैं। कई जिलों में बिजली बिलों के खिलाफ जन-सुनवाईयों में तीन गुना शिकायतें दर्ज हो रही हैं। उपभोक्ता संगठनों का कहना है कि बिल में ‘अतिरिक्त चार्ज’ वास्तविक खपत से अधिक है। ग्रामीण क्षेत्रों में बिल सुधार और मीटर रीडिंग की समस्याएं लगातार आ रही हैं।

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मध्यप्रदेश सरकार को महंगे निजी समझौतों को बदलकर दरें कम करने का प्रयास करना चाहिए। कई राज्यों में घरेलू उपभोक्ताओं पर फिक्स्ड चार्ज बेहद कम हैं। मध्यप्रदेश को भी ऐसा करना चाहिए। पुरानी कोयला आधारित यूनिटों को तकनीकी सुधार के साथ चलाना अधिक सस्ता विकल्प हो सकता है। सौर और पवन ऊर्जा स्रोतों से प्रतिस्पर्धी दरों पर बिजली उपलब्ध है, जिसे प्राथमिकता देने की जरूरत है। मध्यप्रदेश में बिजली की बढ़ती कीमतें सिर्फ ‘महंगी बिजली’ का मुद्दा नहीं है। यह घरेलू जीवन, किसान, उद्योग, रोजगार और राज्य की अर्थव्यवस्था तक को प्रभावित कर रहा है। उपभोक्ताओं की मांग है कि बिजली की दरें आम आदमी की पहुंच में हों। ‘एशियन डेवलपमेंट बैंक’ की सिफारिश पर गठित ‘टाटाराव कमिटी’ की सलाह पर 2003 में विद्युत मंडल के घाटे को खत्म करने के लिए मध्यप्रदेश सरकार ने बिजली कम्पनियों का गठन किया था। वर्ष 2000 में विद्युत मंडल के समय घाटा 2100 करोड़ रुपए था, परन्तु मार्च 2024 तक, मध्यप्रदेश की ‘बिजली वितरण कंपनियों’ का कुल घाटा बढ़कर 69,301 करोड़ रुपए हो गया है। सुधार के नाम पर ‘विद्युत अधिनियम  2003’ लाया गया, जिसके नतीजे में उपभोक्ताओं को महंगी बिजली और निजी कंपनियों को भारी-भरकम मुनाफा मिल रहा है, जबकि 1948 का ‘इलेक्ट्रिसिटी एक्ट’ बिजली को सेवा क्षेत्र में रखकर सभी को उचित दर पर बिजली उपलब्ध कराता था। (सप्रेस)

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