विजयापुरा, 23 सितंबर। कर्नाटक सरकार ने जिला अस्पतालों को 99 साल की लीज़ पर निजी कंपनियों को सौंपने और पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल पर मेडिकल कॉलेज खोलने की योजना बनाई है। इसे स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण की रणनीति माना जा रहा है, जिससे राज्य की ज़िम्मेदारी कम होगी और स्वास्थ्य मुनाफ़े का बाज़ार बन जाएगा।
विजयापुरा बना संघर्ष का केंद्र
नीति आयोग की 2019 की रूपरेखा से प्रेरित इस योजना के खिलाफ विजयापुरा आंदोलन का गढ़ बन चुका है। 25 जनवरी 2023 को हज़ारों महिलाओं, मज़दूरों, छात्रों और वरिष्ठ नागरिकों ने ज़िला अस्पताल के सामने विशाल विरोध प्रदर्शन किया। आंदोलन धीरे-धीरे पूरे ज़िले—सिंदगी, इंदी, बसवन बागेवाड़ी, मुददेबीहाल, अलमेल और देवरहिप्परगी—तक फैल गया। सभी का नारा था: “हमारा अस्पताल निजी हाथों में मत दो। सरकारी मेडिकल कॉलेज सार्वजनिक धन से खोला जाए और जनता के प्रति जवाबदेह हो।”
करीब दो साल बाद, 9 सितंबर 2025 को, हज़ारों लोग फिर से विजयापुरा जिला अस्पताल के गेट पर इकट्ठा हुए। महिला संगठनों, किसान संघों, झुग्गी-बस्ती संगठनों, युवा समूहों और प्रगतिशील मंचों ने मिलकर सरकार के खिलाफ आवाज़ बुलंद की।

जनता की आवाज़: “स्वास्थ्य जनता का है, कॉर्पोरेट का नहीं”
कर्नाटक जनआरोग्य चलूवली (KJC) की टीना ज़ेवियर, विजय कुमार और डॉ. अखिला वासन तथा जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया (JSA India) के अमूल्य निधि ने कहा कि जनता की आवाज़ अडिग है। उनका कहना था कि मेडिकल कॉलेज राज्य सरकार द्वारा पूरी सार्वजनिक फंडिंग और जवाबदेही के साथ स्थापित होना चाहिए, न कि PPP मॉडल या निजी कंपनियों के ज़रिए।
जन स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का तर्क है कि भारत और दुनिया के किसी भी अनुभव से यह साबित नहीं होता कि निजीकरण से स्वास्थ्य सेवाओं तक जनता की पहुँच बेहतर होती है। उल्टे, यह सबसे ग़रीब और ज़रूरतमंद तबकों के लिए नई बाधाएँ खड़ी करता है।
संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और स्वास्थ्य का अधिकार सुनिश्चित करता है तथा अनुच्छेद 47 राज्य को जनता के स्वास्थ्य सुधार की ज़िम्मेदारी सौंपता है—न कि निजी कंपनियों को।
सरकार ने विजयापुरा में नया मेडिकल कॉलेज पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल पर स्थापित करने की योजना बनाई है। इस योजना के तहत ज़िला अस्पताल, जिसमें 1,000 बिस्तरों की सुविधा मौजूद है, क्लिनिकल बेस के रूप में काम करेगा। इसके अलावा, सरकार 150 एकड़ ज़मीन भी उपलब्ध कराएगी। कॉलेज का निर्माण, स्टाफिंग और संचालन पूरी तरह निजी भागीदारों की ज़िम्मेदारी होगी।

योजना के सामने आते ही स्थानीय स्तर पर इसका विरोध शुरू हो गया। लोगों का मानना है कि इस मॉडल में लाभ को जनता पर तरजीह दी जाएगी। आशंका है कि निजी कंपनियाँ फीस में बढ़ोतरी कर देंगी, जिससे गरीब और मेधावी छात्रों के लिए मेडिकल शिक्षा तक पहुँचना कठिन हो जाएगा।
साथ ही, पारदर्शिता को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। सीटों के आवंटन और फीस संरचना, विशेषकर NRI और प्राइवेट कोटा के मामले में, कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं दिए गए हैं।
एक और बड़ी आपत्ति यह है कि विजयापुरा में पहले से ही एक बड़ा जिला अस्पताल मौजूद है। स्थानीय लोग सवाल कर रहे हैं कि जब आधारभूत ढाँचा पहले से मौजूद है, तो फिर सरकार पूरी तरह से सार्वजनिक फंडिंग वाले मेडिकल कॉलेज की स्थापना क्यों नहीं कर सकती।
विरोधियों का कहना है कि PPP मॉडल आमतौर पर महंगे होते हैं, जिससे समानता का सवाल खड़ा होता है। कमजोर और वंचित वर्गों की पहुँच ऐसे कॉलेजों तक और भी सीमित हो सकती है।
सरकार का पक्ष
मुख्यमंत्री सिद्धरामैया और उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार PPP मॉडल का बचाव कर रहे हैं। उनका कहना है कि इससे राज्य पर वित्तीय बोझ घटेगा और मेडिकल कॉलेज जल्दी स्थापित हो पाएंगे। कुछ स्थानीय नेता, जैसे विधायक बसनगौड़ा पाटिल यात्नाल, इस योजना का समर्थन भी कर रहे हैं।
हालांकि निर्णय अभी विचाराधीन है, लेकिन स्थानीय स्तर पर विरोध लगातार तेज़ होता जा रहा है। छात्र रैलियाँ निकाल रहे हैं, ज्ञापन सौंप रहे हैं और धरनों में भाग ले रहे हैं। समाजवादी, दलित और किसान आंदोलनों के साथ-साथ आम जनता भी एक स्वर में कह रही है— “सार्वजनिक स्वास्थ्य बिकाऊ नहीं है। यह जनता का अधिकार है और राज्य की संवैधानिक ज़िम्मेदारी।”


